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يـا
أيهـا
الريـح
الجنـوب
تحمّلي
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منّـــي
تحيّـــة
مغــرم
وتجمّلــي
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واقـر
السـلام
أهيـل
ودّي
وانـثري
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مـن
طيـب
مـا
حمّلـت
ريـح
قرنقـل
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خلّـي
خيـام
بنـي
الكـرام
وخبّـري
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أنـــي
أبيــتُ
بحرقــة
وتبلبــل
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جفنـاي
قـد
ألفـا
السهاد
لبينكم
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فلـذا
غـدا
طيـبُ
المنـام
بمعـزل
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كــم
ليلــةٍ
قــد
بتّهـا
متحسـّرا
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كمــبيت
أرمـدَ
فـي
شـقا
وتملمـل
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ســهران
ذا
حــزنٍ
تطــاول
ليلـه
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فمــتى
أرى
ليلـي
بوصـلي
ينجلـي
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مــاذا
يضـرّ
أحبّـتي
لـو
أرسـلوا
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طيــف
المنــام
يزورنــي
بتمثّـل
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كـلّ
الـذي
ألقـاه
فـي
جنب
الهوى
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ســهلٌ
سـوى
بيـن
الحـبيب
الأفضـل
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أدّي
الأمانــة
يـا
جنـوب
وغـايتي
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فـي
جمـع
شـملي
يـا
نسيم
الشمأل
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واهـدي
إلـى
مـن
بالرياض
حديثهم
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أذكــى
وأحلـى
مـن
عـبير
قرنفُـل
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تهــدي
إلــي
طرائفــا
وظرائفـا
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ولطائفــــاً
بتعطّــــر
وتعســـّل
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حـاولتُ
نفسـي
الصبر
عنهم
قيل
لي
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مــه
ذا
محــالٌ
ويـك
عنـه
تحـوّل
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كيــف
التصــبّر
عنهــم
وهـم
هـمُ
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أربــابُ
عهــدي
بـالعقود
الكمّـل
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أيحـلّ
ريـب
الـدهر
ما
عقدوا
وكم
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حلّــت
عقــودي
بـالمنى
المتخيّـل
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تفــديهم
نفســي
وتفــدي
أرضـهم
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أزكـى
المنـازل
يـا
لها
من
منزل
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أفـدي
أناسـاً
ليـس
يـدعى
غيرهـم
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حاشــا
العصــابة
والطـراز
الأول
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يكفيهــم
شــرفا
وفخــراً
باقيـا
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حمــل
اللــواء
الهاشـمي
الأطـول
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قــد
خصــّهم
واختصـّهم
واختـارهم
|
رب
الأنــام
لــذا
بغيــر
تعمّــل
|
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هــم
بالمديــح
أحـق
لكـن
ربمـا
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ضــاعت
حقــوق
بالعــدا
والعـذل
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إن
غيرهـم
بالمـال
شـحّ
ومـا
سخا
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جــادوا
ببـذل
النفـس
دون
تعلّـل
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البـــاذلون
نفوســهم
ونفيســهم
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فـي
حـبّ
مالكنـا
العظيـم
الأجلـل
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كــم
يضـحك
الرحمـن
مـن
فعلاتهـم
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يـوم
الكريهـة
نعـم
فعـل
الكمّـل
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الصـادقون
الصـابرون
لـدى
الوغى
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الحــاملون
لكــلّ
مـا
لـم
يحمـل
|
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إن
غيرهـم
نـال
اللـذائذ
مسـرفاً
|
هـم
يبتغـون
قـراع
كتـب
الجحفـل
|
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وألــذّ
شـيء
عنـدهم
لحـم
العـدا
|
ودمــاؤهم
كــزلال
عــذب
المنهـل
|
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النـــازلون
بكـــلّ
ضــنك
ضــيّق
|
رغمــا
علـى
الاعـدا
بغيـر
تهـوّل
|
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لا
يعــرف
الشــكوى
صــغيرٌ
منهـم
|
ابـدا
ولا
البلـوى
إذا
مـا
يصطلي
|
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مـــا
منهـــم
إلا
شــجاعٌ
قــارعٌ
|
أو
بــارعٌ
فــي
كــل
فعـل
مجمـل
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كـم
نافسوا
كم
سارعوا
كم
سابقوا
|
مـــن
ســـابق
لفضــائل
وتفضــل
|
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كـم
حاربوا
كم
ضاربوا
كم
غالبوا
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أقــوى
العــداة
بكــثرة
وتمـوّل
|
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كـم
صابروا
كم
كابروا
كم
غادروا
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أعــتى
أعــاديهم
كعصــف
مؤكــل
|
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كـم
جاهـدوا
كـم
طاردوا
وتجلّدوا
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للنائبـــات
بصـــارم
وبمقـــول
|
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كم
قاتلوا
كم
طاولوا
كم
ما
حلوا
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مـن
جيـش
كفـرٍ
باقتحـام
الجحفـل
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كـم
أدلجوا
كم
أزعجوا
كم
أسرجوا
|
بتســــارعٍ
للمـــوت
لا
بتمهّـــل
|
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كـم
شـرّدوا
كـم
بـدّدوا
وتعـوّدوا
|
تشــتيت
كــل
كتيبــةٍ
بالصــيقل
|
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يـوم
الـوغى
يـوم
المسـرّة
عندهم
|
عنــد
الصـياح
لـه
مشـوا
بتهلّـل
|
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فـــدماؤهم
وســـيوفهم
مســفوحةٌ
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ممســـوحة
بثيــاب
كــل
مجنــدل
|
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لا
يحزنــون
لهالــك
بــل
عنـدهم
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مــوت
الشــهادة
غبطـة
المتحـوّل
|
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مـا
المـوت
بالبيض
الرقاق
نقيصةٌ
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والنقــص
عنــدهم
بمــوت
الهمّـل
|
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يـا
ربّ
إنّـك
فـي
الجهـاد
أقمتـم
|
فبكـــلّ
خيـــرٍ
عنهـــم
فتفضــّل
|
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يــا
رب
يــا
ربّ
البرايـا
زدهـم
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صــبرا
ونصــرا
دائمــا
بتكمّــل
|
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وافتـح
لهـم
مـولاي
فتحـا
بيتنـا
|
واغفــر
وســامح
يـا
إلهـي
عجّـل
|
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يــا
رب
يـا
مـولاي
وابقهـم
قـذي
|
فـي
عيـن
مـن
هـو
كـافرٌ
بالمرسل
|
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وتجــاوزن
مــولاي
عــن
هفـواتهم
|
والطـف
بهـم
فـي
كـل
أمـر
منـزل
|
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يـــا
رب
واشــملهم
بعفــوٍ
دائم
|
كـن
راضـيا
عنهـم
رضـا
المتفضـل
|
|
يــا
ربّ
لا
تــترك
وضــيعاً
فيهـم
|
يــا
رب
واشــملهم
بخيــر
تشـمّل
|
|
متوســـلا
مـــولاي
فــي
ذا
كلّــه
|
متشـــفعا
بشـــفيع
كــل
مكمّــل
|
|
وجهـت
وجهـي
فـي
الأمـور
جميعهـا
|
لمحمّــد
غيــث
النـدا
المسترسـل
|
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صـلى
عليـه
اللـه
مـا
سـحّ
الحيا
|
والآل
مـا
سـيف
سـطا
فـي
الجحفـل
|