|
ســبحان
مالـك
الملـوك
والملـكْ
|
والملـك
مجرى
الفلك
فيه
والفلكْ
|
|
الحكـم
العـدل
الـذي
قـد
أرسلك
|
للنــاس
يـا
مختـار
رحمـة
فلـكْ
|
|
منــه
الصــلاة
والســلام
العطـر
|
|
وبعــد
فاســمع
مدحــة
الزمـانِ
|
فـــي
فــوزه
بــالأمن
والأمــانِ
|
|
مرفهــــاً
بفضـــل
رب
الشـــان
|
صــــدر
الصـــدور
آصـــفي
الآن
|
|
أدامـــه
اللَـــه
ولــيَّ
الأمــر
|
|
صـــير
مصـــر
كلهــا
أفراحــا
|
ولـــم
يــزل
يزيــدها
إصــلاحا
|
|
كــم
أنعشــت
ألطــافه
أرواحـا
|
ونعَّمــــت
نعمـــاؤه
أشـــباحا
|
|
حـتى
جـرى
قطـر
النـدى
كـالقطر
|
|
عبــاس
حكــمٍ
فـي
النـدى
بسـامُ
|
يـــدعو
بعـــز
ملكــه
الإســلامُ
|
|
أيـــامه
حســـناً
هــي
الأيــامُ
|
ســُرَّ
الفقيــرُ
منــه
والأيتــامُ
|
|
بمــا
حبــاهم
مـن
جزيـل
الـبر
|
|
كــم
مســجدٍ
زهــا
وكـم
زوايـا
|
وكــم
ضــريح
ضــاء
كـم
تكايـا
|
|
كــم
قــام
منصـفاً
لمـن
تعايـا
|
وحــادث
منــه
عفــا
البرايــا
|
|
فأصــبحوا
مـن
عسـرهم
فـي
يسـر
|
|
بكـــل
عـــامٍ
ســـيد
الصــدورِ
|
معــودٍ
فــي
القطــر
بــالمرورِ
|
|
مســــتظهراً
غـــوامض
الأمـــور
|
ترفقـــاً
بالعـــاجز
الفقيـــر
|
|
لبعـــد
شـــكواه
عــن
المقــر
|
|
فسـار
سـير
البـدر
فـي
الضـياء
|
مشـــرِّقاً
علــى
ســماء
المــاءِ
|
|
تحتــــاطه
كـــواكب
البهـــاء
|
مشـــرِّفاً
بـــروجَ
أفـــق
نــاءِ
|
|
وعــم
وجــه
الأرض
نــور
البـدر
|
|
وقـام
مـن
بـولاق
فـي
نصـف
رجـبْ
|
مــع
الســعود
والسـرور
مصـطحبْ
|
|
والملـك
يـدعو
للمليـك
إذ
وكـب
|
فــي
جمعـةٍ
تزهـو
بتاريـخ
عجـب
|
|
مـن
مصـر
وفـي
الـبر
رب
البحـر
|
|
وحفظتــــه
إذ
مشــــى
بـــولاقُ
|
والنــاس
فــي
أوصــافه
عشــاقُ
|
|
كيــف
مــن
الغــرب
لـه
إشـراقُ
|
بـــدر
الهــدى
أرخ
فيــا
أخلاقُ
|
|
والـي
ببحـر
الشـرق
والـي
مصـر
|
|
ســاس
العبــاد
رأيــه
السـديدُ
|
صـــان
البلاد
بأســـه
الشــديدُ
|
|
فالشــرق
ثـم
الغـروب
والصـعيدُ
|
قــد
ضـاع
فيهـم
نجمـه
السـعيدُ
|
|
آثــاره
كــالظهر
نــور
العصـر
|
|
فـاروِ
حـديثاً
جـاء
فـي
الأخبـارِ
|
عــن
شـرح
صـدرٍ
صـح
فـي
الآثـارِ
|
|
يُطــالع
المــرويَّ
فــي
الأسـفارِ
|
عــن
مسـلمٍ
فـي
مركـب
البخـاري
|
|
كيـف
القُـرى
والحكـم
كيـف
يجري
|
|
يجـري
بنـا
فـي
جـوده
الوابـورُ
|
كـــأنه
فـــي
عشـــقه
مهجــورُ
|
|
دمـــوعه
مـــن
نـــاره
تفــورُ
|
وفـــي
الهـــوا
لآهـــهِ
زفيــرُ
|
|
وقلبــه
فــي
شـغل
بحـر
الفكـر
|
|
تقـول
بسـم
اللَـه
مجراهـا
ومُـرْ
|
سـاها
فسر
باليمن
بالحسنى
ومرْ
|
|
واطلـب
مـن
الحظ
الذي
تهوى
ومُرْ
|
تـراه
طـوع
السـعد
يحلـي
كل
مرّْ
|
|
ثـم
احتكـم
فالـدهر
طـوع
الأمـر
|
|
حـــتى
صـــفت
بالآصــفيِّ
بنهــا
|
يــأمر
بــالمعروف
حيــث
ينهـى
|
|
مــن
التعــدي
أن
إليــه
أنهـى
|
مـن
كـان
منهـا
أو
بعيـداً
عنها
|
|
مــذ
مــدَّ
ظــلَّ
عــدله
بالقصـر
|
|
أقــــام
بـــالأيوان
للعبـــادِ
|
مشــــــتغلاً
براحــــــة
البلادِ
|
|
وفــاز
منــه
النــاس
بـالمرادِ
|
نــادي
لســان
العـدل
والإسـعادِ
|
|
تاريـخ
بنهـا
قـد
صـفت
بالبشـر
|
|
لمــا
رأت
بوصـير
رايـةَ
الفـرحْ
|
بـالزورق
المسعود
والصدر
انشرحْ
|
|
تهللــت
بشــراً
فأمسـى
واصـطبح
|
لـه
الثنـا
مـن
الأهـالي
والمدحْ
|
|
وأرخــوا
لبــدر
هــذا
الصــدر
|
|
مـن
السـما
نـودي
الخديوي
شرُفَتْ
|
بكــم
سـمنّود
الـتي
قـد
أُتحفـتْ
|
|
وأنصـــفت
بالآصــفي
مــذ
صــفتْ
|
نــــادت
مبشـــراتُها
وأرَّخَـــتْ
|
|
حســناً
ســمنّود
اسـعدي
بـالخير
|
|
حــلَّ
المحلــةَ
الرشـيد
الثـاني
|
كمــا
يحــل
الغيــث
بالبسـتانِ
|
|
أو
كمحـــلِّ
الـــروح
بالأبــدانِ
|
مــذ
أشــرقت
بالحسـن
والإحسـانِ
|
|
وزينــــت
لنــــوره
بالــــدرِّ
|
|
عاملهـــا
بـــاللطف
والإســعافِ
|
وانتظمـــت
بالعــدل
والإنصــافِ
|
|
فـــأرخت
نصــفاً
مــن
الإنصــافِ
|
حــل
المحلــة
الثنـاء
الـوافي
|
|
لمــا
وفاهــا
جــوده
كــالنهر
|
|
لمــا
أتـى
المنصـورةَ
المنصـورُ
|
وجــاء
أهــل
قســمها
التبشـيرُ
|
|
نـال
الأهـالي
مـذ
أضـاء
النـور
|
أغراضــــَهم
فكلهـــم
مســـرورُ
|
|
وبــات
مخــدوم
الصـفا
والبشـر
|
|
يــا
حسـنها
للناصـر
المسـرورهْ
|
تزينـــت
وأصــبحت
فــي
صــورَهْ
|
|
قـــد
أرخــت
بشــطرة
مــأثوره
|
إن
البهــا
مــن
صـورة
منصـوره
|
|
مقبلـــة
بعــز
راقــي
القــدر
|
|
تبســـمت
دميـــاط
بالرعايـــا
|
كـــأنهم
فــي
ثغرهــا
ثنايــا
|
|
مبتهجيــــن
أن
رأوا
مزايــــا
|
مقبلــة
تــدعو
لهــا
البرايـا
|
|
بطـــول
عمــر
وبحســن
الــذكر
|
|
وأصـــبحت
يزهوبهـــا
النشــاطُ
|
وللحظـــوظ
عنـــدها
انبســـاطُ
|
|
بحســــن
شـــطر
أرخ
الربـــاطُ
|
صـــدر
بـــه
تبســـمت
دميــاطُ
|
|
ممتــدحاً
تقبيــل
هــذا
الثغـر
|
|
يــا
ربنـا
تبقـى
حيـاة
الآصـفي
|
واَنعـم
على
الدنيا
بهذا
المنصفِ
|
|
فـي
مـدحه
مـا
شـئت
بالغ
أو
صف
|
كيـف
البليـغ
إن
يفي
مدح
الصفي
|
|
فالطُول
في
ذي
الطَول
بادي
القصر
|