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رفــع
الآلــه
مقــامَ
إبراهيمـا
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فشــفى
بـه
سـقمي
وأبـرأ
هيمـا
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والقلـب
مـأواه
وقـد
أمسـى
بـه
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للحـــبّ
دومــاً
جنّــةً
ونعيمــا
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وكــؤوس
أنسـي
مـن
مدامـة
حبّـه
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تجلَــى
وبــات
مزاجهـا
تسـنيما
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وأراه
فـي
قلـبي
ينـادمني
كمـا
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ذكــراه
أصــبح
للســان
نـديما
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إن
غـاب
عـن
عينـيّ
مـرأى
ذاتـه
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فـأراه
فـي
الأحشـاء
كـان
مقيما
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هـذا
المقـام
مقـام
إبراهيم
مَن
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فيــه
غـدا
قلـب
المحـبّ
حطيمـا
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قـد
شـاقه
هذا
المقام
فزمزم
ال
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قلــبَ
المشــوق
بـذكره
تفخيمـا
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وإليــه
حــجّ
وصـام
عمّـا
دونـه
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وإليــه
صــلّى
بالـدعا
تسـليما
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فـي
القلـب
إبراهيـم
وهو
خليله
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أمسـى
بـه
خضـر
الـوداد
كليمـا
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فهـو
النعيـم
لجنّـة
القلب
الّذي
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للِقــاه
طــار
مهيّمــاً
تهييمـا
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فعســى
تــراه
عيـن
صـبٍّ
جفنهـا
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قـد
بـات
مـن
فرط
البعاد
سقيما
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وبـه
بـدا
روض
الحشـا
يخضـرّ
من
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لقيـاه
إذ
بـالبين
عـاد
هشـيما
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والصــدر
مشــروحٌ
برؤيـة
طلعـةٍ
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كالبـدر
نـال
مـن
البها
تتميما
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وأراه
فـي
فلك
الكمال
من
العلا
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والنجــم
دون
مقــام
إبراهيمـا
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حيث
الهواتف
في
الحشا
هتفت
ببش
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راه
بمرقـى
فـي
السـعود
جسـيما
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وســيرتقي
مـن
فـوق
هـذا
رتبـةً
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وينـال
عـزّاً
فـي
الوجـود
عظيما
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قـد
قلـت
ذا
مـن
هاتفٍ
في
مهجتي
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لا
طـــالع
راقبتـــهُ
تنجيمـــا
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كــذب
المنجّــم
والمصـدق
قـوله
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وكفــى
بمولانــا
الإلــه
عليمـا
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فــالله
يعلــي
قــدره
ومقـامه
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حـتى
يـرى
السـعد
الكبير
خديما
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بنظـام
دولتـه
السـعيدة
من
غدت
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عقــداً
فريـداً
بالسـعود
نظيمـا
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