|
ليس
يخفى
ما
كان
بالحبّ
فاشي
|
مــن
غـرامٍ
ولوعـةٍ
وانـدهاش
|
|
إنّمــا
للمحــبّ
رقّــة
طبــعٍ
|
مثل
ريح
الصبا
رقيق
الحواشي
|
|
حيثمـا
الحبّ
شأنه
يرفع
الحج
|
بَ
عن
القلب
بارتفاع
الغواشي
|
|
وهـو
يجلـو
مـرآة
قلـبٍ
معنّىً
|
بصـفا
الحـب
قابـل
الإنتعـاش
|
|
فــتراه
منعّمــاً
فــي
عـذابٍ
|
مقعـداً
فـي
غرامـه
وهو
ماشي
|
|
كــلّ
لطــفٍ
وكــلّ
ظـرفٍ
وذوقٍ
|
ليــس
إلّا
عـن
المحبّـة
ناشـي
|
|
مثـل
من
كان
لي
حبيباً
خليلاً
|
وصــديقاً
محمّــد
البكداشــي
|
|
قـد
أتـاني
منـه
لطيـفُ
كتابٍ
|
قـد
طواه
الصفا
لنشر
انتعاش
|
|
فـي
سـطورٍ
بهـا
معانيه
تحكي
|
بـدرَ
تـمٍّ
قد
لاح
والليلُ
غاشي
|
|
قـد
أراشـت
جوانح
الطير
منّي
|
حيـث
كـانت
للصـبّ
خيـر
رياش
|
|
أعربـت
لحـنَ
حـال
صـبٍّ
مشـوق
|
لـم
يـزل
مـن
غرامه
في
تلاشي
|
|
أجّجــت
نــار
مهجـتي
بلهيـبٍ
|
وعليهـا
حـامَ
الحشا
كالفراش
|
|
بــدّل
الـدهر
قربنـا
ببعـادٍ
|
مثـل
أنـسٍ
قـد
عـاد
للإيحـاش
|
|
نسـأل
الله
عودَ
ورد
التداني
|
لقلــوبٍ
مــن
اللقـاء
عطـاش
|
|
في
رياض
الأذكار
حيث
تجلّى
ال
|
حــبّ
فينـا
بلا
رقيـبٍ
وواشـي
|
|
وعلــى
الأخـوة
الكـرام
سـلامٌ
|
مـن
محـبٍّ
فـي
وحشـة
استيحاش
|
|
حبّهــم
لــي
سـعادةٌ
وعليهـم
|
ليس
يخفى
ما
كان
بالحبّ
فاشي
|