|
ألا
يـا
نفـس
ويحك
كم
تواني
|
وكـم
طـول
اغـترار
بالمحال
|
|
وكـم
سـهو
وكـم
لهـو
وهـزل
|
وكـم
ميـل
إلـى
دار
الزوال
|
|
وكـم
شـغل
بمـا
لا
خيـر
فيه
|
وكـم
حـرص
علـى
شـرف
ومـال
|
|
وكـم
تلـوين
عـن
محمود
فعل
|
وكـم
تقعيـن
في
قبح
الفعال
|
|
وكم
ذا
تركنين
إلى
الدنايا
|
وكـم
تتقاعـدين
عن
المعالي
|
|
لعمـري
دل
هـذا
الفعـل
منك
|
علـى
نسـيان
شـأن
الإرتحـال
|
|
أمـا
واللَه
ما
سبب
التباطي
|
عـن
المحمـود
مـن
فعل
وقال
|
|
وإيثـار
الثبـات
علـى
أمور
|
لصـاحبها
تقـود
إلـى
الضلال
|
|
سـوى
شـيئين
إما
الشك
فيما
|
بـه
وعـد
المهيمن
ذو
الجلال
|
|
وإمــا
غفلــة
مزجـت
بحمـق
|
وتهويســات
بطــال
وغــالي
|
|
فـوا
أسـفي
ووالهفـي
وحزني
|
على
ما
كان
مني
في
الخوالي
|
|
ووانــدمي
علـى
زمـن
تقضـي
|
علـى
عمـل
بمـذموم
الخصـال
|
|
وعمـر
ضـاع
فـي
إيثـار
دار
|
حقيقتهــا
تشــبه
بالخيـال
|
|
كظــل
زائل
أو
طيــف
نــوم
|
يئول
بســــــــرعة
للإنحلال
|
|
يــزول
نعيمهـا
عمـا
قريـب
|
ومؤثرهـا
يصـير
إلـى
وبـال
|
|
ومـا
الـدنيا
بباقيـة
ولكن
|
نفارقهــا
بمــوت
وانتقـال
|
|
إلـى
فـبر
مهـول
فيـه
يلقى
|
علينــا
فحسـبك
مـا
نصـالي
|
|
وتبقـى
في
القبور
إلى
نشور
|
بنفـخ
الصور
في
يوم
السؤال
|
|
ونوقـف
موقفـاً
صـعباً
ثقيلا
|
وتــأتي
كــل
نفـس
للجـدال
|
|
وينصــب
ثــم
ميـزان
لـوزن
|
فكتــب
بـاليمين
وبالشـمال
|
|
مناقشـــة
وتفــتيش
فإمــا
|
مصــير
للنعيـم
او
النكـال
|
|
ألا
لا
مســـتريح
مـــن
وراه
|
كهــذا
اليـوم
إلا
ذو
خبـال
|
|
لقـد
علـم
ذوو
الألبـاب
طرا
|
بـأن
الخيـر
في
طلب
الكمال
|
|
يفطـم
النفـس
عـن
مألوف
حظ
|
ورفـض
الفانيـات
بلا
احتفال
|
|
وفـي
ظمـأ
الهواجر
واعتزال
|
عـن
الأشرار
مع
سهر
الليالي
|
|
وإدمــان
التـوجه
بافتقـار
|
وإقبـال
علـى
مولى
الموالي
|
|
إلــه
واحــد
ملــك
قــدير
|
عظيـم
الشـأن
وهـاب
النوال
|
|
تعـالى
عـن
مشاكلة
البرايا
|
وجـل
عـن
التكميـة
والمثال
|
|
نوحـــده
نشـــكره
ونثنــي
|
ونســأله
دوامــا
بابتهـال
|
|
يوفقنــا
لمـا
يرضـيه
عنـا
|
ويثبتنــا
بـديوان
الرجـال
|
|
ويصــلحنا
ويمنحنـا
نعيمـا
|
وروحاً
في
الحياة
وفي
المآل
|
|
ويجعـل
أفضـل
الصـلوات
منا
|
علـي
خيـر
الورى
في
كل
حال
|
|
مـع
التسـليم
يغشـاه
ويغشى
|
صــحابته
الكــرم
خيــر
آل
|