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أتحفنـــا
خالــك
فــي
خطــك
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إِيــه
فقــد
وفيـت
فـي
شـرطك
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قرَّبـت
لـي
مـا
أرتجـي
من
مني
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مهلا
فقــد
أبعــدت
فـي
شـوطك
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بــرِّح
بــي
شــحطك
عنــي
ألا
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للــه
مــا
قاسـيت
مـن
شـحطك
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عـرى
اصـطباري
عنـك
قـد
حلها
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فـي
الرسـم
ما
أودعت
من
ربطك
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ومهمـــل
الـــدمع
باعجــامه
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خــدِّي
حكـى
الخيلان
مـن
نقطـك
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أدرت
اســفنطا
علــى
نــاظري
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فـــراح
نشـــوان
باســـفنطك
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شــردت
لكــن
ليـس
عـن
فكـرة
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خيالهــا
يعجــز
عــن
ضــبطك
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عـن
جـانبي
أرجـم
كنـت
الـذي
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نحـاك
لـولا
الخـوف
مـن
رهطـك
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أســخطك
العـاذل
بعـض
الرضـا
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أوقعـــه
مــولاه
فــي
ســخطك
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أوريـت
سـقط
الزنـد
فـي
مهجة
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تقتبــس
النيــران
مـن
سـقطك
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أرجـو
مـن
القـائم
بالقسط
أن
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يجزيـك
فـي
الحـب
علـى
قسـطك
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أفرطـت
فـي
البعـد
وفرَّطـت
بي
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فالـدمع
يحكـي
النثر
من
فرطك
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فمقلــتي
تنــثر
دمعــا
حكـى
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نــثر
عقـود
الـدرِّ
مـن
سـمطك
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هيهـات
أن
أصـطاد
مـن
بعد
ما
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شــط
النــوى
بطــك
مـن
شـطك
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نــاداك
بــالرفع
لسـاني
فلا
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تخــش
الــذي
يطمـع
فـي
حطـك
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فـي
يـدك
الحجـة
أعطاكها
الح
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ق
وغيــر
الحــق
لــم
يعطــك
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وصــالح
ايــاك
تعطيــه
مــن
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ســـدرك
أو
أثلــك
أو
خمطــك
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قبضـت
منـي
القلـب
رهنـا
فدم
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يــا
راحـة
الارواح
فـي
بسـطك
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وقــل
لموسـى
بـن
شـريف
أقـم
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في
التيه
واخش
الغدر
من
قبطك
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أنــت
الـذي
تـبرم
فـي
خيطـه
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وهــو
الـذي
يـبرم
فـي
خيطـك
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ولــم
تــزل
تضـرب
فـي
سـوطه
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ولــم
يــزل
يضـرب
فـي
سـوطك
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لا
زلــت
كالخضــر
لموسـى
ولا
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زال
هــو
الواقــع
فـي
خطبـك
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فكــن
كهــرون
لــه
مـا
حيـا
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عنـه
دواعـي
الـوهم
فـي
كشطك
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ودمــت
يـا
كفـؤ
العلا
ترتجـى
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منـك
العلا
التسـريح
فـي
مشطك
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