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إن
هــذا
التشـطير
قنـد
مكـرَّر
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في
علي
الرضا
بن
موسى
بن
جعفر
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قبــة
للرضــى
حــوت
كـل
فضـل
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مــا
حـواه
وادي
طـوى
والطـور
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وعلــى
الحادثــات
فـي
كـل
آن
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منـه
عيـن
النـور
القديم
تفور
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ونفــت
عــن
زوَّارهـا
كـل
سـخط
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مــا
بهــذا
شــك
وريــب
وزور
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وعليهـا
الرضـوان
أوقـف
نفسـا
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كيــف
لا
والرضــا
بهـا
مقبـور
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مـا
تراهـا
منـه
حـوت
عقـد
درِّ
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يتلقـــدن
فـــي
حلاه
الحـــور
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وعلــى
لبــة
العلا
إن
تــراآى
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فيـه
تزهـو
مـن
المعـالي
نحور
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وحــوت
مــن
علاه
جــوهر
قــدس
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هــو
فــي
كنــه
حقهـا
مصـرور
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واحتـوت
يـا
لهـا
عليـه
زمانا
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مثـل
مـا
قد
حوى
اللآلي
البحور
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واســتنارت
سـنى
وطـالت
سـناء
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باذخــا
عنـده
الـدراري
تغـور
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وشــأت
ســوددا
ومجــدا
أثيلا
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قصــرت
عــن
مـدى
علاه
القصـور
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والحيـا
والحيـاء
فيهـا
أقاما
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فيهمـــا
كــل
مجتــد
مغمــور
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مـن
ثـرى
قـبره
اسـتفدنا
ثراء
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فتســاوى
الممــدود
والمقصـور
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وأحــالت
ليـل
المضـلين
صـبحا
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فيــه
للهــدى
والرشـاد
ظهـور
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بزغــت
شمســها
لهــم
وتجلــت
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فــانتفى
عــن
صـباحها
ديجـور
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وأنــافت
علـى
الشـموس
منـارا
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نــوره
فــي
جفونهــا
مــذرور
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وتلا
الـوحي
سـورة
النـور
فيها
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مـذ
حـوت
مـن
لـه
بهـاء
ونـور
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قبــة
للافلاك
لــم
تبــق
فخـرا
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تتبـــاهى
بــه
غــداة
تمــور
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وأســامت
بــدورها
كــل
خســف
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أو
تبقـى
مـع
الشـموس
البـدور
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واكتســت
مــن
مــآثر
كنجــوم
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مزهــرات
تغـار
منهـا
الزهـور
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لبســت
مــن
حلاه
ثوبـا
قشـيبا
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قـد
تعـرَّى
ممـا
اكتسـته
الاثير
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مــا
دعــت
للافلاك
محــور
مـدح
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وعــن
البســط
عـاقه
التكـوير
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ولعينــي
مهمــا
علا
منـه
كعـب
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منـه
يبـدو
الـتربيع
والتدوير
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لا
ولا
غـــادرت
ثنـــاء
عليــه
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يقتضــيه
المنظــوم
والمنثـور
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أو
يلقــى
حاشــا
لــذلك
ذكـر
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فـوق
قطـب
السـان
يومـا
يـدور
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تلــك
لــب
وذي
قشــور
لهــذا
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أســـكرتنا
كؤســها
والخمــور
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حيـث
كـادت
أسـرارها
أن
تراآى
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قـد
تبـدَّت
منهـا
عليهـا
سـتور
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وأحــاطت
منهــا
بأسـرار
غيـب
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حســــدتها
منـــاطق
وخصـــور
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يـا
لهـا
مـن
عقيلـة
ذات
خـدر
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حــار
فيهـا
عقـل
وغـاب
شـعور
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وبتشــبيهها
لـذي
اللـبِّ
حـالا
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وارتجـالا
عنـه
انـبرى
التعبير
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حيـث
ان
الافصـاح
عـن
مثـل
هذا
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ليــس
قـالا
بـه
تفـوه
الثغـور
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ولقلـــبي
كنايـــة
لا
صــريحا
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فيــه
يبــدو
للأعيـن
المسـتور
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وهـي
تحكـي
بيـض
الانـوق
حفاظا
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قــال
لــبي
لكــل
لــبٍّ
قشـور
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