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لا
تلمنـي
إن
بُحـتُ
بالحبِّ
لهْفا
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إنمـا
الحـبُّ
علـةٌ
ليـس
تخفَـى
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كيـف
حـالُ
الأسـرار
بيـن
دموعٍ
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ليـس
ترقـا
وحرقـةٍ
ليـس
تُطْفَى
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يـا
أهْيـلَ
الخيامِ
هلْ
من
حديث
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مُســْتطابٍ
بـه
الصـبابةُ
تُشـْفَى
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بـــأبي
شــادنٌ
بــأفئدة
الآ
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سـاد
أضـحَى
مُسـْتَهْونا
مُسـْتَخِفا
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يُخجـل
البـدرَ
والغزالـةَ
لونا
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ويفـوق
الغـزلانَ
جيـداً
وطرْفـا
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ويفــوق
الحســانَ
حسـناً
ودَلاَّ
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يُعجـزُ
الواصـفين
نعتـاً
ووصفا
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وإذا
مـا
لاحظَته
نلتَ
عين
الشمْ
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سِ
مِــنْ
وجهــه
ولا
حظْـتَ
خِشـْفا
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ســاقني
حيــن
شـاقني
لهـواه
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وسـقاني
مِـنْ
قهـوة
الحبِّ
صِرْفا
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إنْ
أمـاتَ
العشاق
بالهجر
أحيا
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هـمُ
وصـلاً
منـه
ولُطفـاً
وعطفـا
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وشــفى
مــا
بهـم
مـن
الوجـد
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تقـبيلاً
ولمـا
يجُـرُّ
ضما
ورشفا
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وفتـاة
كالشـمس
وجهاً
ومثلَ
الْ
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غُصـنِ
قـدّاً
وكـالكثيبينِ
ردْفا
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إن
أجــاعت
وشــاحها
أســبغت
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حجلا
وخلخالهـا
وقلبـاً
ووقفـا
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عاقني
عن
وصالها
الشيبُ
فاستَبْ
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دلـتُ
مـن
بعـد
قوتي
منه
ضعفا
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أحسـنُ
النـاس
ذو
جمـال
وحسـنٍ
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قهْقَـر
النفـسَ
عـن
هواها
وعَفَّا
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وإذا
عارضــــْته
عارضـــة
أعْ
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رض
عنهــا
وعـاج
عنهـا
وعفَّـا
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فلكــم
مــن
ســمينةٍ
تـتراءى
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وهْـي
فـي
بـاطن
السريرةِ
عجفا
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ومـن
النـاسِ
من
يريه
الليالي
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مِــنْ
تصـاديفهن
صـِرفا
فصـِرفا
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وهْـو
مـن
ذاك
صـارفٌ
نفسـَه
عن
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منهـج
الرشـدِ
والمكـارم
صَرْفا
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يـدّعى
الشـعر
وهْو
لمَّا
يُقِمْ
وز
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نـاً
ولَـمْ
يعرفَـنَّ
نحواً
وصَرْفا
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لـم
يحزْ
من
مكارم
الخلْق
جِنساً
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لا
ولمَّـا
يبلـغْ
من
العلم
صِنفا
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ولأِكْــلِ
الحــرام
مُــدّخِراً
نـا
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بــاً
وضِرْســاً
وللمظـالم
كفـا
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عـاجز
عـن
مراده
وهْو
في
العا
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لـم
أردا
طبعـاً
وأرغـمُ
أنفـا
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فحقيـقٌ
علـى
الـذي
مثـل
هـذا
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أن
يُنحَّــى
عــن
البلاد
ويُنفـى
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وحقيــــقٌ
بـــأن
يُمـــلَّ
قَلاءً
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وحــرىٌّ
بــأن
يعــافَ
ويُحفَــى
|
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فلكـــم
لحيــةٍ
حقيــقٌ
بــأن
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يحلـق
مـن
ربهـا
وتُنتـفَ
نتفا
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كيـف
ترجـو
نفسُ
امرئٍ
خَبُثَتْ
من
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طبْعِهـا
المسـتحيل
نشراً
وعَرفا
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كيـف
تُهـدَى
إلـى
الرشادِ
قلوبٌ
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أصـبحت
بالفسـاد
والغَـيِّ
غُلْفا
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