|
إلـى
اللـه
نرفـع
أمـراً
ألـمّْ
|
لنـا
منـه
فـي
كـل
وقـت
ألـمْ
|
|
ونشــكو
إليــه
أمــوراً
دهـت
|
وقـد
خصـنا
الحـزن
منهـا
وعمّْ
|
|
ونلجـــأ
فــي
شــأننا
كلــه
|
إليــه
ليكفيَنــا
مــا
أهــمّْ
|
|
ونطلــب
منــه
جميــع
الــذي
|
نريـــد
فيتحفنـــا
بــالنعم
|
|
ونــدعوه
فــي
كــل
أحوالنـا
|
بقلـــب
منيــب
إليــه
وفــم
|
|
عســـاه
يفــرج
كربــاً
لنــا
|
يضــيق
بـه
الصـدر
منـا
وغـم
|
|
عســـاه
يعالجنـــا
بــالمنى
|
ويكشــف
خطبــاً
دجـا
وأدلهـم
|
|
عســــاه
يوفِّقنــــا
كلَّنـــا
|
إلـى
أمـره
النـدب
والملـتزم
|
|
فإنـــا
جميعــاً
عبيــد
لــه
|
وفــي
بـابه
قـد
وقفنـا
خـدم
|
|
وكــم
نعمـة
قـد
حبانـا
بهـا
|
وأعظمهــا
خلقُنــا
مــن
عـدم
|
|
وكــم
رحمـة
منـه
وافـت
لنـا
|
وكــم
نقمــة
قـد
تـولت
وكـم
|
|
يكـفُّ
أولـي
البغـيِ
عـن
قهرنا
|
ويــدفع
ظلـمَ
الـذي
قـد
ظلـم
|
|
وأكرمنـــا
دون
كــل
الــورى
|
وعلَّمنـــا
علمَـــهُ
بـــالقلم
|
|
وقــد
خلـق
الكـل
مـن
أجلنـا
|
ومـن
أجلـه
الخلـق
منا
استتم
|
|
ومـــع
ذاك
نكـــثر
عصــيانه
|
فيـا
ويـح
عبـد
لـه
ما
احترم
|
|
ونـــذنب
ســـراً
وجهــراً
ولا
|
نبــالي
بمـا
فيـه
زلّ
القـدم
|
|
نبــاديه
بالسـوء
وهـو
الـذي
|
لنــا
منعــم
محسـن
مـن
قـدم
|
|
فيـا
مالك
الملك
يا
ذا
الجلا
|
ل
يا
صاحب
الجود
يا
ذا
الكرم
|
|
ويـا
خـالق
الخلـق
يـا
من
له
|
أيــادٍ
علينــا
تفيـضُ
الحكـم
|
|
بحرمـــة
طــه
نــبي
الهــدى
|
ومـن
جـاء
بالنور
يمحو
الظُلَم
|
|
وإخـــوانِهِ
الأنبيـــا
كلِّهِــم
|
وبالتــابعين
لهـم
فـي
الأمـم
|
|
تفضـــلْ
علينـــا
بعفــو
ولا
|
تــدعنا
لنهلـكَ
فـي
المزدحـم
|
|
وســهل
لنــا
توبــة
نحتمــي
|
بهـا
فـي
غـد
مـن
لهيب
الضرم
|
|
ولا
تحــرق
الجســم
يـا
سـيدي
|
بنيرانِـــه
فهـــو
لحــم
ودم
|
|
وكـــن
راحمــاً
ذلَّ
أرواحنــا
|
إذا
مـا
أتينـاك
يـوم
النـدم
|
|
وهبنــا
جميعــاً
لرحمـاك
يـا
|
رحيـم
وأجـزل
لنـا
فـي
القسم
|
|
وعنــا
تجــاوز
وكــن
منعمـاً
|
وداو
مـن
القلـب
هـذا
السـقم
|
|
وســامح
ولا
تخزنــا
فــي
غـد
|
فإنـــك
أولــى
حكيــم
حكــم
|
|
شـرعت
لنـا
الـدين
نمشـي
بـه
|
إليـك
علـى
ذا
الطريـق
الأمـم
|
|
وآياتــك
الواضــحات
اهتــدى
|
لهـا
فـي
الـورى
كـل
ذوق
وشمّ
|
|
تســمت
بأشــياء
وهــي
الـتي
|
عليهـا
لسـان
الجهـول
انبكـم
|
|
فيــا
فــوز
عبـد
تـراءت
لـه
|
إلــى
أن
رآهـا
لهـا
فـالتزم
|
|
وأمســى
وأصــبح
يســمو
بهـا
|
وبــالعز
فـي
فهمهـا
والحشـم
|
|
فيــا
ظــاهراً
والسـوى
بـاطن
|
ويــا
باطنـاً
والسـوى
مرتسـم
|
|
تجليــت
فــي
كــل
شـيء
كمـا
|
أردت
فــداء
الضــلال
انحســم
|
|
وبصـــرتنا
بـــالتجلي
وفــي
|
بصــائرنا
نــورك
المحـض
تـم
|
|
وحــولت
عنــا
حجــاب
العمـى
|
وأوضـحتَ
مـا
كـان
فينا
انبهم
|
|
وأنــت
المنــزه
عـن
كـل
مـا
|
يـرام
مـن
الكـون
أو
لـم
يرم
|
|
وأنــت
المُســبَّح
فــي
ملكــه
|
بقبــح
الصـياح
وحسـن
النغـم
|
|
وأنــت
الموحَّــد
منّــا
ومــن
|
جميــع
البرايــا
بحـالٍ
أتـمّ
|
|
وشـرك
أولـى
الجهـل
دعوى
فقط
|
كمـا
يقتضـي
ذاك
حلـم
الحكـم
|
|
بـل
الشـرك
والكفـر
قـد
وحَّدا
|
لأنهمـــا
نـــوع
خلــق
هجــم
|
|
فمـا
فـي
الوجـود
سـوى
واحـد
|
وأفعـــاله
لا
ســوى
ذاك
ثــم
|
|
فلا
تعرضــوا
عنــه
أنتـم
بـه
|
كمـا
الفعل
من
فاعل
ما
انقسم
|
|
وقومــوا
إلــى
بـاب
إحسـانه
|
لتحيـوا
بإقبـال
محيـي
الرمم
|
|
ولا
تكســلوا
أو
تخـافوا
علـى
|
نفوســكمو
منــه
فـاللطف
جـم
|
|
ولا
تنفــروا
عنـه
فهـو
الـذي
|
دعــاكم
إليــه
بأهـل
العصـم
|
|
فعيـــن
الجلال
إليكــم
رنــت
|
ووجــه
الجمـال
زهـا
وابتسـم
|
|
وأنتــم
عبــادُ
كريــمٍ
ومــا
|
ببخــــل
إلهكمــــو
متهـــم
|
|
فـــإن
الــذي
هــو
رب
لنــا
|
قريــب
إلينــا
ســناه
وهــم
|
|
وجـــدنا
بــه
ومــددنا
بــه
|
وضــُمَّ
بــه
شــملُنا
وانتظــم
|
|
فلا
تقنطـوا
منـه
والجـوا
إلى
|
حمــاه
ولـوذوا
بهـذا
الحـرم
|
|
وإن
عطايـــــاه
مبذولـــــة
|
وقــد
فــاز
قاصـدها
واغتنـم
|
|
فسـبحان
مـن
أعجـز
الكـل
عـن
|
معـاني
الوصـول
إذا
الكـل
همّ
|
|
وجـل
الـذي
أوقـف
العقـل
فـي
|
قصـــور
وحيــر
كــلّ
النســم
|
|
فلا
الفكــــر
يعرفـــه
لا
ولا
|
لـه
يـدرك
الفهـم
حيـث
اقتحم
|
|
فســلم
إليــه
وكــن
طالبــاً
|
لــه
باجتهــاد
وخــل
الـوهم
|
|
وإن
شــئت
قـم
بعـد
هـذا
لـه
|
بنفســك
ســعياً
وإن
شـئت
نـم
|
|
وكــن
ســائراً
بشـراع
التقـى
|
إليــه
بــه
إن
جــدواه
يــمّ
|
|
فيــا
ربنـا
كـن
معينـاً
لنـا
|
وسـاعد
علـى
مـا
دهـى
واصطلم
|
|
ولا
تــترك
القلــب
فـي
حيـرة
|
وجهـل
بـه
البعـد
عنـك
انتقم
|
|
وصــل
وســلم
علــى
المصـطفى
|
شــفيع
البريـة
زاكـي
الشـيم
|
|
ومــن
قـد
أتـى
رحمـة
للـورى
|
وعنــا
بــه
قـد
أزيلـت
نقـم
|
|
ورضـــوان
ربـــيَ
عــن
آلــه
|
ذوي
المجـد
والقدر
فينا
الأشم
|
|
وأصــحابه
الغـر
أهـل
التقـى
|
كــواكب
فضــل
إليهــا
يــؤم
|
|
وعــن
تــابعيهم
بخيــر
وعـن
|
مشـايخنا
القـوم
أهـل
الهمـم
|
|
وعــن
كــل
إخواننــا
دائمـاً
|
بغيــر
انتهــاء
وغيــر
عـدم
|
|
مـدى
الـدهر
مـا
هـب
ريح
وما
|
تـوالى
علـى
الروض
صوب
الديم
|
|
ومـا
قـال
يـدعوه
عبـد
الغني
|
إلـى
اللـه
نرفـع
أمـراً
ألـم
|