|
جـرد
النفـس
وانههـا
عـن
هواهـا
|
لا
تـــذرها
فــي
غيهــا
تتلاهــى
|
|
زكهـا
بـالتقوى
فمـا
تفلـح
النف
|
س
بحــــالٍ
إلا
علـــى
تقواهـــا
|
|
واسـتملها
عـن
المراعـى
الوبيـا
|
تِ
إذا
استرســَلت
إلــى
مرعاهــا
|
|
واتخـذ
فـي
مراصـد
الكيـد
منهـا
|
حَرَســـاً
يكســرون
صــَعبَ
قواهــا
|
|
فلهـــا
للعصــيان
ميــل
عظيــم
|
لـو
نفتـه
عـن
طبعهـا
مـا
عداها
|
|
ولهــا
فــي
المتــاب
شـدة
عجـزٍ
|
بِعِــدات
التســويف
نيطـت
عُراهـا
|
|
ولهــا
فــي
المتــاب
مكـر
خفـيُّ
|
جعلتـــه
تلبســـا
مــن
حُلالهــا
|
|
إن
كيــدَ
الشــيطان
كـان
ضـعيفاً
|
ودواهـــي
النفـــوس
لا
تتضــاهى
|
|
فــتيقض
لهــا
وقــد
أمكــن
الأم
|
ر
فمــا
الحــزم
تركهـا
ومناهـا
|
|
فاعتقلهـا
فـي
مبرك
الزهد
بالخو
|
ف
إلــى
أن
تبــدو
هــزالاً
كلاهـا
|
|
فــإذا
انحلــت
القُــوى
فأثرهـا
|
لمراعــي
اليقيــن
تشـفي
طواهـا
|
|
وإذا
أرزمــت
وحنــت
لألـف
الطـب
|
ع
فـــارفض
حنينَهـــا
وبكاهـــا
|
|
فمــروج
اليقيــن
فيهــا
زُهــورٌ
|
معصــرات
التوفيـق
تسـقي
رباهـا
|
|
مــا
رعاهــا
حــيٌّ
فعـاشَ
ولا
مـي
|
ت
فلــم
يحــيَ
ريثمــا
يرعاهــا
|
|
ومـــتى
هـــب
للقبـــول
قبــول
|
بيــن
روضــاتها
وفــاحَ
شــذاها
|
|
فاســر
بالـدهس
لا
الحـزون
بليـل
|
آمنـــاً
مــن
كلالهــا
وَحَفاهــا
|
|
مــا
ســَرَت
للأوطــان
نفســك
إلا
|
حمـــدت
غـــب
صـــبحه
مســراها
|
|
أنـت
فـي
هـذه
الرسـوم
العتيقـا
|
ت
غريــــب
فخلهــــا
وَبَلاهــــا
|
|
والبـدار
البـدار
للمـوطن
الـدا
|
ئم
حيــث
الحيــاة
ألقَـت
عصـاها
|
|
قـد
تـراءت
لـك
الخيـام
فمـا
عج
|
زك
عــن
أن
تحــلَّ
وســطَ
فناهــا
|
|
شـَمِرّ
الـذيل
واركـب
الليل
واصحب
|
ذات
صــبر
فمــا
السـلوك
سـِواها
|
|
وعلــى
الأيــن
فاحتمـل
كـل
خَطـبٍ
|
سـوف
تحلـو
الخطـوب
فـي
عقباهـا
|
|
وإذا
شـــقت
المســـالك
طـــالت
|
قصــّر
الشــوق
للحــبيب
مــداها
|
|
مــا
الكـرى
والـبروق
سـاهرة
إن
|
كـان
فـي
الشـوق
صـادقاً
دعواهـا
|
|
خلــف
العــالم
الطـبيعيَّ
وارحـل
|
للــتي
لــم
تُخلـق
لـدار
سـِواها
|
|
هـــذه
معـــبر
وتلـــك
مقـــامٌ
|
فاعبروهــا
لا
تعمــروا
مغناهــا
|
|
عجبــاً
مــن
محجوبــةٍ
فـي
كـثيف
|
عنصــر
العــالم
اللطيـف
رماهـا
|
|
نســـيَتْ
أنســـها
بمقعــد
صــدق
|
وتجــــافت
لويلهـــا
وشـــقاها
|
|
حبســت
فــي
ضــنك
ووحشــة
طبـع
|
فتمنـــت
أن
لا
يحـــول
عناهـــا
|
|
ليتهــا
حلقـت
إلـى
الرفـرف
الأخ
|
ضــر
حيـث
الأنـوار
تغـذو
قُواهـا
|
|
رجّعــي
يــا
ورقــاءُ
نوحَــكِ
للأل
|
ف
فــإن
الــولهى
تبــث
جواهــا
|
|
وانـدبي
المعهد
القديم
عسى
الرج
|
عــة
قــد
آذنــت
إليــه
عَسـاها
|
|
وانقـذي
مـن
اشـراك
سـجنك
شـوقاً
|
لريـــاضٍ
نشـــاتِ
بيــنَ
رُباهــا
|
|
جــاذبي
كفــة
الحبالــة
فالحـا
|
بــل
مــوف
بمديــةٍ
قــد
نضـاها
|
|
واسرحي
في
الرياض
من
ملكوت
الله
|
ترعيـــنَ
فيضـــه
فـــي
فضــاها
|
|
لـو
شـجاك
التذكار
من
لوعة
البي
|
ن
لمزقــت
القلــب
آهــاً
وواهـا
|
|
عــالم
الكــون
والفســاد
بليـا
|
تِ
لــك
الاختيــار
فيمــا
عـداها
|
|
رشــحتك
الألطـاف
للحضـرة
العلـي
|
ا
أمــا
ترغــبين
فــي
لقياهــا
|
|
لهـف
نفسـي
علـى
النفوس
النفيسا
|
ت
أضـــاعَت
أقـــدارَها
وعُلاَهـــا
|
|
بـرزت
مـن
مضـارب
الحـق
فـي
أفض
|
يــة
الأمــر
فاســتباها
هواهــا
|
|
تــانف
الــواديَ
المقــدس
رَعيـاً
|
ورعــت
حيـث
الأسـد
تفـري
فراهـا
|
|
لـــو
تمنـــت
خلاصــَها
أدركتــه
|
وغـــدت
لا
تــراع
وســط
حِماهــا
|
|
مـا
أرادت
مـن
جيفة
الزخرف
الحا
|
ئل
لــو
أبصــرت
ســبيلَ
هُــداها
|
|
تتجلــى
لهــا
الحقــائق
لا
غــي
|
ن
ولا
غيــــم
ســــاترٌ
ملاهــــا
|
|
بــاهرات
الجمــال
يـدعين
للـوص
|
ل
فتــأبى
النفــوس
أن
تهواهــا
|
|
غرهــا
الجهــل
فاطمــأنت
إليـه
|
أن
جهــل
النفــوس
أصــل
شـقاها
|
|
أيهــا
النفـس
علـم
معنـاكِ
بَحـرٌ
|
فـي
عميقـات
غَمـره
العقـلُ
تاهـا
|
|
لـو
شـهدت
المسطور
في
نسخة
الغي
|
ب
ومعنــاك
مــا
حــوت
دفتاهــا
|
|
وكشــفتِ
المســتور
فيــك
لأيقــن
|
تِ
بــأن
الوجــود
فيــك
تنــاهى
|
|
أنــتِ
فــي
هيكــل
خــبيئة
أمـرٍ
|
مـــن
حكيـــم
لحكمــةٍ
أمضــاها
|
|
فــأميطي
قــذاة
عينـك
مـن
بيـن
|
زوايــــاه
تــــدركي
إياهــــا
|
|
فالخفايـا
عَلَيـكِ
فـي
لوحك
المحف
|
وظ
لــو
مـا
كشـفت
عنهـا
غطاهـا
|
|
آهِ
يــا
نفـس
والبقيـة
مـن
عمـر
|
ك
قــد
أشــرفت
علــى
منتهاهــا
|
|
أهِ
يــا
نفــس
أدركيهــا
فلا
مـط
|
مــع
بعــد
الفـراق
فـي
لقياهـا
|
|
ودعيهــا
بالصــالحات
عســى
نـف
|
حـــةُ
تـــوب
وَرَحْمـــةٍ
تغشــاها
|
|
لســتِ
فــي
هـذه
الحيـاة
علـى
ش
|
يـء
سـوى
مـا
تلفيـن
فـي
عقباها
|
|
فاصــدري
عـن
غمـار
باطلهـا
عـط
|
شــى
فأصــدى
عطاشــها
أرواهــا
|
|
ومســـير
العطــاش
أقطــع
للــبِ
|
يــدِ
وخيـر
الأظمـاء
مـا
أحفاهـا
|
|
فــــاطمئني
وأوّبـــي
وأنيـــبي
|
وأخلصــي
مــن
أفاتهــا
وبلاهــا
|
|
أهِ
يـــا
نفـــس
والعلائق
أعــدا
|
ء
شـــداد
وأنــت
مــن
أســراها
|
|
ينــدبون
اللــوى
وأنــدب
نجـداً
|
كـل
عيـن
تبكـي
علـى
مـا
شـجاها
|
|
ليــت
إنـي
بيسـجن
أجتلـي
النـو
|
ر
مــن
العــالم
الـذي
لا
يبـاهى
|
|
اسـتمد
الفيـوض
فـي
فيضـه
الـوه
|
بـــيّ
أو
تملأ
الســـيول
زباهــا
|
|
قطعــت
بــي
قواطـع
الـدهر
عنـهُ
|
حاجــة
فـي
نفـس
الزمـان
قضـاها
|
|
كشـفت
لـي
عنـه
الحقـائق
والحـق
|
شــــهيدي
بــــأنه
منتماهــــا
|
|
وارث
الأنبيـــاء
علمــاً
وحُكمــاً
|
وســفير
عنهــا
إلـى
مـن
عـداها
|
|
أدرك
الملــة
الحنيفيــة
الــبي
|
ضـــاء
إذ
فوضــت
لــه
شــكواها
|
|
تتضــنى
مروعــةً
تنــدب
الأبــرا
|
ر
حزنــــاً
همالـــةٌ
مقلتاهـــا
|
|
فأثــارته
شــربة
النهـر
والغـي
|
رة
للـــه
فــي
رضــا
مصــطفاها
|
|
فحماهـــا
وســـامها
وكــذاك
ال
|
أســدُ
تحمــى
عرينَهــا
وحِماهــا
|
|
ردهـــا
مثــل
رد
يوشــع
للشــم
|
س
وقــد
غــاب
نورهــا
وضــياها
|
|
عجبــاً
أشــرقت
مـن
الغـرب
شـمسٌ
|
فاتَتنــا
للشــرق
يســعى
سـناها
|
|
إنهـــا
آيـــة
وإن
كــان
لابــد
|
عَ
مــن
العــارفين
مــن
شـرواها
|
|
درجــات
الكمــال
والفضـل
لا
تـح
|
صــى
وقــد
حــاز
شــأنه
أعلاهـا
|
|
تلـــك
آثـــاره
لـــه
شــاهدات
|
إنـــه
للعلـــوم
قطــبُ
رحاهــا
|
|
طلعــت
مــن
جبـال
مصـعب
والـزا
|
ب
جبـــال
مــن
علمــه
أرســاها
|
|
ثــم
دارت
بـالأرض
كالفَلَـك
الـدَوّ
|
ارِ
لا
تحصـــر
النُهـــى
أقصــاها
|
|
جـــاء
تفســـيره
بمعجــزة
قــد
|
بهــرت
أهــل
الابتــداع
ســطاها
|
|
يــبرق
الحـق
مـن
مصـادره
العـل
|
يــا
وينهــل
العلـم
مـن
مجلاهـا
|
|
وحـدته
العقـول
فـي
الفـن
حكمـاً
|
فنفينـــا
الأنـــداد
والأشــباها
|
|
فانهضــي
نهضــة
الغضـنفر
لا
تـؤ
|
ليــن
جهــداً
فـي
قتلهـا
وَجَلاهـا
|
|
واســتعدي
الأجنــاد
مــن
طاعَــة
|
اللـه
فقـد
عَـزّكِ
النصـير
سـواها
|
|
واعلمــي
إن
طاعـة
اللـه
لا
ينـه
|
ض
إلا
بـــالعلم
قطعـــاً
بِناهــا
|
|
دونــك
الجـد
أفرغـي
فيـه
أنفـا
|
ســك
فــالهزل
ضـاق
عنـه
مـداها
|
|
واســتمدي
الأنــوار
مــن
كلمـات
|
اللــه
إن
الهــدى
بحــقٍّ
هـداها
|
|
هـي
مـرج
البحريـن
فالتقطي
الجو
|
هَــرَ
مــن
ذا
وذاك
مــن
فحواهـا
|
|
شــرب
العــارفون
منهـا
فهـاموا
|
بمـــذاقين
مـــن
رحيــق
طلاهــا
|
|
راع
خلــف
الســتور
مـا
أظهرَتـهُ
|
مـن
جَمـال
فكيـف
مـا
فـي
خفاهـا
|
|
إن
للــه
فــي
الخفــاء
نفوســاً
|
فـــي
ميــادين
قدســه
أخفاهــا
|
|
حجبَتهــا
ســتائر
اللطــف
عنهـا
|
وجلاهــا
مــن
أمــره
مــا
جَلاهـا
|
|
أخــذتها
عنايَـة
اللـه
عـن
أطـو
|
ارهــا
فـانتهت
بهـا
فـي
حماهـا
|
|
هــذه
الأخــذة
الـتي
أحرقـت
قـل
|
بــي
وطاشــت
قُـوايَ
تحـت
قواهـا
|
|
ليــت
إنــي
أذهبــت
ألـفَ
حيـاةٍ
|
وتــراءت
لــي
لمحـة
مـن
خباهـا
|
|
أنــا
مــن
تيمتــه
غــزلان
نجـدٍ
|
وخميلات
الرنـــد
بيـــن
رباهــا
|
|
لــيَ
نفــس
لـولا
التشـفي
بـأروا
|
ح
صــباها
ذابَــت
بحَــرّ
جواهــا
|
|
أن
يـك
الغـور
تيَّـم
الغيـر
فالأه
|
واء
تحـــدو
ظعونهــا
جربياهــا
|
|
لا
يواريــك
مــا
غزلــتِ
ولا
يُــد
|
فيــءُ
فـي
سـبرة
الشـتاء
كسـاها
|
|
هــذه
الحلــة
الــتي
نسـج
الـح
|
ق
رصـــيناً
الحامَهـــا
وســَداها
|
|
لـم
تحـك
فطـرة
العقـول
علـى
من
|
والهــا
ليـسَ
صـنعها
مـن
قواهـا
|
|
إنهـــا
فيضـــة
لدنيـــة
ســـي
|
قـــت
لربـــانيّ
وهــذا
ســَناها
|
|
وبحـور
الفيـوض
مـن
عـالمَ
الـوه
|
ب
لأهـــل
العرفـــان
لا
تتنــاهى
|
|
مــا
تلقيـتَ
يـا
محمـد
ذي
الفـي
|
ضـــة
إلا
وأنـــت
مــن
خلصــاها
|
|
شــمل
الكــونَ
منـك
مقبـاس
نـور
|
فأنــــارت
عشــــيّة
كَضــــُحاها
|
|
أرضــعتك
الآيــات
ألبــان
ضــرع
|
يهــا
فــبرهنت
هاديـاً
مقتضـاها
|
|
وأقامتــك
فـي
مقامـات
ذي
التـح
|
قيــق
حــتى
نزلــتَ
وادي
طُواهـا
|
|
هكـذا
يـا
ابـن
يوسف
الحق
لا
يتر
|
ك
نفســـاً
أحبهـــا
وارتضـــاها
|
|
أو
تُجلــى
لهــا
الحقـائق
كشـفاً
|
فتُـــرى
عنــه
عامضــات
عَماهــا
|
|
قصــرت
عنــك
بالثنــاء
وبـالحم
|
د
لســــاني
وعزنــــي
أملاهـــا
|
|
نســبتي
للمديـح
فيـك
كمـا
بنـي
|
وبيـــن
النجــوم
وســط
ســماها
|
|
قــد
تـبركتُ
بالثنـاء
علـى
وجـه
|
ك
أبغــي
بــهِ
مــع
اللـه
جاهـا
|
|
فــأجزني
بــدعوة
تجمــع
الخــي
|
رات
لـي
فـي
الـدنيا
وفي
عقباها
|
|
ظهــرت
منـك
فـي
الوجـود
كرامـا
|
ت
رجــوتُ
الأمــداد
مــن
جـدواها
|
|
هـل
أتـى
النحلة
الأباضية
الغراء
|
إن
أفلحــــت
بــــدرك
مناهـــا
|
|
إذ
أتـاح
التوفيـق
والقـدر
السا
|
بــق
إرغــام
كــل
مــن
ناواهـا
|
|
بتمـام
التفسـير
طبعـاً
علـى
هـم
|
ة
أملاكهــــا
وأســــد
شـــراها
|
|
فــدعتني
هواتــف
الحــق
للتــا
|
ريـــخ
والبشــر
شــامل
إياهــا
|
|
قلــــتُ
أرخ
دوام
جَـــدّ
وبشـــر
|
إن
هميــان
الـزاد
طبعـاً
تنـاهى
|
|
قيـل
فامـدح
زابـاً
وزد
قلـت
زابٌ
|
علـــم
الجهـــلَ
ظلمــةً
فجلاهــا
|