|
أبـا
الحـارث
اسمع
حديثاً
جرى
|
علـــى
قصـــة
راق
اعجابهــا
|
|
تشـــوقت
يومـــاً
للقيـــاكم
|
كــذا
يجـذب
النفـس
أحبابهـا
|
|
فســـرت
أنــص
إلــى
بــابكم
|
وقــد
أرهـق
النفـس
أتعابهـا
|
|
ولمــا
حللــت
بـدار
المـزور
|
ومــن
عـادة
الـدار
ترحابهـا
|
|
إذا
نحـــن
بالبــاب
زنجيــة
|
تقـــض
الشــياطين
أنيابهــا
|
|
فقلنــا
لهــا
أبلغـى
أمرنـا
|
فقـــالت
مقـــابركم
بابهــا
|
|
وهــرت
علينــا
كمــا
ينبغـي
|
وجـــاءت
قضــايا
وأســبابها
|
|
فقلنــا
لشــخص
إلــى
جنبهـا
|
فــديتك
هــل
أنــت
بوابهــا
|
|
فحـــول
عــن
وجهنــا
وجهــه
|
وجملـــة
نحـــو
واعرابهـــا
|
|
فقلـت
اقتصـر
يـا
بُنـيَّ
اقتصر
|
فمــا
نحــن
حــرب
وأحزابهـا
|
|
دعونــا
لهـا
قنـبراً
والفـتى
|
يصـــف
الصـــحاف
وينتابهــا
|
|
فقـال
اخرجـوا
نحـو
أشـغالكم
|
فمـــا
للطفيلـــي
أطيابهــا
|
|
فقلـــت
لنفســـي
لا
تضـــجري
|
فهـــذي
الزنـــوج
وآدابهــا
|
|
وقــال
بجنــبي
فــتى
صـبركم
|
تخــف
علــى
النفـس
أوصـابها
|
|
لعـــل
تمـــر
بكـــم
ســاعة
|
فتغنــى
الزنــوج
وأشــعابها
|
|
فيقضـــى
لنــا
فــرج
عاجــل
|
وتعلــم
فـي
الـدار
أصـحابها
|
|
فقلــت
وبالصــبر
ترجـو
لنـا
|
فقـــال
بصـــبرك
يجتابهـــا
|
|
فقلــت
نصــحت
وطـال
الوقـوف
|
وهاضـــت
جســـوم
وأصـــلابها
|
|
وعيــدانكم
ودخــان
الســجار
|
شــواظ
علـى
الـدار
الهابهـا
|
|
وفـــوج
يحــط
وفــوج
يطيــر
|
ورقــص
الجــواري
وألعابهــا
|
|
وأغـــرق
وقـــتي
بلا
طـــائل
|
تمــــط
ســـعال
وأضـــرابها
|
|
فقلـــت
العطالـــة
مشــئومة
|
وشــر
وقــد
طــال
اســهابها
|
|
فقمـــت
أصــلي
إلــى
خلــوة
|
تــبين
فــي
الـدار
محرابهـا
|
|
وطــالت
صــلاتي
ولــي
وقفــة
|
إلـــى
أن
تقشـــر
أرابهـــا
|
|
وبعـــد
الصــلاة
علــت
ضــجة
|
مــن
الــذكر
أطنـب
أحزابهـا
|
|
إلـى
أن
ثغـى
الجـن
من
هولها
|
وفــر
عــن
الــدار
أوشـابها
|
|
وزلزلــــت
الأرض
زلزالهــــا
|
وخـــذ
علــى
الأرض
أقهابهــا
|
|
فلـم
تغـن
شـيئاً
وطال
المقام
|
وحـــالت
ســـنون
وأحقابهــا
|
|
وفيهــا
بنينــا
لنــا
حـارة
|
وشــقت
مــن
الهنـد
أخشـابها
|
|
ومــن
حولهــا
جنــة
زخرفــت
|
وزانـــت
وأقطـــف
أعنابهــا
|
|
وقــارنت
فــي
منزلــي
زوجـة
|
أطـــالت
وأنجـــب
انجابهــا
|
|
ولــم
نـرزق
الاذن
مـن
عنـدكم
|
وضــوعف
فــي
الـدار
حجابهـا
|
|
ولمــا
ضـجرنا
انقلبنـا
إلـى
|
ديــــار
تطـــاول
تقلابهـــا
|
|
وعنـد
الرجـوع
جهلنـا
الطريق
|
وزال
عــن
الــدرب
أنصــابها
|
|
ولا
غــرو
هــذا
فـإن
السـنين
|
يــدور
علــى
النـاس
دولابهـا
|
|
وأضــللت
داري
إلــى
أن
بـدت
|
رســـوم
حـــوتهن
أعتابهـــا
|
|
وألفيــــت
ذريـــتي
كلهـــا
|
لطــول
المـدى
شـاب
أعقابهـا
|
|
وألفيـــت
كتـــبي
محشـــورة
|
فقيــل
بنـو
الفـار
تنتابهـا
|
|
فهـذا
أبـا
الحـارث
المنتهـى
|
لأعجوبـــة
طـــال
أغرابهـــا
|
|
فكـــل
بلايـــا
أبــي
مســلم
|
عليـــك
ونومـــك
أســـبابها
|
|
مـدد
الحـق
للقلـوب
الصـوادي
|
هــن
ملقـى
الأنـوار
والأمـداد
|
|
أخــذة
الحــق
للقلـوب
إليـه
|
بعـد
نسـف
الوجود
نسف
الرماد
|
|
بعـد
محـو
الآثـار
فـي
طلب
ال
|
عيـن
وكون
المريد
عين
المراد
|
|
بعــد
إدراك
وحـدة
الحـق
لـل
|
خلــق
والغــاء
وحـدة
الاحـاد
|
|
آه
والحــــب
لا
تســــليه
آه
|
وحــــرام
آه
علـــى
ذي
وداد
|
|
لـي
نفـس
أذابهـا
وهـج
الشـو
|
ق
فلـم
يبـق
غيـر
خفق
الفؤاد
|
|
قمـت
أشـكو
سـري
بسري
إلى
ال
|
حـب
فكان
الشكوى
كوري
الزناد
|
|
ثــم
ألقــت
إلــيَّ
هيمنـة
ال
|
حـق
اصطبر
في
محبتي
يا
مرادي
|
|
أيهـا
الراكـب
المغـذ
إلينـا
|
يـا
ترى
هل
شارفت
ذاك
الوادي
|
|
هـل
ترحلـت
منـك
شـبراً
إلينا
|
أنـت
فـي
مركـز
الهوى
متمادي
|
|
لـو
سـبرت
الأغـوار
منـك
لأبصر
|
ت
جـــثى
الأغيــار
كــالأطواد
|
|
لـو
خلعـت
الملابـس
السود
سود
|
نـاك
بيـن
الرجال
وسط
النادي
|
|
أنت
مفتاح
الكنز
لو
كنت
تدري
|
ومـــدار
الاصــدار
والايــراد
|
|
أنــت
منـا
ونحـن
منـك
ولكـن
|
حـال
مـا
بيننـا
سواد
الأعادي
|
|
لـو
نعارضـك
للجفـا
لم
نطالب
|
ك
بصـدق
الـدعوى
وصفو
الوداد
|
|
مـا
رأى
الحـق
فيـك
ذرة
مشهو
|
د
سـواه
فـالقرب
عيـن
البعاد
|
|
فتخلـــص
محمـــدياً
مـــن
ال
|
علـة
واشـطح
على
رؤوس
العباد
|
|
وافــن
فينــا
فلا
حيـاة
لحـي
|
وحيـاة
الاحيـاء
بعـد
النفـاد
|
|
واحتجـب
منـك
بـي
ولا
تحتجب
م
|
نـي
بسـجف
التـأثير
والايجـاد
|
|
دعـك
من
ذا
وتلك
والرسم
والاس
|
م
فمـا
فـي
الميدان
إلا
جوادي
|
|
واحـترق
مـن
محبـتي
أنا
وحدي
|
مـن
طباق
النيران
في
كل
وادي
|
|
فعلــى
صــحة
المحبــة
تسـتع
|
ذب
تعــذيب
الصــد
والابعــاد
|
|
وإذا
صــحت
المحبــة
لـم
تـح
|
فــل
برقـص
النعيـم
والانكـاد
|
|
لــي
فـي
كـل
ذرة
مـن
وجـودي
|
حكمـة
قـد
طويتهـا
عـن
عبادي
|
|
تتضـنى
مـن
الهـوى
والهوى
عن
|
ك
بــواد
وأنــت
عنــه
بـواد
|
|
لـو
صـدقت
الهـوى
لأغنـاك
حبي
|
وتمســكت
فـي
الهـوى
بمـرادي
|
|
نطلـب
الوصـل
والمقـام
صـدود
|
قبـل
قـض
الحصـا
وخرط
القتاد
|
|
رب
لبيــك
حجــة
الحـق
أعلـى
|
وعيــــون
الجلال
بالمرصـــاد
|
|
مــن
تــوليته
تجلــت
عليــه
|
مـن
كمـالات
الحـق
شمس
الرشاد
|
|
مـن
أنـا
والأنـا
فنـاء
ومحـو
|
فـي
مقـام
التعـذيب
والأشـهاد
|
|
مـن
أنـا
والأنـا
خيـال
ووهـم
|
فــي
مقـام
الخطـاب
والارشـاد
|
|
مــن
أنـا
والأنـا
مجـاز
وظـل
|
فــي
مقـام
الابعـاد
والايجـاد
|
|
بـل
أنـا
نسـبة
إلـى
أثـر
ال
|
حــق
شــهيد
للحـق
بـالانفراد
|
|
وأنـا
مـن
حيـث
انتسابي
إليه
|
ملـك
الحمـد
والثنـا
والمجاد
|
|
وأنـا
مـن
حيـث
انتسابي
إليه
|
كــل
نقـص
ووصـمة
فـي
عـدادي
|
|
وأنـا
مـن
حيـث
انتسابي
إليه
|
منعــش
الـروح
بـاعث
الأجسـاد
|
|
نسـبة
الحـق
صـرفتني
إلـى
أن
|
قمـت
أتلو
الزبور
بين
الجماد
|
|
إن
يكـن
فـي
الوجود
سمع
شهيد
|
فأنـا
فـي
الوجـود
أحسن
شادي
|
|
مــا
ألنــت
الحديـد
إلا
لأنـي
|
قمــت
أشــدو
بنغمـة
الحـداد
|
|
وارث
الفيـض
والكمـالات
والحك
|
مـة
مـن
جـده
الرسـول
الهادي
|
|
موصــل
السـالكين
بـالحق
لـل
|
حــق
ومُجلــي
مشـارق
الامـداد
|
|
مـد
مـن
فيضه
على
الكون
بحراً
|
فــي
قصـيد
كـالجوهر
الوقـاد
|
|
فشــهدنا
مــن
مـدّه
مجمـع
ال
|
بحريـن
مـن
غـامض
هنـاك
وباد
|
|
مــن
ســقته
المحمديـة
بحـراً
|
غيــر
بــدع
ارواؤه
للعـوادي
|
|
فتلقــى
تلــك
المعـارف
كشـا
|
ف
المعمــى
خــبيئة
الأفــراد
|
|
مــن
هيــولاوة
النبـوة
سـيطت
|
قبــل
اظهــار
نشـأة
الايجـاد
|
|
مصدر
الفضل
أحمد
ابن
أبي
بكر
|
شـــريف
الأبـــاء
والأجـــداد
|
|
عَلــــويّ
محمــــدي
عليــــه
|
من
سنا
النسبتين
سيما
السداد
|
|
جَمَـع
العلـم
في
مزاد
من
التق
|
وى
وللّــه
جمــع
ذاك
المـزاد
|
|
واقتنـى
الدر
من
علوم
الاشارا
|
ت
فحلــى
بـه
صـدور
النـوادي
|
|
جـرَّد
النفـس
من
كتائفها
فانه
|
لــت
عليهــا
لطـائف
الامـداد
|
|
وتلقـــى
مــن
ربــه
كلمــات
|
صـبها
الفيـض
في
لباس
المداد
|
|
بـرزت
مـن
مضـارب
الوهب
ثكلى
|
فهـي
مـن
فقـد
أهلها
في
حداد
|
|
فــترامت
تــبين
منــه
خفيـا
|
ت
طوَتهـــا
فريــدة
الحــداد
|
|
كُـن
شرحاً
لها
وأعظم
بهذا
الش
|
رح
كنـزاً
مـا
إن
لـه
من
نفاد
|
|
يـبرق
الحـق
مـن
مصادره
العل
|
يــا
وينهــل
حكمــة
للعبـاد
|
|
قـام
بالشـرع
والحقيقـة
يدعو
|
باللســانين
للهـدى
والرشـاد
|
|
شـكل
نـور
بـهِ
خبايـا
زوايـا
|
رقبتهــــا
دوائر
الافــــراد
|
|
جـامع
مـن
ذخائر
العلم
والحك
|
مـة
ذخـراً
يبقـى
ليوم
المعاد
|
|
حاصـر
مـن
معارف
القوم
ما
يف
|
تــح
للسـالكين
بـابَ
المـراد
|
|
ولعــت
بانتشـاره
مكـة
اللّـه
|
لتســري
أنــواره
فــي
البلاد
|
|
فـادارت
عليـهِ
مـن
فلـك
الطب
|
ع
نجــوم
التوفيــق
والاسـعاد
|
|
جـاء
تاريـخ
طبعـه
ضـمن
بيـتٍ
|
كــان
تاجــاً
لمفـرق
الانشـاد
|
|
سلســـبيل
مزاجـــه
زنجبيــل
|
فاشـــربوه
بمنهــل
الــوراد
|