|
تلـك
ربـوع
الحـي
فـي
سفح
النقا
|
تلــوح
كــالأطلال
مـن
جـد
البلـى
|
|
أخنــى
عليهــا
المرزمـان
حقبـة
|
وعــاثت
الشــمأل
فيهـا
والصـبا
|
|
موحشــــةً
إلا
كنــــاس
اعفــــر
|
ومجثــم
الــرأل
وافحـوصُ
القطـا
|
|
عـــرج
عليهــا
والهــا
لعلهــا
|
تريـح
شـيئاً
مـن
تباريـح
الجـوى
|
|
نســـألها
مــا
فعلــت
قطانهــا
|
مـذ
باينوهـا
ارتبعـوا
أي
الحشا
|
|
هيهــات
أقــوت
لا
مــبين
عنهــم
|
لمحتــف
بشــأنهم
غيــر
الصــدى
|
|
تربَّـــع
الآنـــسُ
مــن
أرجائهــا
|
واستأنسـت
بهـا
الظِّبـاء
والمهَـا
|
|
فقــف
بنــا
عنــد
غصـون
بانهـا
|
نشــاطر
الــورق
البكـاء
والأسـى
|
|
بحيــث
اهريــقُ
بقايــا
دمعــتي
|
وأتُبـع
النفـس
إذا
الـدمع
انقضى
|
|
إن
مـــن
الحــق
علــى
مــدامعي
|
إن
تسـبق
السـحب
علـى
ربـع
عفـا
|
|
عهــدي
بــدمعي
طاعــة
ادكـارهم
|
وبفــؤادي
إن
دعــا
العـذل
عصـى
|
|
ومــا
وقــوفي
عنــد
بـان
نبتـت
|
غصــونه
بيــن
الضــلوع
والحشـا
|
|
لـــولا
علاقـــات
هـــوى
تحكمــت
|
فـي
رمـق
عـاش
علـى
مثـل
الصـلا
|
|
دعنـــي
أبكـــي
دمنــاً
تغيــرت
|
وأطبـق
الجفـن
بهـا
علـى
القـذى
|
|
واذكــر
الإِلــف
الـذي
كـان
بهـا
|
وكيــف
شــطت
بهـم
عنهـا
النـوى
|
|
لــم
يبـق
فيهـا
أثـر
لهـم
سـوى
|
عيــارة
الخيــل
ومركــز
القنـا
|
|
لتســرح
البرحــة
فــي
براحهــا
|
فإنهــا
قــد
بلغــت
رأس
المـدى
|
|
لطالمــــا
أطلحتهـــا
ســـارية
|
تمــزع
فـي
الـدو
ولا
مـزع
الطلا
|
|
يعملـــة
قـــد
أخـــذت
ســلاحها
|
مــن
حقــب
يزينهـا
علـى
الـونى
|
|
روعــاء
ترمــي
مقلتيهــا
حـذراً
|
بيـــن
عزيـــف
وعـــواء
وصــدى
|
|
زيافـــة
تحــوذ
فــي
تجليحهــا
|
لا
فـرق
مـا
بيـن
الـدماث
والكدى
|
|
تخلـــف
الريــح
تكــوس
خلفهــا
|
كأنهــا
أعــارت
الريــح
الحفـا
|
|
كأنهــــا
مـــن
حقـــب
منحـــب
|
فــي
سـدفة
الليـل
هلال
قـد
خـوى
|
|
كأنمـــا
تطيـــر
مــن
لغامهــا
|
ســرب
ثغـام
فـوق
خيطـان
الغضـا
|
|
بلبهـــا
الــبرق
كــأن
ســائقاً
|
يزجهــا
نحــاً
بأســواط
الســنا
|
|
إذا
اســـتطار
أرزمـــت
رازفــةً
|
تواضــخ
الخــال
بــأجواز
الفلا
|
|
كأنمـــا
الــبرق
لهــا
أجنحــة
|
إذا
رأتــه
حلقــت
إلــى
السـهى
|
|
أقـــول
للـــبرق
وقــد
أرقنــي
|
لهيبــه
أعلــى
ثنيــات
الحمــى
|
|
ســـقيت
أجــراز
البلاد
فــارتوت
|
وحــظ
قلـبي
منـك
الهـاب
الجـذى
|
|
خـــل
نعامــاك
تــداجي
مهجــتي
|
فإنهـــا
محروقــة
مــن
الجــوى
|
|
أهفــو
إلـى
روح
النسـيم
راجيـاً
|
اطفـاء
مـا
بـالقلب
من
حر
الصلا
|
|
أعلـــل
الشــوق
يصــادي
كبــدي
|
نفـح
شـميم
الزهـر
من
تلك
الربى
|
|
فكــان
مــن
حيـث
الشـفاء
علـتي
|
ورى
زنـاد
الشـوق
مـن
ذاك
النثا
|
|
وربمـــا
منيــت
نفســي
طيفهــم
|
وهــو
حلال
لــي
أن
حــل
الكــرى
|
|
ولـــو
قصـــدت
هفـــوة
بحبهــم
|
أو
كنــت
مـن
عاهـدهم
فمـا
وفـى
|
|
أرســـلت
طرفـــي
رائداً
لدهشــة
|
بربعهـــم
تــذهلني
عــن
الأســى
|
|
هيهـــات
لا
تمنعنـــي
طلـــولهم
|
وســـانحات
ذكرهـــم
إلا
الضــنى
|
|
ولـــو
تركـــت
واجبــات
حبهــم
|
أو
صــدق
الهجـر
غرامـي
والقلـى
|
|
أو
تركـــت
لــي
كبــداً
صــحيحه
|
أو
جلـد
الحسـر
علـى
قـرع
النوى
|
|
لكــان
لــي
علـى
الطلـول
وقفـة
|
أبريــء
النفـس
بهـا
مـن
الهـوى
|
|
لكــن
لــي
قلبــاً
عرتــه
سـكرة
|
مــا
ضــل
فــي
غمارهـا
ولا
غـوى
|
|
وعـــاش
فـــي
صـــبابة
تعمــده
|
مـال
إليهـا
عامـداً
فمـا
ارعـوى
|
|
أســلو
بمــن
أهـواهم
وإن
نـأوا
|
وكيــف
يســلو
دنــف
بمــن
نـأى
|
|
وكيفمــا
خــامرني
الحــب
فمــا
|
قلـت
رشـادي
يـا
تـرى
أيـن
وخـى
|
|
ليعمــل
الحــب
بنفسـي
مـا
يـرى
|
إن
ضــلالي
بهــوى
القــوم
هــدى
|
|
مــا
زال
بــي
مـع
الهـوى
تبصـر
|
ينتقــد
الحـب
علـى
شـرط
الحجـا
|
|
ليــت
النهـي
مـع
الهـوى
تثبنـت
|
راســخة
فيهــا
عــزائم
التقــى
|
|
لــو
ارعــوت
مـع
الغـرام
نهيـة
|
لــم
يعبـث
الحـب
بـأحلام
النهـى
|
|
اعمـــد
ممـــن
ضـــللته
صــبوة
|
وبيــن
فــوديه
ضــياء
ابـن
جلا
|
|
لربمــا
يهفـو
التصـابي
بـالفتى
|
ومــــاله
وهفــــوة
إذا
عتـــا
|
|
إذا
تباشــــير
مشـــيب
وضـــحت
|
لــم
تعـذر
المـرء
مـتى
ولا
عسـى
|
|
وفـــي
الصــبا
معتبــة
وزاجــر
|
فكيـف
بالشـيب
إذا
العـود
انحنى
|
|
وكيـــف
بالشـــيب
إذا
تقــاربت
|
خطـاه
أن
يقصـر
فـي
الجـد
الخطى
|
|
يبـــادر
الكيــس
أخــرى
عمــره
|
فيرقــع
الخِــرق
ويوثــق
العـرى
|
|
إذا
تـــــولى
أمــــد
مــــوقت
|
لــم
يبــق
للرجعـة
منـه
مرتجـى
|
|
وكـــل
مــا
تلبســُه
مــن
جــدة
|
يعـروه
مـن
كـر
الجديـدين
البلى
|
|
ليــس
الجديــدان
وقــد
تباريـا
|
فـي
حزبنـا
يرضـيهما
منـا
الفدا
|
|
حــــتى
يثلا
معهـــداً
ومعهـــداً
|
ويمضـيا
ثَـمَّ
علـى
الـدنيا
العفا
|
|
لقــد
بلــوتُ
الـدهر
فـي
عفـوته
|
فكــدَّر
الصــوف
وجــدَّ
مــا
عقـى
|
|
وكان
الهي
الحق
اجتبيتُ
في
صروفه
|
بالصـبر
أجـدي
مـن
تفاريق
العصا
|
|
وســـاءني
الفــائت
إذ
أكســبني
|
كنـزاً
مـن
الصـبر
وفـوزاً
بالرضا
|
|
جبلـــة
الـــدهر
خـــؤون
حــوُّل
|
مــا
راش
فــي
عافيــة
إلا
بــرى
|
|
محـــافظُ
الثَّبــت
علــى
طبــاعه
|
حـتى
يحـولَ
الآل
بحـراً
فـي
الملا
|
|
لا
يســـتقيل
عـــثرة
مــن
نــدم
|
ولا
يقيــل
مــن
بــه
الحـظ
كبـا
|
|
فاصــحبه
ذا
عــزم
علــى
علاتــه
|
تزجـي
الهمـوم
للعلـى
على
الوجا
|
|
مســتحقبَ
الصــبر
علــى
مراســه
|
حـراً
سـليم
العـرض
من
سوء
النثا
|
|
تبلـــد
الخطـــب
إذا
جالـــدته
|
بمـــرة
تبســـه
بـــس
الســـفا
|
|
محجـــب
البــث
رحيبــاً
شــامخاً
|
مـن
رقـة
الشـكوى
وسـورة
الجفـا
|
|
إن
هـــزك
الممـــضُّ
هُــز
طــودَة
|
أو
هــزك
الهــولُ
فســيف
منتضـى
|
|
توســـــعه
مريــــرة
ويتقــــى
|
مـن
جـدها
مـا
يتقـى
مـن
الـردى
|
|
لا
تعــرف
النكبــة
منــك
جولــة
|
تخـذو
لهـا
خـذو
مقـودات
الـبرى
|
|
تصـــارع
الأخطــار
غيــر
ضــارع
|
لطودهــا
الأعصــم
ســاخ
أو
رسـا
|
|
تحــــس
كـــل
حـــادث
بســـيفه
|
فــإن
نبـا
حينـاً
فأحيانـاً
مضـى
|
|
لا
تعجـــل
الأمــر
أمــام
وقتــه
|
ولا
تفتـــه
حيـــث
آن
بـــالونى
|
|
وإن
تعارضـــك
اثنتــان
فاتخــذ
|
أولاهمــا
بــالحق
وانبـذ
الهـوى
|
|
إن
القـــوي
مـــن
ثنــى
شــرته
|
ومـن
إذا
مـال
إلـى
النفس
انتهى
|
|
والعقــل
والحــق
يحــرران
مــن
|
رق
الهــــوى
ويــــدعوان
للعلا
|
|
وشــر
مــا
صــاحب
مــرء
جهلــه
|
مطيـــة
فارهـــة
إلــى
الــردى
|
|
ومـــن
تكـــن
عـــادته
طاديــة
|
بالســوء
هــد
مجــده
بمـا
طـدا
|
|
إنـــي
أصــون
صــفحتي
مقتنعــاً
|
بمـــا
يطــف
مــن
علالات
الحســى
|
|
أنبـــو
والهـــوب
أواري
ســاعاً
|
عــن
مشــرب
أشـربه
علـى
القـذى
|
|
يحمــي
الكريــم
عرضــه
ويحتمـي
|
إن
يــرد
الآجــن
مـن
كـل
الركـى
|
|
لــم
التفــاني
فــي
بـراض
آسـن
|
لا
يرتجــى
مـن
نبضـه
بـل
الصـدى
|
|
ولا
أقــــامي
طمعـــاً
مقـــارداً
|
ولســت
ولاجــاً
بأســواء
القمــى
|
|
كــي
لا
تــرى
عيـن
خسـيس
مـوقفي
|
ببـــابه
منتظــراً
مــن
الجــدا
|
|
فــي
ظلــف
العيــش
علـى
قناعـة
|
تظلــف
للعــرض
عـن
السـوء
غنـى
|
|
ومطعــــم
تهــــافتت
ذبــــانه
|
قضـم
الهبيـد
منه
أحلى
في
اللها
|
|
مــا
أضــيع
النبـل
إذا
تطـاولت
|
خساســة
العــرق
عليــه
بـالحبى
|
|
حســبك
عيــش
ماجـد
علـى
الرضـا
|
بمـا
منـى
اللّـه
بـه
مـن
المنـى
|
|
مــا
أقــذر
العـرض
يلـب
عاذبـاً
|
برأســه
إلــى
لئيــم
المنتحــى
|
|
حــتى
بغـاث
الطيـر
تسـمو
أنفـاً
|
عــن
مشــرب
تخــزى
بـه
لمنتضـى
|
|
آليــت
لا
تعلــو
يـدي
يـد
أمـرء
|
يسـفلها
اللـؤم
ويطغيهـا
الغنـى
|
|
ولا
أرى
وجهـــي
نـــاظراً
إلـــى
|
وجــه
يحــق
أن
يحيــا
بــالحثى
|
|
وعيشـــــة
تمنهــــا
خساســــة
|
أشــد
عنــدي
قــذراً
مـن
الـوغى
|
|
قناعــة
المــرء
بمـا
يمنـى
لـه
|
مـن
حظـه
فـي
عيشـه
خيـر
المنـى
|
|
ولا
أذود
الحـــظ
عـــن
طريقـــه
|
فالســيل
حــظ
للوهـاد
لا
الربـى
|
|
ولا
أبـــات
شـــاكعاً
مــن
حســد
|
قــد
هيــأ
اللّـه
لكـل
مـا
كفـى
|
|
فــي
قســمة
اللّــه
وفـي
ضـمانه
|
وفـي
اقتنـاع
الرزق
غايات
الرضا
|
|
إذا
ســنا
اللّــه
لعبــد
نعمــة
|
فـواجب
العبـد
الرضـا
بمـا
سـنا
|
|
ففيـــم
يصـــلى
حاســد
ضــميره
|
والحـــظ
والأرزاق
تقــدير
مضــى
|
|
فــافطن
لاقســام
الحظــوظ
أنهـا
|
قضـــية
عادلـــة
بيــن
الــورى
|
|
ســــوية
وإن
تكــــن
تمـــايزت
|
حالــة
ذي
عــدم
وحـال
مـن
ثـرى
|
|
لــم
يظلـم
القاسـم
محرومـاً
ولا
|
كـــل
ســعيد
بــالثراء
محتظــى
|
|
مــا
ســرني
مــن
الـثراء
وفـره
|
إن
كـان
بيـن
اللـؤم
والحرص
نما
|
|
إذا
نفتــــه
هكــــذا
وهكـــذا
|
صــنائع
فــي
أهلهــا
فقـد
زكـى
|
|
فـــانهب
المــال
حقــائق
العلا
|
وفـك
مـن
أسـر
الزمـان
المهتـدى
|
|
مــا
بليــت
موهبــة
فــي
حقهـا
|
ووعـد
مـا
ضـن
بـه
الحـرص
البلى
|
|
فربمـــــا
تحســــبه
وضــــيعة
|
فـي
متجـر
الفضـل
بـه
الربح
نما
|
|
عقـــائل
المــال
إذا
أطلقتهــا
|
خلـدت
الـذكرى
وأنـت
فـي
الـثرى
|
|
مــا
الحــق
اللّــه
بنفـس
حوبـة
|
تحــوبت
مــن
شــحها
بــالمقتنى
|
|
أذل
أعنـــاق
الرجـــال
حرصــهم
|
لا
تســتقيم
عــزة
علــى
الكــدى
|
|
حــتى
مــتى
كأســي
ريــق
حيــة
|
ومطعمــي
مــن
زمنـي
مـر
الجنـى
|
|
أطـــال
الــدهر
حقوقــاً
كلهــا
|
كبــارح
الأروى
منيعــات
الــذرى
|
|
أقطــع
آمــالي
بمــا
فـي
بعضـه
|
أكــبر
مـن
كـاف
لـدرك
المبتغـى
|
|
كـــأن
تطلابـــي
أمــراً
ممكنــاً
|
أصــعب
مـن
أمـر
محـال
المرتجـى
|
|
لسـت
علـى
الحمـد
مـن
الأمـر
إذا
|
غـــالطته
خلابـــة
فيمــا
أتــى
|
|
آتيـــه
نصـــاً
فــإذا
خــادعني
|
فوضــتها
للّــه
يقضــي
مـا
قضـى
|
|
والخــــب
لا
تصــــحبه
فضـــيلة
|
ولــو
إلــى
النجــم
بـدهيه
غلا
|
|
إن
وســع
الــدهر
احتمـال
عـاجز
|
فهـــو
ســـلاحي
وتلادي
المجتــبى
|
|
ينفـــق
فـــي
إهــانتي
صــروفه
|
وانفــق
العــزم
وانفــاقي
زكـى
|
|
ذنــبي
إليــه
جَنَفــي
عـن
لـؤمه
|
وقــدرتي
علـى
احتمـال
مـا
جنـى
|
|
وإننـــي
الحتــف
علــى
لئامــه
|
انكــأ
فــي
حلـوقهم
مـن
الشـجى
|
|
أذود
عــــن
حريــــتي
بحقهـــا
|
واجهـــد
النصــر
لحــر
مبتلــى
|
|
وإننـــي
لا
أعــرف
الحــد
لمــا
|
أســطيع
أن
أنجــزه
مــن
العلـى
|
|
وإننــي
لا
أبطــل
الجهــد
إلــى
|
حــد
سـكوني
بيـن
أطبـاق
الـثرى
|
|
وإننــــــي
أدرك
أن
عازمـــــاً
|
مثــابراً
يــدرك
غايــات
المنـى
|
|
وإننـــي
فـــي
محــن
ســاورتها
|
علمــت
مــا
جهلتــه
مـن
الـورى
|
|
وإن
فــي
حســن
التــدابير
غنـى
|
عــن
خــدع
وهـو
عمـاد
مـن
وهـى
|
|
وإننــــي
لا
أســــتثير
ســـيئاً
|
ولا
أســـيىء
دفعـــه
إذا
عنـــى
|
|
ولا
أداجــــي
مـــالئاً
وذامـــه
|
علــي
غيظــاً
بفقاعــات
النثــا
|
|
ولا
أحـــابي
ملقـــاً
ذا
ظـــاهر
|
يشــف
لــي
ظــاهره
عمـا
انطـوى
|
|
مــــالي
وجهــــان
ولا
ثلاثــــة
|
إن
لـم
أكـن
حلـواً
أكن
مر
الجنى
|
|
تلـــك
ومــا
يفضــلها
خصائصــي
|
وليســها
عنــد
الزمــان
ترتضـى
|
|
أرى
الحيـــاة
كلهـــا
ذميمـــة
|
وخيرهـــا
وشـــرها
إلــى
مــدى
|
|
يحبهــا
المــرء
علــى
آفاتهــا
|
وتظهــر
الآفــة
عنــد
المنتهــى
|
|
يعيـــش
لا
تنـــدى
صــفاة
كفــه
|
يخــزن
للــوارث
كـل
مـا
اصـطفى
|
|
لا
تربــح
الــدنيا
بشـح
وافتقـد
|
مـا
أوضـع
الجـامع
من
خلد
الغنى
|
|
نهـــب
فيهـــا
هبـــة
فتنســري
|
وكلنـــا
مرتهـــن
بمـــا
أتــى
|
|
فاسـتخلص
المجهـود
فـي
تخليصـها
|
مـن
ورطـة
الـذنب
واشـراك
الهوى
|
|
وانتهـز
الفرصـة
فـي
اسـتدراكها
|
أوامــر
اللّــه
ومــا
عنـه
نهـى
|
|
إن
لهــا
عــدواً
إلــى
غايتهــا
|
والحــد
وافــاك
ودربــك
انقضـى
|
|
لا
تهملــــن
ذرة
فــــي
عبــــث
|
فلســت
متروكــاً
كمـا
شـئت
سـدى
|
|
تــودع
الأنفــاس
لا
تبكــي
لهــا
|
ورجـــع
مــا
ودعتــه
لا
يرتجــى
|
|
والكـــل
منهــا
راحــل
ببضــعة
|
مـــن
أجــل
مقــدر
علــى
شــفا
|
|
وآخـــر
الأنفــاس
يرجــو
وقتــه
|
فهــل
تــرى
تــأخيره
إذا
دنــى
|
|
وربمـــا
فكـــرت
فــي
تــأخيره
|
يكـون
أدنـى
لـك
مـن
فكـر
الحجى
|
|
فــودع
البــاقي
منهــا
مخلصــاً
|
بالباقيـات
الصـالحات
فـي
اللقا
|
|
دراكهــــا
مبـــادراً
دراكهـــا
|
فالأجـــل
المعــدود
للعمــر
خلا
|
|
أمـــا
تـــرق
لحيـــاة
أوذنــت
|
بغصــة
المــوت
وهــول
الملتقـى
|
|
ارحـــم
حيــاة
طلحــت
بوزرهــا
|
فـي
حمـل
ذر
منـه
ايهـان
القـوى
|
|
لــــو
قرصــــتها
ذرة
تـــألمت
|
فكيــف
بالنــار
إلـى
غيـر
مـدى
|
|
حـــتى
مـــتى
تنصــبني
أمنيــة
|
فـي
نصـرة
اللّـه
فتعـدوني
المنى
|
|
كــــأنني
مكبـــل
فـــي
شـــرك
|
يـزداد
فـي
الشـد
إذا
قلـت
وهـى
|
|
أشــاطر
النجــم
السـهاد
سـارياً
|
فيغـرب
النجـم
وعينـي
فـي
السرى
|
|
كـــأن
أفعـــى
نهشــت
حشاشــتي
|
مــن
لازب
الهــم
وتلهـاب
الحشـا
|
|
أذكــى
مـن
النـار
بقلـبي
زفـرة
|
يخرجهـا
المظلـوم
مـن
حـر
الأسـا
|
|
محـــترق
الأكبــاد
مــن
حســرته
|
لا
غــوث
لا
منصــف
لا
يلــوي
إلـى
|
|
أنفاســه
تطــرق
بـاب
العـرش
لا
|
تطـــرق
بابـــاً
غيـــره
ولا
ذرى
|
|
وعــــبرة
تســــفحها
أرملــــة
|
كــالخلق
السـحق
اصـارها
الضـوى
|
|
شـــعثاء
غــبراء
عليهــا
ذلــة
|
مهضــومة
الحــق
عديمــة
الحمـى
|
|
وصـــفرة
علـــى
يـــتيم
شــاحب
|
أدقعــه
الفقــر
وأشـواه
الضـنى
|
|
مفترســاً
علــى
العفــا
أديمــه
|
وهــل
لــه
عافيــة
علـى
العفـا
|
|
يغـدو
ويمسـي
ضـاحياً
تحـت
السما
|
كــــــأنه
عـــــود
خلال
أو
خلا
|
|
وضــربة
مــن
ســيف
بــاغ
نهكـت
|
وجــه
تقــي
مثـل
تشـهاق
العفـا
|
|
وســـطوة
مـــن
ظـــالم
شــباته
|
اقتــل
للاســلام
مــن
حـد
الظـبى
|
|
ينتهــــك
الحرمـــة
لا
تريغـــه
|
ضـــريبة
مـــن
كـــرم
ولا
تقــى
|
|
يـــرى
عيـــال
اللّـــه
قوســـه
|
يــترك
مـا
شـاء
ومـا
شـاء
رمـى
|
|
جـــاس
البلاد
بـــالبلاء
طاميــاً
|
فــبز
حــتى
بلـغ
السـيل
الزبـى
|
|
وغيـــرة
المــؤمن
فــي
ضــميره
|
يطفئهــا
الخـوف
ويطغيهـا
الأسـى
|
|
يهـــان
فـــي
حريمـــه
وعرضــه
|
ودينـــه
ومــاله
مثــل
اللقــا
|
|
حـــامي
الحميـــا
مــرس
لكنــه
|
شــرارة
فــي
ضــرر
لا
مــا
عـدا
|
|
مــا
تنفـع
الغيـرة
فـي
مكمنهـا
|
والســيف
فــي
قرابــه
لا
ينتضـى
|
|
حــتى
تكـر
الخيـل
كشـفاً
سـاقطاً
|
تهـوي
هـوي
العَاصـفات
فـي
الوغى
|
|
تجمــز
جمــزاً
بالكمــاة
شــزباً
|
عوابســاً
شمســاً
كسـيدان
الشـحا
|
|
فـــي
فيلـــق
حالكــة
أركــانه
|
يجلــل
الأرض
الــدجى
راد
الضـحى
|
|
مجـــرٍ
لهـــامٍ
أرعـــنٍ
هطلـــعٍ
|
غمــرٍ
دخــاسٍ
لجــبٍ
صـعبِ
الـذرى
|
|
يقـل
فـي
الجـو
عجاجـاً
لـو
هـوى
|
عليـه
رضـوى
لـم
يصـل
إلى
الثرى
|
|
تعشــش
العقبــان
فــي
أحضــانه
|
وتنشـــط
الـــوحش
إليــه
للخلا
|
|
لـــولا
بــروق
المشــرفيات
بــه
|
لـم
يهتـد
الجيـش
الأمـام
والقفا
|
|
تضــــطرم
الأرض
بمـــا
تقـــدحه
|
ســنابك
الجــرد
وتقـراع
الشـبا
|
|
يخلـــط
غـــوراً
بيفــاع
وقعــه
|
فــالأرض
فـي
بطـن
رحـاه
كاللهـا
|
|
تلتحـــم
الشـــكة
فــي
رعــاله
|
فـالجيش
فـي
بحـر
حديـد
قـد
طغى
|
|
مزمجـــر
الـــوغى
لــه
زمــازم
|
زهــاؤه
الليـل
إذا
الليـل
عسـا
|
|
بكـــل
صـــنديد
عتيـــك
داغــر
|
مهـــول
الكبــة
شــداد
الســطى
|
|
يســتحقب
الحتــف
ويشــهى
حينـه
|
إن
يكـن
الحتـف
انتصـاراً
للهـدى
|
|
تهــوى
النســور
ســيفه
ورمحــه
|
لمــا
يتحيــان
لهـا
مـن
القـرى
|
|
يصــدع
قلــب
الـروع
فـي
عزيمـة
|
أســرع
مـن
بـرق
وأورى
مـن
لظـى
|
|
كأنمـــا
جـــرازه
مـــن
قلبــه
|
لا
ينتحــــي
ضـــريبة
إلا
فـــرى
|
|
مجـــــرس
مضـــــرس
ممـــــارس
|
يمــترس
الخطـب
إذا
الخطـب
شـحا
|
|
علـــى
ســـراة
شـــامس
مطهـــم
|
معــترق
فــي
جريـه
عبـل
الشـوى
|
|
يخـــترق
الحومــة
فــي
وطيســا
|
يعــارض
الهــول
ويعتـام
الـردى
|
|
كـــــأنه
صـــــاعقة
منقضــــة
|
لوصــك
فــي
خطفتـه
الطـود
ثـرى
|
|
محتمشــــاً
مضـــطغناً
صمصـــامة
|
يحــوش
أكــداس
الرعـال
كالقطـا
|
|
أخلصــه
الصــقل
شــهاباً
قبســاً
|
وكمــن
المــوت
بـه
علـى
الشـبا
|
|
يفضـــفض
الجحفـــل
بـــاهتزازة
|
منـــه
ويجـــز
الأشــم
إن
هــوى
|
|
يشـــــفعه
بلهــــذم
ســــطامه
|
أعصـل
رقشـاء
علـى
الحتـف
انطوى
|
|
فــي
مــأزق
بيـن
كمـي
قـد
دمـى
|
يحشــرج
الــروح
وضــرغام
شصــى
|
|
يســـوط
فيـــه
فيلقــاً
بفيلــق
|
كمـا
يسـوط
البهـم
ضـرغام
الشرى
|
|
بهـــذه
الخطــة
نشــفي
غيظنــا
|
إن
كـان
بالسيف
أخو
الغيظ
اشتفى
|
|
بهـــذه
الخطـــة
نرضــي
ربنــا
|
إن
كـان
فينـا
طـالب
منـه
الرضا
|
|
بهــذه
الخطــة
نبتــاع
العلــى
|
في
الدين
والدنيا
ونستوفي
المنى
|
|
بهـــذه
الخطـــة
نرقــى
ســلباً
|
لغايـــة
حـــض
عليهـــا
ودعــا
|
|
أيــن
رجــال
اللّــه
مـا
شـأنكم
|
إلـى
مـتى
فـي
ديننا
نرضى
الدنا
|
|
إلــى
مــتى
نعجــز
عـن
حقوقنـا
|
إلـى
مـتى
يسـومنا
الضـيم
العدا
|
|
كنــا
أبـاة
الضـيم
لا
يقـدح
فـي
|
صــفاتنا
الــذل
ونقــدح
الصـفا
|
|
كنــا
حمــاة
الأنـف
لا
يطمـع
فـي
|
ذروتنـا
الطـامع
فـي
نيـل
الذرى
|
|
لا
يطــرق
الــوهن
عمــاد
مجـدنا
|
وكــم
ثللنــا
عــرش
مجـد
فكبـا
|
|
علـــى
م
صـــرنا
ســوقة
إمعــة
|
اتبــع
مـن
ظـل
واقـتى
مـن
عصـا
|
|
مــا
أفظــع
الشــنار
أو
يزيلـه
|
ضـرب
يزيـل
الهـام
من
فوق
الطلى
|
|
إلــى
مــتى
نخــزى
ولا
يؤلمنــا
|
كــالميت
لا
يــؤلمه
حــز
الشـبا
|
|
أذل
مـــن
وتـــد
حمــار
فيهــم
|
وقــدرنا
أقصـر
مـن
ظفـر
القطـا
|
|
إلــى
مــتى
نهطــع
فـي
طـاعتهم
|
ونتقــي
وليتهــا
تجــدي
التقـى
|
|
إلــى
مــتى
نهـرع
فـي
أذنـابهم
|
لا
ملتجـــى
لا
منتهــى
لا
منتحــى
|
|
إلـــى
مــتى
يعرقنــا
نكيرهــم
|
وجــورهم
وكفرهــم
عــرق
المـدى
|
|
إلــى
مــتى
تقضــمنا
أضراســهم
|
إلـى
مـتى
نحـن
لهـم
عبـد
العصا
|
|
إلــى
مــتى
تعركنــا
أحكــامهم
|
إلــى
مـتى
إلـى
مـتى
إلـى
مـتى
|
|
أي
محــب
اللّــه
فينــا
صــادقاً
|
لــو
صـدق
الحـب
لهـان
المختشـى
|
|
لا
ينتهـــي
إذ
نفســت
قروانهــا
|
محـارم
الليـل
إلـى
العـز
اللقا
|
|
أيــن
ذوو
الغيـرة
مـن
لـي
بهـم
|
قـد
حـزب
الأمـر
قـد
انقـد
السلا
|
|
اتســـع
الخـــرق
علــى
راقعــه
|
مـن
يشـعب
الـوهى
ويرتـق
الثـأى
|
|
أمـــا
شـــعرتم
أنهــا
داهيــة
|
شــعواء
لا
فصــية
منهـا
بـالولى
|
|
هبــوا
مــن
النومــات
أن
حيــة
|
تنبـاع
مـا
بيـن
شراسـيف
الحشـا
|
|
حـتى
علـى
المـوت
الـزؤام
نومكم
|
وليتــه
مــوت
علـى
حفـظ
الحمـى
|
|
قــد
اســتباحوا
حرمــات
دينكـم
|
ومنعــوا
الأرض
الحيــاة
والحيـا
|
|
تحكمــوا
فــي
ملككــم
ورزقكــم
|
وكبســوا
الـبئر
وقطعـوا
الرشـا
|
|
منّــوا
عليكــم
بغــذاء
طفلكــم
|
وحســوة
المــاء
ونفحــة
الصـبا
|
|
وأزعجـــوكم
عـــن
ظلال
ريفكـــم
|
وليتكــم
لـن
تزعجـوا
عـن
الفلا
|
|
وضــــايقوكم
فـــي
بلاد
ربكـــم
|
حـتى
علـى
مـدفن
ميـت
فـي
الثرى
|
|
لا
يرقبـــــون
فيكـــــم
إلا
ولا
|
ذمــة
ديــن
أو
ذمــام
مـن
رعـى
|
|
قــد
ســفكت
دمــاؤكم
وانتهكــت
|
حرمتكـــــم
ولا
حشـــــا
ولا
خلا
|
|
نقعــد
يشــكو
بعضــنا
لبعضــنا
|
ومــا
مفـاد
مـن
شـكا
ومـن
بكـى
|
|
فــي
بعــض
هــذا
غصــة
لعاقــل
|
لـو
رجعـت
أفكارنـا
إلـى
النهـى
|
|
يســومنا
الخســف
خســيس
نــاقص
|
لا
ديـــن
لا
حكمـــة
لا
فضــل
ولا
|
|
أليــس
ممــا
يــذهل
اللــب
لـه
|
عســف
الطـواغيت
بشـرع
المصـطفى
|
|
وحملنــا
علــى
اتبــاع
غيلهــم
|
مصـــيبة
لحرهـــا
ذاب
الحصـــى
|
|
هــب
ملكنـا
ورزقنـا
فيىـءً
لهـم
|
فــديننا
الأقــدس
فيىــء
وجــزى
|
|
للّـــه
مـــا
أفظعهـــا
داهيــة
|
لــو
عـوفيت
قلوبنـا
مـن
العمـى
|
|
فيــا
صــباحاه
وهــل
مـن
سـامع
|
لصــرختي
وهــل
يجيــب
مـن
دعـا
|
|
قــد
ذبــح
الملــك
وهــذا
دمـه
|
ومديـة
الذابـح
فـي
نحـر
الهـدى
|
|
وأصــــبح
اســـتقلالكم
فريســـة
|
بيـن
كلاب
النـار
يـا
أسـد
الشرى
|
|
أليـــس
عــاراً
أن
نعيــش
أمــة
|
مثـل
اللقـا
أو
غرضـاً
لمـن
رمـى
|
|
يلفنــا
الخــزي
إلــى
أوكــاره
|
ويحكــم
النـذل
علينـا
مـا
يـرى
|
|
أنشـرب
المـاء
القـراح
مـا
بنـا
|
مــن
مضــض
وليــس
بـالحلق
شـجا
|
|
ونهنــأ
العيــش
علــى
أكــداره
|
وتطعــم
الأجفــان
لــذات
الكـرى
|
|
وجنبنـــا
جنـــب
صــدىء
صــاغر
|
والسـيف
حـران
الحشـا
مـن
الصدى
|
|
كــم
نظلــم
الســيف
بمنـع
حقـه
|
أمــا
يجــازى
ظــالم
بمـا
جنـى
|
|
إن
الســــيوف
طبعـــت
لحقهـــا
|
وحقهــا
تحكيمهــا
علــى
الطلـى
|
|
والســـيف
شــهم
لا
يفيــت
حقــه
|
أصــدق
مـن
جـد
وأكفـى
مـن
كفـى
|
|
والســـيف
حــر
لا
يقــر
خازيــاً
|
يصــول
إن
ضـيم
وإن
صـال
اشـتفى
|
|
والسـيف
لا
يرضـى
الـذليل
صـاحباً
|
إن
الـــذليل
بالشــنار
مكتــوى
|
|
والســـيف
جلاء
المخـــازي
آخــذ
|
بضــبع
مــن
يكرمـه
إلـى
العلـى
|
|
والســـيف
مفتــاح
إذا
تضــايقت
|
علـى
الهمـام
الحـر
آراء
النهـى
|
|
والسـيف
كالصـدق
مـن
الرجـال
ما
|
هززتـــــه
لخطــــة
إلا
مضــــى
|
|
والســـيف
فـــي
عزومــه
مؤيــد
|
إن
شـــد
ســـد
وتقاضــى
وقضــى
|
|
والســيف
ذو
نقيبــة
فــي
أمـره
|
ثبــت
علـى
العلات
ميمـون
الخطـى
|
|
والســيف
أقضـى
بـالحقوق
حاكمـاً
|
أوفــر
حـق
مـا
بـه
السـيف
أتـى
|
|
والســيف
أوفــى
صــاحب
رافقتـه
|
إن
خانــك
الــدهر
وأهلــه
وفـى
|
|
والســـيف
فيـــه
فـــرج
معجــل
|
إن
الغمـــوم
بالســيوف
تجتلــى
|
|
والســيف
يعطيـك
الـذي
اشـتهيته
|
إن
تــوله
مـن
حقـه
كمـا
اشـتهى
|
|
إن
الســـيوف
عاهــدت
أربابهــا
|
بالمصـدر
الأقصـى
وتقريـب
القصـا
|
|
هــن
فحــول
الحـرب
منهـا
لقحـت
|
وهــن
يقتــدن
الفحــول
بـالبرى
|
|
والمجــد
حيــث
أبرقــت
وأرعـدت
|
ينبـــت
مـــن
ســاعته
ويرتعــى
|
|
مــا
بالنــا
نحصــنها
عقــائلاً
|
مــن
المقاصــير
عليهــن
الحلـى
|
|
أيــن
بنــو
الاسـلام
مـا
يعجزنـا
|
والعــزة
الكــر
بحومـات
الـوغى
|
|
أيــن
بنــو
القـرآن
هـل
ثبطكـم
|
كتــابكم
عــن
الجهــاد
للعــدى
|
|
أيـــن
غطــاريف
الجلاد
بــالظبى
|
أيــن
مشــائيم
الطعـان
بالقنـا
|
|
أيــن
بنـو
التوحيـد
لـو
صـدقتم
|
توحيــدكم
مـا
رقـص
الشـرك
علـى
|
|
أيــن
بنـو
الأحـرار
مـا
سـكونكم
|
والملــك
والـدين
حريـب
والحـرى
|
|
كــم
ذا
ينــاغيكم
مــبير
خـادع
|
أطـرق
كـرى
إن
النعـام
في
القرى
|
|
فجشـــــموه
جشــــماً
وبيلــــة
|
أو
تهصـروا
العظم
وتنزعوا
الشوى
|
|
هلـــم
شـــدوا
شـــدة
قاصـــمة
|
مريضــة
الشــمس
حميــة
الوحــا
|
|
ثبـوا
إلـى
الموت
كراماً
واندبوا
|
عزائمــاً
تســعر
تســعار
الصـلا
|
|
إن
ضــــراباً
بالصـــفاح
خطـــة
|
تــرد
مـا
فـات
وترسـي
مـا
هفـا
|
|
قــــد
آن
للاحـــرام
أن
نحلـــه
|
وننحــر
الهـدي
علـى
رأس
الصـفا
|
|
قـــد
آن
للصــائم
وقــت
فطــره
|
لطالمــا
ارمــض
بالصـوم
الحشـا
|
|
قـــد
آن
للوضـــوء
أن
ننقضـــه
|
بالسـافح
الثـائر
فرصـاد
الكلـى
|
|
نقــــر
أحلاس
الـــبيوت
خشـــعاً
|
أبصـــارنا
مغمضــة
عمــا
دهــى
|
|
نــدرس
تأريــخ
الالــى
تقــدموا
|
وحســبنا
اللّــه
تعــالى
وكفــى
|
|
إن
العظـــام
لا
تـــؤاتي
شــرفاً
|
ولا
أقاصـيص
الـوغى
تكفـي
الـوغى
|
|
والســـلف
الصــالح
ســل
ســيفه
|
وكــان
مـا
كـان
لـه
ثـم
انقضـى
|
|
تلـــك
الرفــات
طينــة
صــالحة
|
لغـــارس
وحـــارث
ومـــن
بنــى
|
|
أتبحثـــون
بينهـــا
عــن
عــزة
|
أوفــي
لعــل
فرجــاً
أوفـي
عسـى
|
|
تلكــــم
إذاً
أمنيـــة
مخلفـــة
|
وضـــيعة
العقــل
وجهــل
وعمــى
|
|
لنـــا
صـــفاح
ولهـــا
ســوابق
|
لكننــا
نصــفح
عـن
سـبق
العلـى
|
|
والمجــد
لا
يملــك
عــن
وراثــة
|
لكـن
بتحطيـم
الشـبا
علـى
الشبا
|
|
عــز
علــى
مــا
أثلــث
عهودهـا
|
كسـب
المعـالي
وانـدفاع
مـا
عنا
|
|
ولـــو
تقلــدنا
فعــال
أهلهــا
|
لـم
يعبـث
الفـأر
بهيصـار
الشرى
|
|
نعيـــش
فـــي
هينمــة
بــذكرهم
|
يعقبهـــا
واهــاً
وأنــى
ومــتى
|
|
نعـــم
لهـــم
ســـوابق
لكنهــا
|
لا
تنعــش
الجــد
إذ
الجــد
كبـا
|
|
معصـــومة
الـــذروة
لا
يبلغهــا
|
إلا
همـــام
باللهــاميم
اقتــدى
|
|
إذا
اتكلنـــا
قعـــدداً
عليهــم
|
لــم
يسـلم
المجـد
اذا
مـن
الأذى
|
|
شـدوا
الحزيـم
للهـوادي
فـانثنت
|
ودوخــوا
بـالعزم
صـعب
المرتقـى
|
|
واحمشــوا
الحــرب
إبـاء
ضـيمها
|
بـل
هـم
لهـا
متى
ذكت
عين
الذكا
|
|
هــم
علمـوا
الـدهر
مـراس
قرنـه
|
ثـم
انتهـى
بعـد
المـراس
مهتـدى
|
|
هـم
علمـوا
السـيف
مضـاء
عزمهـم
|
فهــو
قريـن
عزمهـم
حيـث
انتـوى
|
|
هـم
أدهشـوا
الهـول
بمـا
يهـوله
|
فانكفــأ
الهــول
شـكياً
بالضـوى
|
|
هـم
شـيدوا
المجـد
بمـا
ابيض
به
|
فــود
عــوادي
دهرهـم
حـتى
غطـا
|
|
هــم
عقــدوا
بـالعز
عيـن
همهـم
|
فلا
تـــداني
ذلـــة
لهــم
حمــى
|
|
لا
يطــرق
الضــيم
عزيــز
ركنهـم
|
ولا
يضـــام
عــائذ
بــه
احتمــى
|
|
هــم
أســغبوا
للمكرمـات
دهرهـم
|
فــدهرهم
للمكرمــات
فــي
طــوى
|
|
هــم
أجـدبوا
سـوحهم
مـن
وفرهـم
|
وهـــم
لأرض
اللّــه
غيــث
وحيــا
|
|
هــم
أنضــبوا
غـدرانهم
بجـودهم
|
وفجـروا
فـي
النـاس
ينبوع
الغنى
|
|
هـم
وسـعوا
الكـون
حلومـاً
وهـدى
|
وصــــائلاً
ونــــائلاً
ومجتــــدى
|
|
هــم
أمجـدوا
وانجـدوا
وأوجـدوا
|
وأفقـدوا
وطولـوا
البـاع
الـوزى
|
|
هـــم
جــردوا
وشــردا
وطــردوا
|
وأوعــدوا
وأوردوا
بحــر
الجـدى
|
|
هـــم
لكبـــات
الخميــس
حــدها
|
وجــــدها
وشـــدها
والمحتمـــى
|
|
هــم
إذا
الخيـل
ارتجحـن
بحرهـا
|
فـي
مـأزق
الـروع
ترامـوا
للردى
|
|
أولئك
القـــوم
وصـــيت
فخرهــم
|
إن
كـان
فـي
أسـماعكم
ذاك
الوحا
|
|
أســلافنا
ومالنــا
مــن
مجــدهم
|
إلا
حـــديث
بعـــدهم
لا
يفـــترى
|
|
لــم
التحجــى
بعــدهم
فـي
شـرف
|
عنـد
رفـات
القـوم
فـي
الأرض
حجا
|
|
نرفــع
منــا
أنفســنا
وننتخــي
|
كأنهــا
مـن
كسـبنا
تلـك
النخـا
|
|
نصــــحبهن
أنفســــاً
مثقلــــة
|
بطيئة
تحمـــل
أوقـــار
الــونى
|
|
تعـــزف
عــن
مضــوفة
إذا
عنــت
|
مجفلــة
عــن
المضــاف
إن
دعــا
|
|
إلا
نفـــــوس
عــــزم
عارفــــة
|
لهــن
جـأش
إن
طمـى
الهـول
رسـا
|
|
الاشـــدا
فـــي
أنفـــس
أبيـــة
|
يصــبرها
علــى
مقاســاة
الشـدا
|
|
تشــفع
أحســاباً
زكــت
بمثلهــا
|
لهــا
بمــا
أصــله
الأصــل
أسـى
|
|
هلـــم
فلنحـــذو
حــذو
ســعيهم
|
فليـــس
للانســان
إلا
مــا
ســعى
|
|
ليســوا
رجــالاً
لا
نطيــق
فعلهـم
|
لكنهــم
جــدوا
وقصــرنا
الخطـى
|
|
تنــــاولت
أكفنــــا
ســـيوفهم
|
يــا
أســفاً
وعجــزت
عـن
السـطى
|
|
مـا
انطمسـت
مـن
دوننـا
سـبيلهم
|
قـد
نصـبوا
الأعلام
فيهـا
والصـوى
|
|
مــا
كابــدتنا
خطـة
عـن
شـأنهم
|
أفظــع
ممــا
كــادبوه
فانفــأى
|
|
هــم
غربــوا
وشــرقوا
وأيمنـوا
|
وأشــأموا
ومهــدوا
لنـا
الـذرى
|
|
وهـــم
ســروا
بجــدهم
وجهــدهم
|
فحمــدوا
صــباحهم
غــب
الســرى
|
|
همـــو
أقــاموا
ســنناً
شــامخة
|
تمثــل
الشــهب
ارتفاعــاً
وسـنا
|
|
هـم
أقدموا
ارتجرد
السراحيب
لها
|
تعطـش
الصـادى
إلـى
نـار
الـوغى
|
|
تزفــــي
الخميـــس
جحفلاً
فجحفلاً
|
مثـل
الـدبور
انجفلت
عنها
الطخى
|
|
يــاهي
مــالي
وعشــيري
أرملـوا
|
معاقــل
العــز
وأيتمـوا
العلـى
|
|
أيــن
رجــال
اللّـه
أيـن
غـارهم
|
قــد
هــدم
الحـوض
ودمـت
الركـى
|
|
أيــن
الــذين
استخلصـت
شـيمتهم
|
كأنهــا
الـدر
اليـتيم
المنتقـى
|
|
أيـــن
الــذين
محصــت
ســيرتهم
|
مكـــدرات
دهرهـــم
حــتى
صــفا
|
|
أيـن
الـذين
عرجـوا
إلـى
السـما
|
أعنـي
سـماء
العلم
والدين
الهدى
|
|
أيــن
شــموس
الأرض
أنــى
أفلــت
|
وأبقـت
النـاس
علـى
مثـل
الـدجى
|
|
أيـن
الخيـار
العـائذ
الكون
بهم
|
وصـفوة
الصـفوة
مـن
هـذا
الـورى
|
|
أيــن
ربيــع
الأرض
أيــن
غيثهـا
|
يــا
حربــاً
لا
غيثهـا
ولا
السـدا
|
|
أيــن
بقايــا
اللّـه
فـي
عبـاده
|
ظنــائن
اللّــه
وقــائذ
التقــى
|
|
أيـن
أسـود
الغيـل
ماذا
اغتالها
|
قــد
أســد
الثعلـب
فينـا
وضـرى
|
|
هيهـات
بعـد
القـوم
شـدت
رحلهـا
|
حميــة
الــدين
وصــارت
منتســى
|
|
أنشـــدها
مـــن
مســجد
فمعهــد
|
فمنهــــج
فمجمــــع
فمنتــــدى
|
|
فلــم
أجــد
منشـودتي
فـي
موضـع
|
ثــم
حدســت
أنهــا
رهـن
الـثرى
|
|
أرملــة
نــاحت
علــى
أحرارهــا
|
ثــم
ثــوت
آســفة
فيمــن
ثــوى
|
|
أواه
أواه
رزئنـــــا
بعــــدهم
|
وليتنــا
فــي
خلــف
عمــن
مضـى
|
|
مـا
فـي
الحمـى
مـن
دافـع
ومتـق
|
مــا
يعقـب
الخـزي
ولا
مـن
يتقـى
|
|
قــد
ضـاعت
الحرمـة
بعـد
صـونها
|
وشــنت
الغـارة
فـي
عقـر
الحمـى
|
|
وطــــرق
الحــــي
ذئاب
جــــوه
|
ودعــثر
الــزرب
وخـاس
المرتعـى
|
|
ادعـوا
رعـاة
الحـي
فـي
قبـورهم
|
إن
ســمع
الميـت
دعـاء
مـن
دعـا
|
|
ادعـوا
لهـا
الأمـوات
إذ
آيست
من
|
احيــائهم
لعــل
فيهـم
مـن
وعـى
|
|
يـا
أيهـا
الراعي
انتبه
فما
بقي
|
حـول
المراعـي
مـا
ثغـى
وما
رغى
|
|
يصـــخ
صــوتي
مســمعاً
ومســمعاً
|
لـو
كـان
مـن
يزعجـه
هـذا
الندا
|
|
أصـــبح
قـــومي
جثـــة
بــاردة
|
عــي
بهــا
الطــب
وعيـت
الرقـى
|
|
مــا
أثـر
النصـح
علـى
ألبـابهم
|
إلا
كآثــار
الحيــا
علـى
الحصـى
|
|
ومــا
رسـوخ
الـوعظ
مـن
قلـوبهم
|
إلا
كمـا
يرسـخ
فـي
الصـخر
الصدى
|
|
ولا
لاحـــــرار
الكلام
عنـــــدهم
|
تكرمــــة
ولا
لحــــر
مســــتوى
|
|
تنصــــحهم
فتجتـــوى
ديـــارهم
|
إن
الكـــرام
دارهــم
لا
تجتــوى
|
|
امحضـــهم
نصــائحاً
لــو
ذهبــت
|
إلــى
جمــاد
ذاب
أو
مــاء
جسـا
|
|
فتنثنــــي
نصـــائحي
مكارِهـــاً
|
يقرضـها
اللـوم
وينفيهـا
القلـى
|
|
ســـيدرك
النصــح
لــزاز
محــوذ
|
عـــزائم
الـــرأي
إذا
لاح
الجلا
|
|
لقــد
نفــت
عنـي
الرجـال
شـيمة
|
لـو
سـكنتهم
زلزلـت
قلـب
العـدا
|
|
لكننــــي
أعجـــز
أن
أفيتهـــم
|
تكــــذيبهم
بينـــتي
للمـــدعى
|
|
إن
القلـــوب
استشـــعرت
جبلــة
|
فتــاركت
أحلامهــا
إلــى
الهـوى
|
|
ليــس
العصــور
الغـر
إن
تكشـفت
|
بحســـنها
هاديـــة
لمــن
غــوى
|
|
كـــل
امرىـــء
بفعلــه
معتــبر
|
والســيف
بالشـفرة
يفضـل
العصـا
|
|
فتحـــت
عينــي
فرأيــت
غــافلاً
|
يحملـــه
الســـيل
وليتـــه
درى
|
|
ونائمــاً
والنــار
فــي
جثمـانه
|
كــأنه
جــزل
الغضــى
ومـا
وعـى
|
|
وراضــــياً
بذلــــة
مفتخــــراً
|
بـــأن
يعيــش
خازيــاً
ومــزدرى
|
|
ومؤمنــــاً
مستضـــعفاً
يغمـــزه
|
ظــالمه
مـن
الرجـا
إلـى
الرجـا
|
|
وعـــاقلاً
فـــي
رأيـــه
متهمــاً
|
وأرشـــد
الآراء
للحـــر
الــدوا
|
|
وحاســــداً
لنعمــــة
تخــــاله
|
أســعر
مــا
كـان
إذا
قلـت
خبـا
|
|
وبائعـــاً
لــوطن
فيــه
انتشــى
|
بلقمـــة
يلــذها
وهــي
الــودى
|
|
فهـــل
لنـــا
اســتقامة
وعــزة
|
وحالنـــا
مشــؤومة
كمــا
نــرى
|
|
وأغلــب
النــاس
الوفـاء
عنـدهم
|
مســـتهجن
وعهــدهم
علــى
شــفا
|
|
يجــرون
فــي
الأهـواء
لا
تكبحهـم
|
شـــكيمة
عـــن
دحـــل
ولا
هــوى
|
|
وأدعيـــاء
الفضــل
إن
دعــوتهم
|
لغمــرة
الجلــى
ترامـوا
للعـرا
|
|
همهـــم
فـــي
شـــهوات
طبعهــم
|
هـم
السـوام
فـي
ارتياد
المرتعى
|
|
ســريهم
مــن
جمــع
المـال
ولـو
|
أفلــس
مــن
مــروءة
ومــن
حجـى
|
|
إذا
دعــا
المجـد
تفـادى
ناقصـاً
|
وإن
دعـــاه
بـــذخ
قــال
أنــا
|
|
لا
يشــرف
اليــوم
بعقــل
مقــتر
|
والسـيد
الأقعـس
مـن
نـال
الغنـى
|
|
فخــذ
مــن
الغمـر
الـدني
رأيـه
|
إن
ملأ
الكيـــس
ودعــه
إن
ضــقا
|
|
تخاضـــعت
لــه
الرقــاب
عنــوة
|
وإن
جســـت
صـــفحته
وإن
ظمـــى
|
|
عصــائب
الاســلام
تلكــم
حالنــا
|
وليـس
يخفـى
فـي
الظلام
ابن
رجلا
|
|
مـا
تنتظـرون
فـي
التمـاس
طبكـم
|
قــد
نكـأ
الجـرح
وادنـف
الضـنى
|
|
ليـــس
لهــا
إلا
التفــاف
قــوة
|
بقــــوة
ومقتــــدى
بمقتــــدى
|
|
ليــــس
لهـــا
إلا
نفـــوس
طفئت
|
أضـغانها
واشـتعلت
فيهـا
التقـى
|
|
يلمهــا
الايمــان
قلبــاً
واحـداً
|
وجهتــه
اللّــه
وحشــوه
الهــدى
|
|
إذا
رمــــت
فقوســـها
واحـــدة
|
ومــا
رمــت
وإنمــا
اللّـه
رمـى
|
|
دب
إليكـــم
داء
مـــن
قبلكـــم
|
مــن
حســد
يســفعكم
ومــن
قلـى
|
|
فخلصــوا
الأنفــس
مــن
أدوائهـا
|
فقــل
مــن
مهمــا
أصـابته
نجـا
|
|
ولــو
تــآلفتم
علــى
ايمــانكم
|
وكــانت
الأوجــه
وجهــاً
ينتحــى
|
|
ومحصــــت
أنــــواره
قلـــوبكم
|
فصــفيت
مــن
فتنــة
ومــن
شـذا
|
|
ضـاق
علـى
الخسـم
الفضـاء
دونكم
|
وعــزه
الاركــاس
مــن
حيـث
نـزا
|
|
عســى
الــذي
قــدر
مـا
يهـولكم
|
يزيــل
بـاللطف
الخفـي
مـا
عنـا
|
|
ويمطــر
الــروح
علــى
ربــوعكم
|
فينضـــر
الــروض
وإن
كــان
ذوى
|