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بشـــراي
قـــد
نلــتُ
المنــى
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زار
الأحبـــــــةُ
موهِنــــــا
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لمـــا
ســرَوا
ليــلُ
الوصــال
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جميعُـــــه
أمســـــى
ســــَنا
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شــــرِقَت
بهــــم
أرجــــاؤهم
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أرَجــــاً
وأشــــرقت
الـــدُنا
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نزلــــوا
الحِمــــى
وحمـــوه
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بـــالبِيض
المواضــي
والقَنــا
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كـــــم
مهجـــــةٍ
مطروحــــةٍ
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بيــــن
المنايـــا
والمنـــى
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لكـــــن
علمــــتُ
بــــأنَّ
إذْ
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آنَ
الغنــــى
هـــان
العنـــا
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لــــم
يبــــقَ
ظـــبيُ
فَلاً
ولا
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غصــــن
النَقـــا
إلا
انثنـــى
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فــــدخلت
بســــتان
الســـرو
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رضي
الله
عنه
بهم
لألتقط
الجنى
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فرأيــــت
للــــداني
إليـــه
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بكــــــل
طيبـــــة
دُنَـــــى
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وغــــدا
لســــان
الكائنـــا
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تِ
إلــــيَّ
يُعــــرِب
بالهنـــا
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كهنــــاء
تيمـــور
الهُمـــام
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بمـــن
بهــا
اليــوم
ابتنــى
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بســــــليلةِ
الســـــَّادات
أرْ
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بَــــابِ
الجلالــــة
والســـنا
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أســـعِد
بَهـــا
وبـــه
فكـــلٌّ
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منهـــــم
شـــــاد
البنــــا
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يــــا
ربَّنــــا
فارزقهمــــا
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ولـــــداً
يســــرّ
الأعينــــا
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يبقــــى
علـــى
دســـت
الخلا
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فـــــة
قيمـــــاً
متــــديِّنا
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فـــإذا
أتـــى
فيـــه
أتـــى
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ملـــك
أبـــوه
أبــو
الثنــا
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خفّــــــاق
رايــــــات
العلا
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ســــبَّاق
غايــــات
المنــــى
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فيــــاض
أوديــــة
المكــــا
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رمِ
مخصــــِب
ســــُمُرَ
القَنـــا
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فـــــإذا
لثمَــــت
يمينَــــهُ
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منحتــــكَ
أســــباب
الغِنـــى
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وإذا
اكتفيــــت
بـــه
علـــى
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زمـــــن
كفــــاكَ
الأزمنــــا
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يـــا
ســـيَّدي
تيمـــور
إنَّــي
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جئتكــــــــم
متيمِّنــــــــا
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بركــــاتكم
فاضــــت
وخَــــا
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دِمُكــــم
بقــــدركم
اعتنـــى
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هــــذا
الرســــول
بعثتُــــه
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لجنـــــــابكم
متبيِّنـــــــا
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حاشـــا
جميلُـــك
أنـــي
عــو
|
د
إلــــيَّ
منــــك
بلا
عنــــا
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تَصــــِلُون
أيــــديكم
فتقـــط
|
ع
بالعطــــــاء
الألســــــُنا
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