|
أَقِلّـي
مـن
اليـأس
والمَطمـعِ
|
وزيــدي
رجــاءً
ولا
تجزعــي
|
|
فــإن
حياتَــك
أجمــلُ
مــن
|
ضــياعِك
هيهــاتِ
مـن
مُرجـعِ
|
|
خلقـــتِ
بصـــدريَ
محبوســةً
|
تأبَّــد
حبســُك
فــي
أضـلعي
|
|
فمهما
يكن
من
ليالي
الحياةِ
|
أهــوّنْ
ســُراها
وأنـتِ
معـي
|
|
ففيــكِ
الســعادةُ
مكنــوزةً
|
وكــلُّ
السـعادة
أًن
تقنعنـي
|
|
أّلا
ادّرِعـي
الصـبرَ
لا
كنفـوس
|
حواســـرَ
فــي
يأســها
دُرّعِ
|
|
تـدبّ
إليهـا
المنـى
فتراها
|
دوانــيَ
باليــأس
للمصــرعِ
|
|
فمنتحـرٌ
مـن
شـقاء
الحيـاةِ
|
إلــى
هــارب
للـردى
مُزمـع
|
|
فيـا
ربةَ
الصدر
فيك
الشقاءُ
|
وفيـك
الشـِفاءُ
فعِـي
واسمعي
|
|
أطلّـي
مـن
العيـن
والمِسـمعِ
|
وطيـبي
بحسـن
الربيـع
وعـي
|
|
فــإن
الريـاض
معـارضُ
حسـنٍ
|
فــذاتَكِ
فــي
حسـنها
متّعـي
|
|
هنــاك
الزنـابقُ
فـي
كِمهّـا
|
عَـذارى
مـن
الطيـب
لم
تفرع
|
|
يجـسّ
الـدجى
قلبَهـا
بالنّدى
|
فتضــحكُ
مــن
عاشــق
يـدَّعي
|
|
وتســتنجدُ
اللّـه
فـي
سـرّها
|
ليــأْذنَ
للفجــر
بــالمطلع
|
|
فهـل
أنـت
مني
مثلُ
الزنابق
|
أَم
لــي
عنــدك
مــن
مرتـع
|
|
قفـي
بـالحقول
فغـذّي
الحَشا
|
بــروح
محاســنها
المُشــبعِ
|
|
ونـاجي
معـي
زهرةً
إذ
رأتنا
|
تعــرّتْ
مـن
الكـمِّ
تسـتطلعي
|
|
أزنبقـةَ
الحقـلِ
عَـمَّ
احتجبتِ
|
أَحفــظُ
الطهـارة
فـي
بُرقـعِ
|
|
عفافُــك
يــا
زهرتـي
سـافرٌ
|
بطيـــب
شــَذاك
فلا
تَفزعــي
|
|
فما
في
الحجاب
حفاظُ
الحياءِ
|
وإن
كــان
أحــوطَ
للمقْنَــعِ
|
|
ولا
فـي
السـفور
بلاءُ
الحياء
|
وإن
كــان
أهــونَ
للمطمــعِ
|
|
ومـا
بيـنَ
هـذا
وذاك
يكـون
|
مجـــالٌ
لمعتــدلِ
فــاتْبَعِي
|
|
هلمــي
أبثَّــك
سـرّ
الحيـاة
|
أللســرّ
عنــدك
مــن
مَوضـعِ
|
|
كلانـا
مزيـجُ
عناصـرَ
تجمعها
|
ســـنّةُ
الـــوقت
والمَربــعِ
|
|
نــدلُّ
بنطــق
وأفضــل
منـهُ
|
ســكوتٌ
مــع
العمـل
الأَنفـعِ
|
|
ومـا
خلـق
الكـونُ
للناطقينَ
|
ولكنّــــه
بيـــد
الأَمنـــعِ
|
|
وإن
الطبيعــة
أمُّ
الجميــعِ
|
فصــلّي
بهيكلِهــا
واركعــي
|
|
هنـاك
الحيـاةُ
بكأس
الربيعِ
|
تُــديرُ
محاســنَها
فــاكرعي
|
|
فـإن
الجمـال
غـذاءُ
النفوس
|
فروحَــك
مــن
حبــه
أَشـبِعي
|
|
لئن
تنشـديهِ
نشـدتِ
الكمـال
|
وســِرتِ
إلـى
المثـلِ
الأرفـع
|
|
أزنبقــةَ
الحقـلِ
هـذي
يـدي
|
أمـــدُّ
إليـــك
فلا
تَمنعــي
|
|
فهـل
لـك
مـن
تربـةٍ
كفـؤاي
|
ومـــاءٍ
أرقَّ
مـــن
الأَدمــعِ
|
|
كِلانــا
غريبــانِ
فـي
مـوطنٍ
|
هـوى
الحـرُّ
فيـه
فكوني
معي
|