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بــدلتَ
مــن
نفحـات
الـورد
بـالآءِ
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ومــن
صــبوحك
در
الإبــلِ
والشـاءِ
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مـا
بيـن
بطـن
بـثيران
حللـت
بـه
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إلــى
الفراديـس
إلا
شـوبلإ
أقـذاءِ
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فعــد
همــك
عــن
طــرفٍ
يمارســه
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جلــفٌ
تلفــعَ
طمــراً
بيـن
أحنـاءِ
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ففــي
غـد
لـك
مـن
زهـراءَ
صـافيةٍ
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بطيرنــا
بـاذ
مـاء
ليـس
كالمـاء
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ممـــا
تخيــر
أولاهــا
وأودعهــا
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رب
الخورنــق
فــي
جوفـاءَ
ميثـاءِ
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راح
الفُــراتُ
عليهـا
فـي
جـداوله
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وباكرتهـــا
ســـحاباتٌ
بـــأنواءِ
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فاستنفض
القطر
ما
وشى
المصيف
لها
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واسـتبدلت
جـدداً
مـن
بعـد
أنضـاء
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تنشــي
فواصــل
كــالآذان
منشــأة
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مثــل
الجمــان
عقـوداً
أي
إنشـاء
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حــتى
إذا
حكــت
الحبشـان
شـائلةً
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دهـم
العناقيـد
فـي
لفـاءَ
خضـراء
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راحــت
لهــا
عصــبٌ
شــعثٌ
ملوحـةٌ
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دكـن
التبـاين
مـن
كـوثى
وسـوراء
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تجنـي
علـى
العيـن
ما
أنت
مقاطفه
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حـتى
إذا
هيـل
فـي
كلفـاء
جوفـاءِ
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واسـتخلص
العفـو
مـن
ذوبٍ
مسلسـلةٍ
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مــن
قبــل
جائلـةٍ
فيهـا
بإبطـاء
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صــارت
إلــى
وطـنٍ
أرسـى
بمعـتركٍ
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مــا
بيــن
عقبـة
إبـرادِ
ورمضـاء
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حــتى
إذا
أنضــج
الوسـمي
صـفحته
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قطـــراً
واعقبــه
قــرا
بأنــداء
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صـينت
عـن
الشـمس
في
قيطونِ
محتنكٍ
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مــن
اليهــود
لأمِّ
الــراحِ
غــداء
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مــا
زال
يُهمِلهـا
كالمسـتخف
بهـا
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عصــر
الشــباب
كنـاسٍ
غيـر
نسـاءِ
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يُطــري
سـواها
إذا
سـيمت
مدافعـةً
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عنهــا
ويوســعها
مــن
كـل
إزراء
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يســومها
الـبيع
أحيانـاً
فيمنعـه
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أن
قــد
يؤملهــا
يومــاً
لإثــراء
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حـتى
إذا
الـدهر
أبقـى
من
سلالتها
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جـزءَ
الحيـاةِ
وقـد
ألـوى
بـأجزاء
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دبــت
اليــه
مـن
الأحـداثِ
باسـلةٌ
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أبكــت
عوابـدَ
مـن
أحبـارِ
تيمـاء
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فمــات
والقلــب
مشـغولٌ
بحظوتهـا
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لـم
يشـف
مـن
شـجنيه
علـة
الـداء
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حـتى
اذا
أُسـندت
للشـرب
واحترضـت
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عنــد
الشــروق
ببســامين
أكفـاء
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فضــت
خواتمهـا
فـي
نعـت
واصـفها
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عـن
مثـل
رقراقـةٍ
فـي
جفـنِ
مرهاء
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لــم
يبــق
مـن
شخصـها
إلا
تـوهمه
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فالشـيء
منهـا
اذا
اسـتثبت
كاللاء
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تمـازج
الـروح
فـي
أخفـى
مـداخله
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كمـــا
تمــازج
أنــوارٌ
بأضــواء
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لا
يـدرك
الحـس
منهـا
حيـن
تبعثها
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إلا
التنســـم
أو
لــذعاً
بأحشــاء
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ريحانـةُ
النفـس
تهـوى
عنـد
شمتها
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جـاءت
بـذاك
روايـات
ابـن
ديحـاء
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جـاش
المـزاجُ
لهـا
رقصـاً
على
طربٍ
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فاهتـاج
فـي
قعرهـا
رقـمٌ
بشـدراء
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يحكــي
تطوقهـا
بالكـأس
مـن
ذهـبٍ
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طوقــاً
أطــافت
بـه
واوات
عسـراء
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ثـــم
اســتحال
لهــا
درٌّ
فعرشــه
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حـتى
اسـتقل
لهـا
عـرشٌ
على
الماء
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عــرشٌ
بلا
طنــبٍ
مــن
فــوقه
زبـدٌ
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قــد
جــل
عـن
صـفةٍ
فـي
حسـن
لألاء
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لا
يســتطيع
ســنا
نـورٍ
لهـا
نظـرٌ
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حــتى
تعــود
لــه
لحظــات
حـولاء
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كـأن
تـأليفَ
مـا
حـاك
المزاجُ
لها
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ســلخٌ
تجللهــا
عــن
ظهـر
رقشـاء
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لا
شــيء
أحسـن
منهـا
فـي
تصـرفها
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مــن
كــف
منتطــق
الأعطـاف
وشـاء
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اذا
جـرت
لـك
تحـت
الليـل
سـانحةً
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مــــدت
خلالــــك
أطنابـــاً
بلألاء
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تلــك
الـتي
وسـمتني
غيـر
محتشـم
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وســم
المجــونِ
وســمتني
بأسـماء
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لا
أتبـع
اللهـو
فيهـا
غيـر
مترعةٍ
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منهــا
تفنــن
لـي
فـي
كـل
سـراء
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مـا
أطيـبَ
العيـش
لـولا
ذكرُ
واحدةٍ
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فيهـــا
مفارقــةٌ
بيــن
الأحبــاء
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هــذا
النعيـم
ولا
عيـشٌ
تكـونُ
بـه
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هنــدٌ
برابيــةٍ
مــن
بعـد
أسـماء
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