|
مـن
أجـل
هيبـة
ذا
المقـام
المذهل
|
لـم
تغـن
عـن
أحـد
شـجاعة
مقول
|
|
يــا
لائم
الشــعراء
فـي
تقصـيرهم
|
ويـل
لمـا
يلقـى
الشجي
من
الخلي
|
|
عنفتهــم
ولــو
ابتليــت
عـذرتهم
|
لا
يعــذر
المبلــي
إلا
مــن
بلـي
|
|
أنكـرت
مـا
عرفـوه
مـن
مضغ
الحصى
|
فلأجــل
ذا
ســهلت
مـا
لـم
يسـهل
|
|
وأشــد
مــا
كلفــت
خـاطر
شـاعر
|
صــعب
المعـاني
فـي
الكلام
الأسـهل
|
|
لكــن
مــدح
العاضـد
بـن
محمـد
|
مفتـــاح
أبـــواب
الكلام
المقفــل
|
|
أقســمت
بــالفقر
الـتي
أرواحهـا
|
مــن
سلســل
وجسـومها
مـن
جنـدل
|
|
لــو
كنــت
أمـدح
غيـر
آل
محمـد
|
لرفعتــه
فــوق
الســماك
الأعــزل
|
|
لكـــن
دفعــت
إلــى
مديــح
خلائف
|
بمــديحهم
آتـى
الكتـاب
المنـزل
|
|
فلـذاك
أبـذل
فـوق
مـا
فـي
قدرتي
|
مــدحاً
لهــم
وكـأنني
لـم
أبـذل
|
|
والشــعر
بــالقرآن
يخفــى
نـوره
|
كـالنجم
يخفـى
بالضـياء
المنجلي
|
|
قـوم
إذا
مـا
أسـندوا
خبر
العلى
|
جــاؤوا
بأصــدق
مسـند
عـن
مرسـل
|
|
مــن
كـل
ملثـوم
البسـاط
غـدت
بـه
|
قمــم
الــرؤوس
حواسـداً
للأرجـل
|
|
حــتى
كــأن
ثــراه
ســاحة
قبلـة
|
بــل
ثغـر
معسـول
الرضـاب
مقبـل
|
|
الشــائدون
مــن
المعـالي
رتبـة
|
أضـحت
بهـم
فـوق
المعـالي
تعتلـي
|
|
ورثــوا
الإمامـة
حاضـراً
عـن
غـائب
|
وتـــداولوها
آخـــراً
عــن
أول
|
|
مــن
ظــافر
أو
فـائز
أو
عاضـد
|
بيــت
خلافتــه
علــى
النـص
الجلـي
|
|
أوصــى
إليـك
بهـا
ابـن
عمـك
بعـده
|
نصـاكما
نـص
النـبي
علـى
علـي
|
|
فــتيقن
العصــر
الــذي
لـك
أنـه
|
مــن
كنـت
حجـة
عصـره
لـم
يخجـل
|
|
وتيقنــت
رتــب
الخلافــة
أنهـا
|
ســـعدت
بطلعــة
وجهــك
المتهلــل
|
|
أو
مــا
تــرى
رجبـاً
بقيـت
بقـاءه
|
مـن
بعـد
عامـك
ألـف
عـام
مقبل
|
|
وافـــى
إليــك
مهنئاً
ومعزيــاً
|
عــن
شــيمتي
زمــن
مســيء
مجمــل
|
|
فهنــاؤه
بالناصــر
الــذخر
الـذي
|
مـذ
قـام
في
نصر
الهدى
لم
يخذل
|
|
وعــزاؤه
بالصــالح
الهـادي
فـوا
|
أســفي
عليهــا
غمــة
لا
تنجلــي
|
|
إن
الرزيــة
والعطيــة
فيهمــا
|
مزجــت
بطعـم
الشـهد
طعـم
الحنظـل
|
|
وإذا
نظــرت
إلــى
الرزيـة
كـدرت
|
بقبيحهـا
الماضـي
يـد
المسـتقبل
|
|
وإذا
نظــرت
إلــى
العطيـة
منصـفاً
|
قــامت
بعـذر
التـائب
المتنصـل
|
|
أمـا
جراحـك
يـا
زمان
فإنها
اندمل
|
ت
ولكـــن
بعــد
حــز
المفصــل
|
|
يــا
راحلاً
عنــا
وفــي
أكبادنــا
|
حــرق
عليــه
مقيمــة
لـم
ترحـل
|
|
نقــص
الكمــال
وقــد
قضــت
بـك
فـي
|
سـنة
عـداد
شـهورها
لـم
تكمل
|
|
عجـل
الرثـاء
إليـك
قبـل
تمامها
|
والــذم
يلزمنــا
إذا
لــم
تعجـل
|
|
إن
يبــل
مــن
ذاك
الجــبين
جمــاله
|
فجميلـه
عنـد
الخليقة
ما
بلي
|
|
ســافر
بطرفــك
لا
تجــد
إلا
يـداً
|
مخضــوبة
بيــد
لــه
لــم
تنصــل
|
|
أو
وجنـــة
ذبلــت
طراوتهــا
أســى
|
أو
روضــة
بنوالهـا
لـم
تـذبل
|
|
وذا
أردت
علـــى
مقـــالي
شــاهداً
|
فشـهود
قـولي
أهـل
ذاك
المحفـل
|
|
مــا
منهــم
إلا
امـرؤ
بلغـت
بـه
|
نعمـى
أبـي
الغـارات
أرفـع
منـزل
|
|
ولكــثرة
المعــروف
أنكــر
نفســه
|
فأعــاد
فيهــا
نظـرة
المتأمـل
|
|
يــا
صــاحبي
ومــا
سـألت
جهالـة
|
كـم
سـائل
عـن
علـم
مـا
لم
يجهل
|
|
هـل
نشـأة
الزمـن
القـديم
أعادها
|
منشـي
الخليقـة
فـي
الزمان
الأول
|
|
لو
لم
يكن
هذا
المقام
نهاية
الش
|
رق
الرفيـــع
وغايـــة
المتمثــل
|
|
لظننــت
أن
الفتـح
أصـبح
قائمـاً
|
فينــا
بدولــة
جعفــر
المتوكــل
|
|
أو
أن
عصـر
الآمـر
ابتسـمت
به
ال
|
أيــام
عـن
هـادي
الـدعاة
الأفضـل
|
|
ولئن
أتيـــت
أبــا
شــجاع
بعــدهم
|
فلأنـــت
أول
ســـابق
متمهـــل
|
|
كالشـمس
بعـد
الفجـر
أو
كالوبـل
بـع
|
د
الطل
أو
كالبحر
بعد
الجدول
|
|
أحييــت
بالحســنات
سـالف
ذكركـم
|
لا
ينكــر
الوسـمي
عارفـة
الـولي
|
|
وطلعــت
فـي
ذا
الدسـت
بعـد
طلائع
|
ذخــراً
لأبنــاء
النــبي
المرسـل
|
|
وكفلتهــم
وكفلــت
عنهــم
للـورى
|
نعمــاً
عممــت
بهــن
كــل
مؤمـل
|
|
ووصـلت
حبلـك
فـي
الحيـاة
بحبلهم
|
صــلة
الأشـاجع
ركبـت
فـي
الأنمـل
|
|
سـبب
غـدا
نسـباً
وأنـت
وصـلته
|
منهــم
بعصــمة
عقــدة
لــم
تحلــل
|
|
ورأيــت
ملـك
أبيـك
وتـراً
مفـرداً
|
فشـــفعت
منـــه
مــؤثلاً
بمؤثــل
|
|
وحفظــت
منصــبه
الكريـم
ولـم
يكـن
|
أحــد
ســواك
لنيلهــا
بمؤهـل
|
|
فطـل
الملـوك
وقـد
فعلـت
ممتعـاً
|
بــدوام
عـزك
فـي
البقـاء
الأطـول
|
|
ترنـو
إليـك
عيـون
الخلـق
شاخصة
|
والأجـر
والفخـر
أدنـى
مـا
تحاوله
|
|
وفـي
المظلـة
وجـه
لم
يزل
أبداً
|
بشــر
القبــول
علـى
وجـه
يقـابله
|
|
ورايــة
الملــك
والإســلام
يحملهـا
|
لـك
اللـواء
الـذي
جبريل
حامله
|
|
أشـبهت
هـدي
رسـول
اللـه
حين
بدت
|
علــى
شــمائلك
الحسـنى
شـمائله
|
|
وفـي
جبينـك
نـور
مـن
نبـوته
|
وشـــاهد
الحـــق
لا
تخفـــى
دلائلــه
|
|
قـد
أيـد
اللـه
دينـاً
أنت
عاضده
|
والناصــر
الـذخر
كـافيه
وكـافله
|
|
الكاشـف
الكـرب
لمـا
عـز
كاشـفه
|
والفـارج
الخطـب
لمـا
ضـاق
نازله
|
|
لمــا
أعـز
الهـدى
قـرت
قواعـده
|
وامتــد
ســاعده
واشــتد
كــاهله
|
|
ماضـــي
الأوامـــر
إلا
أن
قــدرته
|
يضــيق
ذرعـاً
بهـا
قـدر
يمـاثله
|
|
عــزت
بــه
دولــة
أضـحت
محافظـة
|
عنهــا
يجالـد
خصـماً
أو
يجـادله
|
|
وكــف
بــالأمس
مــن
كفـي
معانـدها
|
حـتى
تلاشـى
بنـور
الحـق
بـاطله
|
|
ومــن
أراد
بهـذا
الـبيت
غائلـة
|
فالنصــر
عــاذله
والنصـر
خـاذله
|
|
فتــح
مـبين
ونصـر
عـن
يـدي
ملـك
|
روض
الهــدى
ذابـل
لـولا
ذوابلـه
|
|
يـا
عـادل
الحكـم
قـل
للدهر
لا
عجب
|
أن
يفقـد
الجـور
لما
قام
عادله
|
|
جــادت
بنانـك
مصـراً
وهـي
ذاويـة
|
فـاليوم
طـل
النـدى
فيها
ووابله
|
|
رويــت
بـالقطر
قطريـه
علـى
ظمـأ
|
ولا
ســحاب
سـوى
مـا
أنـت
بـاذله
|
|
ترنــو
إليـك
عيـون
الخلـق
شاخصـة
|
والأجـر
والفخـر
أدنى
ما
تحاوله
|
|
وفـي
المظلـة
وجـه
لم
يزل
أبداً
|
بشــر
القبــول
علـى
وجـه
يقـابله
|
|
ورايــة
الملــك
والإسـلام
يحملهـا
|
لـك
اللـواء
الـذي
جبريـل
حامله
|
|
أشـبهت
هـدي
رسول
الله
حين
بدت
|
علــى
شــمائلك
الحســنى
شــمائله
|
|
وفــي
جبينــك
نـور
مـن
نبـوته
|
وشـــاهد
الحــق
لا
تخفــى
دلائلــه
|
|
قـد
أيـد
اللـه
ديناً
أنت
عاضده
|
والناصــر
الــذخر
كـافيه
وكـافله
|
|
الكاشــف
الكــرب
لمـا
عـز
كاشـفه
|
والفـارج
الخطـب
لما
ضاق
نازله
|
|
لمـا
أعـز
الهـدى
قـرت
قواعـده
|
وامتـــد
ســاعده
واشــتد
كــاهله
|
|
ماضـــي
الأوامــر
إلا
أن
قــدرته
|
يضــيق
ذرعــاً
بهـا
قـدر
يمـاثله
|
|
عــزت
بــه
دولــة
أضـحت
محافظـة
|
عنهــا
يجالـد
خصـماً
أو
يجـادله
|
|
وكــف
بــالأمس
مــن
كفــي
معانــدها
|
حـتى
تلاشـى
بنـور
الحق
باطله
|
|
ومــن
أراد
بهـذا
الـبيت
غائلـة
|
فالنصــر
عــاذله
والنصـر
خـاذله
|
|
فتــح
مـبين
ونصـر
عـن
يـدي
ملـك
|
روض
الهــدى
ذابـل
لـولا
ذوابلـه
|
|
يـا
عـادل
الحكـم
قـل
للدهر
لا
عجب
|
أن
يفقـد
الجـور
لما
قام
عادله
|
|
جـادت
بنانـك
مصـراً
وهي
ذاوية
|
فــاليوم
طـل
النـدى
فيهـا
ووابلـه
|
|
رويـت
بـالقطر
قطريـه
علـى
ظمأ
|
ولا
ســحاب
ســوى
مــا
أنـت
بـاذله
|