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عــادت
عليــك
أهلــة
الأعيـاد
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ببلــوغ
آمــال
ونيــل
مـراد
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ورأت
بــك
الأيـام
مـا
تختـار
مـن
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عـز
إلـى
يوم
المعاد
معاد
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يهنـي
أميـر
المؤمنين
مواسم
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أوقــاتهن
إلـى
اللقـاء
صـوادي
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نظمـت
علـى
جيد
الزمان
جواهراً
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إن
الجــواهر
حليــة
الأجيـاد
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مــا
العيـد
إلا
أن
تـراك
نـواظر
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لـولاك
ما
اكتحلت
بطيب
رقاد
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وتنيـر
تحـت
التـاج
غرتك
التي
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تجلـو
صـدى
المرتاب
والمرتاد
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وتـزور
مجلسـك
المقـدس
بالهنـا
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أمــم
تـراوح
لثمـه
وتغـادي
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وتلـوح
فـي
ظـل
المظلة
طالعاً
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كالبــدر
أو
كـالكوكب
الوقـاد
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وكأنهــا
فلــك
ووجهــك
شمسـه
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لـولا
اعتمـاد
رتاجهـا
بعمـاد
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حسـدت
بسـاط
الأرض
فيـك
وما
درت
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أن
السـماء
لهـا
مـن
الحساد
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نشـر
المـدير
بها
عليك
غمامة
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ذهبيــة
ليســت
بــذات
عهــاد
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فغـدا
الورى
يتعجبون
وقد
بدا
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مـن
تحتهـا
الجـودي
فـوق
جواد
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قـد
قلـت
إذا
علت
المظلة
فوق
من
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يعلـو
محـل
الأنجـم
الأفـراد
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لــم
تعـل
إلا
خدمـة
وصـيانة
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وكـذا
السـيوف
تصـان
في
الأغماد
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والقلــب
أشــرف
والضــلوع
تحـوطه
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والعين
يحجب
نورها
بسواد
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لمــا
بـرزت
إلـى
المصـلى
لابسـاً
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ثـوب
الخشـوع
وهيبـة
الآساد
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جلــت
الخلافــة
عزهــا
فـي
مـوكب
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يكسو
ضياء
الصبح
ثوب
حداد
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ســتر
القتــام
جيادهـا
فكأنهـا
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مكنـون
سـر
فـي
مصـون
فؤاد
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متلاطـــم
كـــالموج
إلا
أنــه
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متتـــابع
الأمــواج
والأزبــاد
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حــتى
إذا
وافيــت
ســاحة
مجمــع
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متضـايق
العرصـات
بالأشهاد
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قــابلت
محــراب
الصـلاة
وللهـدى
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قبـس
علـى
قسـمات
وجهك
باد
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وقضـيت
نافلـة
السـجود
ولـم
تزل
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للــه
أفضــل
قــانت
سـجاد
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وصـعدت
ذورة
منـبر
أبقيـت
في
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شــرفاته
شــرفاً
علـى
الأعـواد
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ونطقـت
مـن
فصل
الخطاب
بخطبة
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عــون
الإلـه
لهـا
مـن
الأمـداد
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ذرفـت
دموع
الخلق
عند
سماعها
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واســتنجدت
بمــدامع
الأكبــاد
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ذكـرت
ناسـية
القلـوب
وإنمـا
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نـادى
رشـادك
أهـل
ذاك
النادي
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ونحــوت
متبعــاً
لسـنة
مـن
مضـى
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مـن
سـالف
الآبـاء
والأجـداد
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وعلــى
شــريعة
جــدكم
ووصــيه
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صــلى
وضــحى
أهــل
كـل
بلاد
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وتخــاير
الوفــد
الحجيـج
ضـيافة
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أعـددتموها
للقـرى
والزاد
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فاسـلم
وقـل
للمشرفية
والقنا
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ينحــرن
كــل
مخــالف
ومعــاد
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واحكـم
علـى
جـور
الزمـان
بعـادل
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ورث
الكفالة
عن
كفيل
هادر
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فاســتوهب
النصـر
العزيـز
بناصـر
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صـلحت
بـه
الأيام
بعد
فساد
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ملــك
يصــرف
كــل
صــرف
نـازل
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بأعنــة
الإصــدار
والإيــراد
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لــولا
عزائمــه
وشــد
رأســه
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أضـحت
قـوى
الإسـلام
غيـر
شـداد
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شـمخت
أنـوف
عـداته
واقتادهـا
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صـعب
الإبـاء
علـى
يد
المقتاد
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لمــا
تجـاوز
غايـة
الأمـد
الـذي
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فـات
الملوك
وفت
في
الأعضاد
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قـالت
منـاقبه
لحاسـد
مجـده
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هــون
عليـك
فلسـت
مـن
أضـدادي
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وانظـر
لنفسـك
مـن
يليـق
بشكلها
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واعرف
إذا
عاديت
كيف
تعادي
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وامنـع
قناتـك
أن
تميل
فإنني
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أخشــى
عليــك
مثقــف
الميـاد
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واصــدق
فمـا
تخفـى
طويـة
صـادق
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ممـن
أسـر
الجمـر
تحت
رماد
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فــإذا
وفــى
لـك
صـاحب
وغـدرته
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فاعلم
بأن
الله
في
المرصاد
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وحــذار
مــن
نهشـات
صـل
أرقـط
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ظـام
ومـن
بطشـات
ليـث
عـاد
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فبأســفل
الهضــبات
شــبل
عرينـة
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وبملتقـى
العقدات
حية
واد
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منعــت
بنــو
رزيـك
سـاحة
عزهـم
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إلا
علــى
الـرواد
والـوراد
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قــوم
تخيــرت
الــورى
فوجـدتهم
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أندى
الملوك
يداً
وأكرم
ناد
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شــرفت
منــاقب
مجـدهم
فكـأنني
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أتلـو
بهـا
القـرآن
بالإنشاد
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مـن
كـان
يسـند
عـن
سـماع
فضـيلة
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فعن
العيان
لفضلهم
إسنادي
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وأبـو
الشـجاع
إذا
أردت
مـديحهم
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بيـت
القصـيد
وقبلة
القصاد
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