|
الحمـد
للـه
الـذي
إلـى
الدعا
|
دعـا
وبالـدعا
أجـاب
مـن
دعـا
|
|
والحمــد
للــه
الــذي
بلطفـهِ
|
أمَّــن
خــوف
خــائفٍ
مـن
خـوفهِ
|
|
والحمــد
للــه
الـذي
أسـماؤه
|
ردَّ
بهـــا
الأعــداءَ
أوليــاؤهُ
|
|
والحمــد
للــه
الـذي
الإجـابهْ
|
حقَّقنــا
بهــا
مــدى
الإنــابهْ
|
|
والحمــد
للــه
الـذي
إن
مـدّا
|
عبــدٌ
لــه
كفّــاً
حبــاه
مـدّا
|
|
ثــم
صــلاته
علـى
الـذي
يقـولْ
|
مــخُّ
العبـادة
الـدعاء
فـأقولْ
|
|
يـــا
ربِّ
بـــالنبيِّ
والأســماءِ
|
وبـــالمجيبِ
فـــأجبْ
دعـــائي
|
|
وبالســميعِ
والسـريعِ
والقريـبْ
|
أسـرعْ
بقصـدي
وسـؤالي
يا
مجيبْ
|
|
إنــي
إليــك
بــاللطيف
وبمـا
|
فـي
ذي
اللطائف
من
اسمٍ
قد
سما
|
|
وجَّهْــــتُ
وجهــــي
فلا
تـــردَّهُ
|
مــن
فضـلك
العظيـم
بـل
أمـدَّهُ
|
|
بحــق
لطــف
اللــه
والرحمــنِ
|
ذي
الطــولِ
والعفــوِّ
والمنّـانِ
|
|
وباسـم
ذي
الإكـرامِ
آنـس
وحشتي
|
وأمِّنَـــنَّ
يــا
إلهــي
روعــتي
|
|
واطلــقْ
لمســجونيَ
يــا
إلهـي
|
مــن
قيـدِ
طبعـي
ومـن
الملاهـي
|
|
وبلطيفــةِ
العليــمِ
والخــبيرْ
|
والهـادي
والمكيـن
لا
يُرى
شريرْ
|
|
يضـــرُّني
وأنــت
علاَّم
الغيــوبْ
|
فافتـحْ
عليَّ
واسترنْ
مني
العيوبْ
|
|
وعلِّمَنّــي
بــارِكَن
لــي
وعلــيّ
|
وكـــل
خلـــقٍ
ســـخِّرَنّهُ
لــديّ
|
|
وباســـمك
الملـــك
والعلـــيّ
|
وبــالعظيم
المغنــي
يـا
ولـيّ
|
|
بالمتعـالي
ذي
الجلالِ
والكـبيرْ
|
وبـــالمهيمنِ
فـــإنّيَ
حقيـــرْ
|
|
عظِّـــمْ
لقــدري
بهيبــةٍ
تُــرى
|
ألبَســَنيها
فضــلُكَ
الّـذْ
بهـرا
|
|
وادفـعْ
لكـلِّ
مـؤلمي
وادفع
لما
|
يوســوسُ
الصــدورَ
عنّـي
حيثمـا
|
|
وبالقــديرِ
والمــتينِ
القـادرِ
|
وبــالعزيز
والشــديدِ
القـاهرِ
|
|
وجـــاه
ذي
القــوةِ
والجبّــارِ
|
ســخِّرْ
لـي
مـا
يُخبَـرُ
بالأخبـارِ
|
|
واجمع
لشملي
وارزقنْ
لي
الخيرا
|
وشـتِّتَنْ
شـملاً
نـوى
لـي
الضـَّيرا
|
|
وألبســَنّي
هيبــةً
مـن
جبْـرَؤوتْ
|
بهــا
يــذلُّ
كــل
جبـارٍ
يمـوتْ
|
|
وأكرمنِّـي
عنـد
كـلِّ
جبـارٍ
ولـي
|
جميــعَ
خلقــكَ
فسـخِّرْ
يـا
ولـيْ
|
|
وبـالمحيط
العالِم
الربِّ
الشهيدْ
|
وبالحسـيبِ
واسـمك
الفعّـالِ
زِيدْ
|
|
بالخـــالقِ
البـــاريء
والخلاَّقِ
|
وبالمصـــوِّرِ
قـــوىَّ
أرزاقـــي
|
|
وكـــلَّ
مطلـــوبٍ
لــي
يَســِّرَنا
|
والنفـسَ
والجسـمَ
لـي
فاحفظنّـا
|
|
والعــالَمَ
العلــويَّ
والسـفليا
|
سـخِّرْ
لـي
يـا
إلهـي
كـن
وليّـا
|
|
وبالبــديع
البــاطنِ
المعيــدِ
|
والمبــديء
الحفيــظِ
والمجيـدِ
|
|
والصـّادقِ
المغيـثِ
أو
والكامـلِ
|
والواسـعِ
اشـرحْ
صدري
عن
رذائلِ
|
|
وهَـبْ
لـي
العلومَ
معْها
المعرفهْ
|
معْهـا
الغيـوبُ
لـي
تكن
منكشفهْ
|
|
وجــاهٍ
كــلِّ
اســمٍ
تسـمَّيتَ
بـهِ
|
ارزق
لــي
كــل
مقصـدٍ
واجتبـهِ
|
|
بالباسـط
الحقِّ
البصيرِ
والسميعْ
|
والنـورِ
والفتّـاح
والوهّابِ
زيعْ
|
|
باسـم
العزيـز
والـودودِ
قلـبي
|
شــكرَك
بـالقيومِ
زِدْ
لـي
قربـي
|
|
واجعلنــي
للحــق
وســيلةً
ولا
|
يمنعنـي
ذنـبٌ
مـن
غيـوبٍ
مسجلا
|
|
بالغــافر
التــوّابِ
والوكيــلِ
|
والمـومنِ
الكـافي
أقـم
سـبيلي
|
|
وبالحســيبِ
والســريعِ
والسـلامْ
|
ربِّ
وبــالرزّاقِ
فانصـر
لـي
كلامْ
|
|
والعسـرَ
يسـِّرْ
واصـلحِ
الأسـبابا
|
والكسـبَ
بـاركْ
فيـه
والثّوابـا
|
|
واقبــلْ
علــيَّ
بوجــوه
الخلـقِ
|
بـالخير
والحـبِّ
وزدْ
فـي
رزقـي
|
|
بالباعث
المحيي
المميتِ
السامي
|
والــوارثِ
القــابضِ
كـن
علاّمـي
|
|
بـــالبَرِّ
والأولِ
ثـــم
الآخـــرِ
|
والبـاطنِ
القـدُّوسِ
ثـم
الظـاهرِ
|
|
وباسـم
لـم
يلـدْ
ولم
يولدْ
ولمْ
|
يكـن
لـه
كفـواً
أحـد
كـفَّ
الألمْ
|
|
عنّــا
وأمِّــن
خوفنــا
وروعنـا
|
وامنـع
بسـوءٍ
مـن
أراد
جمعَنـا
|
|
وأعـلِ
لنا
الهمّةَ
وأقبلِ
النفوسْ
|
علـيَّ
بـالخيرِ
وقُـدْ
لـيَ
الرؤوسْ
|
|
يــا
ربَّنـا
بسـرِّ
لطفـك
الخفـي
|
وســرِّ
مـن
فـاء
إليـك
أو
يفـي
|
|
وســـرِّ
ســيف
اســمك
العظيــمِ
|
ونصــْرِ
قطــعِ
ســيفك
الحكيــمْ
|
|
بســــيف
نصــــركَ
فَقَلِّــــدَنّي
|
وصــُدَّ
شــرَّ
الخلــقِ
طُـرَاً
عنّـي
|
|
وللنواصـــي
ملِّكَنّـــي
واصــِبا
|
كمــا
أخــذتها
وفيــك
راغبـا
|
|
بلا
تكلُّـــــــفٍ
ولا
تعســــــُّفِ
|
ولا
تشـــــــوّفٍ
ولا
تكشــــــُّفِ
|
|
ومــن
رآنــي
ومــن
ســمعَ
بـي
|
فــي
قلبــه
فضــع
إلهـي
حبّـي
|
|
وكـــل
بلــدة
أتيتهــا
فضــعْ
|
لـي
بهـا
النصـرَ
مـع
الحبِّ
جُمَعْ
|
|
وضـع
بهـا
عافيـةً
لـي
والمحـبْ
|
ومـن
معـي
والمنتصـر
والمصطحِبْ
|
|
ومــا
سـليمانُ
فـي
دهـرِهِ
وَلـي
|
كـذاك
ذو
القرنيـن
ربـي
لِهِ
لي
|
|
فـي
ظـاهري
وبـاطني
أيـا
ولـي
|
فـارزق
لـه
إرثَ
النـبي
الأفضـلِ
|
|
واغفـر
ذنـوبي
وهـب
لـي
ملكـا
|
ليــس
يــراه
زمنـي
مـن
سـلكا
|
|
وكــلّ
مــا
شوّشـني
فـي
خـاطري
|
أســرعْ
بمـا
يحـبّ
فيـه
نـاظري
|
|
واجعـل
ذنـوبي
ذنـوب
مـن
تحـبْ
|
وللرشــــادِ
وفِّقَنّــــي
لأُصـــِبْ
|
|
وعــــثراتي
إلهــــي
أقِــــلْ
|
عنـد
رواحـي
أو
صباحي
أو
مقيل
|
|
ومــا
بقلــبيَ
خطــرْ
بلا
خطــرْ
|
فـارزقه
لـي
بحـقِّ
أفضـلِ
البشرْ
|
|
ومــا
دعوتـك
بـه
فـارزقه
لـي
|
والخيـر
فيـه
يـا
إلهي
لي
ألي
|
|
واضــربْ
ســرادقات
حفظـكَ
علـيّ
|
واحفـظ
شـيوخي
واحفظـنَّ
والـديْ
|
|
وارزقهـــم
جميـــع
مــا
أردتُ
|
وزدهــمُ
علــى
الـذي
قـد
قلـتُ
|
|
واحفـظ
تلاميـذي
ونسـلتي
ومـالْ
|
جميعنـا
واكفنـا
مَـنْ
أذى
ومالْ
|
|
لنــا
وعنّــا
والمحبَّــةَ
لِنــا
|
مــن
بيــن
خلقِــك
بحبـك
لنـا
|
|
وجارَنـــا
ومــن
لنــا
أحبّــا
|
وصــهرَنا
ومــن
يريـد
القربـا
|
|
وإخــوتي
وزوجــتي
والمسـلمينْ
|
وصــُدَّ
عنــا
كيـدَ
كـلِّ
كـائدينْ
|
|
وانصـر
جميـع
مـن
أراد
نصـرَنا
|
واخـذُلْ
إلهـي
مـن
أراد
خـذلنا
|
|
وانفـع
جميـع
مـن
أراد
نفعنـا
|
وضــُرَّ
ربــي
مــن
أراد
ضــرَّنا
|
|
واحبِــبْ
محبَّنــا
ومــن
يحبُّنـا
|
وابغــضْ
بغيضـَنا
ومـن
يبغضـنا
|
|
أنــت
الـذي
تجيـب
مـن
دعاكـا
|
ولــو
يُــرى
فـي
دهـره
عصـاكا
|
|
أجِـــبْ
لعبــدكَ
فقــد
دعاكــا
|
بــه
اضــطرارٌ
أنـت
لا
يخفاكـا
|
|
وقـــد
أمرتــه
وقــد
دعاكــا
|
ليــس
لــه
فيمـا
دعـا
سـواكا
|
|
وأمــــرُه
ســـلبَ
إذ
دعاكـــا
|
إليــك
لا
يتعبــه
مــا
أولاكـا
|
|
ومَـن
لـذا
النظـم
قـرا
دعاكـا
|
بـــه
فــأعطهِ
الــذي
رجاكــا
|
|
بــه
كمــا
قلـتَ
الـذي
دعاكـا
|
تعطيــه
مــا
أراد
نِعْـمَ
ذاكـا
|
|
وصــلِّ
مــا
أجبــتَ
مـن
دعاكـا
|
علـــى
محمــدٍ
بمــا
يرضــاكا
|
|
قــد
انتهـى
نظـمٌ
وليـس
يوجـدُ
|
مثــاله
فـي
ذي
العلـوم
يُـوردُ
|
|
فيـــه
أمـــانُ
خــائفٍ
وأنــسُ
|
مســتوحشٍ
وطلــقُ
مسـجونٍ
قِسـُوا
|
|
والفتـــحُ
مــع
برَكَــةٍ
للأهــلِ
|
وفيــه
تســخيرٌ
لأهــل
الفضــلِ
|
|
وعَظَمَــهْ
وهيبــةٌ
فــي
العـالمِ
|
ودفــعُ
وســواسٍ
ورفْــعُ
مُــولِمِ
|
|
وجمــعُ
تفريــقٍ
وفــرقُ
مجتمِـعْ
|
وكــلُّ
خلـقٍ
قـد
يُـرى
بـه
خضـعْ
|
|
وفيـــه
تيســيرٌ
لكــلِّ
مطلــبِ
|
وحفــظُ
نفــسٍ
مـع
جسـمٍ
فـأطلبِ
|
|
والكشــفُ
والأســرارُ
مـن
علـوي
|
كــذاك
تســخيرٌ
لــذا
السـفلي
|
|
ونَيــلُ
علــمٍ
والمعــارفِ
كـذا
|
به
انشراحُ
الصدرِ
فادْرِ
المأخذا
|
|
كــذاك
تيســيرُ
عســيرِ
الـرزق
|
كــذاك
إقبــالُ
وجــوهِ
الخَلْـقِ
|
|
وصـــالحٌ
لكــلِّ
ذي
البــداياتْ
|
كــذاك
صــالحٌ
لـذي
النهايـاتْ
|
|
وغيــر
ذا
فيــه
وقــد
سـمّيتُه
|
بســيفِ
نصــرِ
الأوليــاءِ
نلتـه
|
|
وقـد
سـألت
اللـه
وهـو
لا
يخيبْ
|
طـالبُهُ
وهـو
القريـبُ
والمجيـبْ
|
|
أن
لا
يــــردَّ
أحـــداً
دعـــاهُ
|
بــه
ولــو
فــي
دهــره
عصـاهُ
|
|
فـاقرأ
بـه
المسـاء
والصـباحا
|
وفـــي
مقيلـــك
تنــلْ
فلاحــا
|
|
وجــوف
ليلــك
وفــي
الســحورِ
|
تنــلْ
بمــا
أردتَ
فـي
الـدهورِ
|
|
ثــم
الصــلاة
والســلام
الأكملا
|
علــى
الـذي
رُسـْلَ
الإلـه
أكملا
|
|
محمــــدٍ
وآلــــه
ومـــن
تلا
|
ســبيلَهُ
مـن
كـل
عـالٍ
قـد
علا
|