|
جَـفَّ
الكـرى
عكس
الدموع
معاً
دما
|
صــبت
وحُــقَّ
لهـا
تَصـُبُّ
معنـدما
|
|
شــوقاً
لأهــل
الحـوض
نعـم
بلاده
|
ولنعـــم
أهـــل
بلاده
وتنعّمــا
|
|
فهـي
البلاد
وأهلهـا
أهـل
الهوى
|
وهـم
لِمُعمـىً
منـه
ينجـو
من
عمى
|
|
وهــم
لِمُعمـىَ
مـن
مـروءة
دينـه
|
أبصار
تبصر
في
الليالي
المظلما
|
|
فـالحوض
مـن
حـوض
النـبي
سـموهُ
|
وسـمو
أهـل
الحـوض
حقـاً
قد
سما
|
|
ولقــد
أحَــال
وبــرق
دون
بلاده
|
واطْرَبُلُــسٍّ
ثــم
تــونس
معلمــا
|
|
وجبـال
مَنْـطَ
جبـال
الأندلس
التي
|
منهـا
وفيـهَ
عبـارة
لـم
تحسـما
|
|
واقــدامسٌ
واخزيــرة
مـع
طنجـةٍ
|
وتِطـاوَنُ
وارْبـاط
واسـْل
متوءَمـا
|
|
وادزائرٌ
طـــرٌ
وفـــاسٌ
غربـــه
|
مكنـــاس
أو
مراكــش
تشــمنهما
|
|
والحــوز
ثـم
أصـويرةٌ
أو
سوسـه
|
أو
وادِ
نُــونَ
وأرْضــه
متضــرما
|
|
أو
واد
درأة
فـي
البحـار
مصـبه
|
وسـواقي
سـاقي
حمـرة
صـباً
لمـا
|
|
وأكــويس
ثـم
رَواد
صفصـافٌ
يُـرى
|
وأَزيـكُ
وامْسـَرْدادُ
لا
معيـذ
رْحما
|
|
أوإيتـــق
والحـــدب
ثــم
بلاده
|
وامْرَيْكِــلٌ
ومهـامه
تعـي
اللمـا
|
|
ذي
تيــــــرس
آدرارُ
أجــــــل
|
زمـــورُيت
واســـعات
كالحمـــا
|
|
أو
كـــاغط
وحمـــائد
وامريــة
|
وكــثير
إن
عــددتُه
لـن
يفهمـا
|
|
فتحيـــرت
وظــواهري
أصــحابنا
|
فتعجبـــا
ببـــواطني
مترنمــا
|
|
بعــزائم
وزعــائم
قــد
جربــت
|
كــل
التجــارب
معزمـات
مزعمـا
|
|
بتــــذكر
وتشــــوق
وتلهــــف
|
لمـــواطن
وحبـــائب
متكلمـــا
|
|
بعيــون
فتْــح
سـُط
وأنـول
بجـة
|
وعيـون
محمـود
اللـواء
مهـذرما
|
|
وأفــارَ
واتْرُشــِين
واسـعة
تـرى
|
واملازمٌ
وأوادُ
ويْـــزُن
ملزمـــا
|
|
ســـِتريةُ
الأيــدين
شــكْراطيِلُهم
|
وأُرَيُّ
والأبيــار
نعــمَ
محرجمــا
|
|
وأنــوانسٍ
بيــض
خَــدالٍ
تخــذلُ
|
ببــوارق
عــذب
بروقــاً
مبسـما
|
|
حـــورٌ
وعيــنٌ
لؤلــؤ
مكنونــة
|
تســبي
بفــاتر
شــادن
متقومـا
|
|
عربــاً
وأترابــاً
كـواعب
هبُّهـا
|
هَــبٌ
لفــارة
تــاجر
إذ
يقسـما
|
|
فـإذا
نظـرت
إليهـا
تنظر
منظراً
|
قمــراً
يلــوح
بظلمــة
متظلمـا
|
|
وإذا
لمســـت
حريــرة
جســيتها
|
حِقْفـاً
وغصـناً
إذ
تميـسُ
مبرعمـا
|
|
فهنــاك
إن
تُبْصــِرْ
بِبَصـْرٍ
باصـر
|
وفــؤاد
مقــدم
قــادمٍ
متقـدما
|
|
تعلــم
بـأن
بلادنـا
لـم
يُنْئِهـا
|
بعــدٌ
وقــائل
ذاك
صـرم
مصـرما
|
|
ودليـل
ذاك
بـان
مكـة
مِ
القـرى
|
ومدينــة
بقــراك
عنهـا
مبرمـا
|
|
ومنــى
زبيــد
جدحــد
ومشــعرا
|
عرفــات
مزدلفـات
رابـغ
زمزمـا
|
|
بـدر
صـفا
مـع
مـروة
وحنيـن
أو
|
عسـفان
هرشـى
خلَيصُ
لاقصير
الرما
|
|
واسـويس
والوجه
الذي
بهْ
قد
نُعي
|
رحـم
الإلـه
محمـداً
بِـهْ
فارحمـا
|
|
عبــداً
لرحمـانٍ
أضـيف
وقـد
علا
|
لحبــوسُ
حيــن
تبنــه
وتخيمــا
|
|
ولقـد
رأيت
بذا
الفتى
سفراً
فتي
|
بشــراً
ســوياً
لا
يــرد
غشمشـما
|
|
حفـظ
العلـوم
وزانهـا
خلقا
صفا
|
حسـناً
وخلقـاً
زانـه
بسـخى
نمـا
|
|
فصــحبته
بطريــق
نعـم
المصـحب
|
وكريمــة
مــن
قـومه
كالمعصـما
|
|
يـدنيك
أن
تسـخط
ويبعـد
كـل
من
|
ينسـاك
عنـك
مخـاطراً
لـك
قـدما
|
|
فـإذا
نسـبت
نسـبته
شـرف
النسب
|
وإذا
خــدمت
خـدمته
لـك
مخـدما
|
|
فتخــاله
بسـرور
نفسـك
إذ
تسـر
|
وتظنــه
حــذراً
تخــافُهُ
ضـيغما
|
|
ولنعــم
ثـم
وحبـذا
ولنعـم
هـو
|
ولـبيس
عنـدي
مـن
لي
عنه
يصرما
|
|
وجميـع
مصـر
وسـورها
قـد
أخلفت
|
واســكندرية
ذا
بهــا
متلومــا
|
|
لركــوب
بحــر
والركـوب
لطنجـة
|
وبهــا
صــحار
نلتهــا
متوهمـا
|
|
فبــذا
يهـون
عليـك
ذاك
ونـأيه
|
إن
أفــردا
لا
سـيما
قـد
أضـرما
|
|
شـوق
لقطـب
الكـون
قاطبـة
جمـع
|
جمـع
العلـوم
علـومه
لـن
تسئما
|
|
بمشـــارع
لشـــرائع
وحقـــائق
|
لمعينهــا
ســحٌّ
وتسـكاب
السـما
|
|
وســموها
يســمو
لعــرش
إلهنـا
|
ولفرشــها
عــرشٌ
وفــرش
أعظمـا
|
|
وحواســم
لعــدات
بارئنـا
بـرت
|
حسـماً
لهـم
بقطيـع
بـار
محسـما
|
|
ومخلـــدات
مــن
نعيــم
نــاعم
|
لمــواله
كرمــاً
بهــا
متكرمـا
|
|
فهـو
الفضـيل
الفاضـل
المتفضـل
|
بمحمــد
يســمو
ســمياً
يكرمــا
|
|
تفضـيل
أفعِـلْ
قبـل
مجـرور
بيـا
|
يلفـى
لهـا
بتطـاوع
اليد
ألفما
|
|
قصـــداً
لــه
بتفضــل
وتعجبــاً
|
ولقـد
تطـاول
فيـه
أفعـل
بعدما
|
|
وكــذاك
أفعــل
للتفضــل
تنسـب
|
لتطــاوع
المـداح
فيـه
فيلزمـا
|
|
وكــذاك
نعـم
وحبـذا
ومضـاه
ذا
|
ومثــاله
أكـرم
بـه
مـا
أرحمـا
|
|
وتجىــء
أحســن
أو
أبـر
وحبـذا
|
ولنعـم
شمسـاً
هـو
ضـاء
وأكرمـا
|
|
واحـذو
لهـذا
محاذيـاً
بل
لا
تقف
|
واعلــم
بأنــك
لا
تخـاف
ملجمـا
|
|
حـتى
تـرى
مسـتوعباً
لمديـح
مـن
|
غيـر
النـبي
وزده
عنهـم
معظمـا
|
|
لخصـــاله
ووصـــاله
وفصـــاله
|
محمـــودة
أيـــامه
للمنأمـــا
|
|
فهــو
الشــريف
بنسـبة
وفعـاله
|
تشــفي
الشــفا
شــفتي
مرهمــا
|
|
بســخائه
برمــاً
بحلــم
جـاهلا
|
وســُماً
لغيرهــا
وثـم
المحكمـا
|
|
يعطيــك
نــائله
ويبصــر
منَّــةً
|
بقبــوله
عفــواً
عطــاء
مغنمـا
|
|
فســناؤه
وثنــاؤه
لــن
يحصـرا
|
ضـــوءاً
ومــدحاً
تامكاًمتنســما
|
|
حســبي
بـه
وبـه
كفايـة
مأخـذي
|
وبــه
أَصــول
بـه
أحـول
مقـدما
|
|
وبــــه
ملاق
كــــل
لاقٍ
ظـــاعن
|
أو
قـــاطن
مترنمــا
متلملمــا
|
|
وبـه
أسـير
وإن
سـكنت
بـه
سـكن
|
قــدمي
بفتـح
يـات
ليـس
مبكمـا
|
|
وبـه
حيـاتي
فـإن
رأيـت
به
أرى
|
ويـرى
بـه
ظفـري
ودرأ
المرغمـا
|
|
وأبــوه
مـامين
الأميـن
شـمائله
|
شـملت
حيـاءاً
أو
سـخاءاً
مبرمـا
|
|
رحـب
الفنـاء
مـع
الصدور
علومه
|
حكمـاً
وعلمـاً
للـورى
بهـا
علَّما
|
|
ولأمــه
الزهـرا
خديجـة
إرْثُ
مـا
|
للأم
فاطمـــة
وليـــس
مســلهما
|
|
ولــه
قبيلــة
لا
يـرام
مرامهـا
|
ومرامهــا
للمكرمــات
فأَلْمَمَــا
|
|
فتراهــا
عنـد
شـدائدٍ
برخائهـا
|
عنــد
النُّـزول
وجوههـا
متبسـما
|
|
وفروعهــا
بأصـولها
حسـباً
سـمت
|
ولطيــب
أصـلٍ
طـاب
فـرعٌ
حيثمـا
|
|
فرجالهــا
يبنــون
كــل
خليفـة
|
حسـنت
وحسـن
نسـائها
بُني
مأتما
|
|
فــتراهم
عُربــاً
وهــنّ
عــرائب
|
وغـــرائب
أترابهـــن
بميســما
|
|
لهــمُ
خــدورٌ
ظلمــة
وهـم
لهـا
|
كبـدور
أحسـن
مـا
يضـيء
مظلمـا
|
|
كــل
أعــد
ومــا
يــزن
بريبـة
|
ممــا
بنــاد
نيــل
أو
متزلمـا
|
|
هـذا
وإنـي
قـد
رأيـت
جميـع
ما
|
عــــديته
ولأهلــــه
متوســـما
|
|
غربــاً
شـمالاً
أو
يمينـاً
مطلعـاً
|
عُربـاً
وعجمـاً
كـافراً
أو
مسـلما
|
|
فـإذا
الريـاح
مع
الرواح
تنسَّمت
|
ألفيتنـــي
متروّحـــاً
متنســّما
|
|
ومـع
الضـُّحى
أضـحى
بهـا
متضحياً
|
وبقرِّهـــا
وبحرِّهـــا
متلثمـــا
|
|
قصـدي
بـذا
الجـولان
قـول
نبينا
|
وسـواه
ثـم
مناسـك
تُجلـي
الغما
|
|
ولقـد
رجعـت
ومـا
قضـيت
لجولتي
|
إن
الطعــام
يقــوي
أكلاً
منهمـا
|
|
لكنــه
حــب
المــواطن
أهلهــا
|
أوبــى
بنـا
ولسـنة
ولنعـم
مـا
|
|
مـن
بعـد
أخـذ
حـوائجي
وفوائداً
|
والرمـي
يرجـع
للبلاد
ولـو
طمـا
|
|
مـن
غيـر
مـا
وهن
ولا
خوف
المللْ
|
ولســان
حــال
يصـدق
المتكلّمـا
|
|
ولقـد
رضـيت
مـن
الـدهور
بمرها
|
مــراً
وحلــواً
للصــدور
مغمّمـا
|
|
ولقـد
نظـرت
بعين
صدق
ذا
الورى
|
ووراءهــا
وأمامهــا
والمكتمـا
|
|
وملوكهــا
وقيادهــا
وزراءهــا
|
علماءهــا
وجهاءهــا
لا
مســئما
|
|
وذكورهــا
وإناثهــا
وكبارهــا
|
وصـــغارها
متحبّبـــاً
مترحّمــا
|
|
وأخــذت
مأخـذها
صـرفت
بصـرفها
|
ودخلــت
مــدخلها
دخـولاً
أحزمـا
|
|
ورأيـت
منهـا
مـا
يسـر
رأته
بي
|
متجافيــاً
عــن
غيــره
متصـلّما
|
|
وصـــحبت
كلاً
لا
صـــحابة
قــاطع
|
بــل
مــورداً
لوصــاله
متجسـما
|
|
وجميعهـــم
لا
مــراود
لإقــامتي
|
مـن
عند
أدنى
لمن
يكون
الفدغما
|
|
وعلمـــت
كلاً
جـــاهلاً
لحقيقــتي
|
بتجــاهلي
وتغــافلي
متهينمــا
|
|
ولقـد
شـكرت
إلهـي
حيـث
يـولني
|
نعمــاً
ويــدرأ
غيرهـا
متألمـا
|
|
بحـوائجي
حمـداً
عليهـا
علمتهـا
|
وفــوائدي
فعليكهـا
ذا
الأزكمـا
|
|
فمثـال
ذي
الدنيا
سراب
القيعتي
|
فحســابه
مــاءٌ
يعيـي
المغشـِما
|
|
فتحبّبــــنّ
لحبهـــا
ولأهلهـــا
|
واصــحبهما
دخلاً
وحــذراً
منهمـا
|
|
والنـاس
إن
تصـحب
فصـاحب
عشـرة
|
وبعشـرة
فاصـحب
لتنجو
من
العمى
|
|
عقــلٌ
وعلـمٌ
ثـم
دينـك
واصـبرن
|
والليـن
والجـود
البرور
وأحلما
|
|
والعـرف
والشـكر
الدوام
مداوماً
|
لـذي
عشرة
وذويها
فاصحب
وأدوما
|
|
والمـال
عرضـك
صـن
بـه
أن
تجمع
|
والحمـد
خير
المال
خذ
لن
تعدما
|
|
وإذا
عليــك
غمــار
أمـر
تبهـض
|
لا
تأخــذن
قنــوط
غــرٍّ
مــذئما
|
|
وخُــذَنَّ
صــبر
ألاء
عـزم
واسـتوي
|
لمـن
اسـتوى
وعجـل
حيث
المرتما
|
|
وعـداك
شـرياً
كـن
لهـا
ومواليا
|
أريـاً
وراحـاً
للمـوالي
إن
امما
|
|
والمـرء
حيـث
يكـون
كـان
حديثه
|
وظنــونه
حيــث
الفعـال
محكمـا
|
|
وفعـاله
حيـث
الطَّعـام
فـأين
هو
|
والـدّين
ينسـب
للمُخالـل
أينمـا
|
|
ولربمــا
أبــدى
العـدو
صـداقة
|
وعــداوة
يبـدي
الصـديق
لربمـا
|
|
لا
تنظــرن
لــذا
وذاك
فاحــذرن
|
إن
الرمـي
يـراد
أبعـد
مـن
رمى
|
|
وســـلامة
إن
رمتهـــا
مســلومة
|
إيــاك
أن
تُلفـى
حياتـك
مسـلَما
|
|
أو
أن
تعـوِّل
فـي
الأمور
على
أحد
|
أو
أن
تــرد
جميــل
عـزم
صـمما
|
|
أو
أن
تهيــن
مهــذباً
لرثاثــةٍ
|
أو
أن
تعظــم
جــاهلاً
أو
تـذمما
|
|
أو
أن
تضـــيف
إليــك
مواتيــاً
|
خُلُقَــاً
وسـيرة
طبعـك
المتعلمـا
|
|
لا
سـيما
سـفراً
وقيـل
مـن
المثل
|
عنــا
خيــاراً
اغربــن
لنعتمـا
|
|
وإذا
تريــد
تســافرن
فخــاطرن
|
بكــرائم
الأنسـاب
تكفـى
منـدما
|
|
وإذا
تريـــد
تزوجــاً
فتــأهّلن
|
مــن
بيـت
ديـن
لا
يكـون
مُتْهَمَـا
|
|
إنَّ
الرفيـق
يـراد
قبـل
طريقهـم
|
والجـار
قبـل
الدار
يطلب
مرسما
|
|
والليــل
كِـنَّ
لمـا
تُحِـبُّ
خفـاءَهُ
|
ولمــا
تحـب
ظهـوره
كـن
أيومـا
|
|
ولمقصــدٍ
قمــراً
تكـون
مقهقـرا
|
فـي
عيـن
نـاظره
الأمـام
مؤمّمـا
|
|
وبغربـــة
لا
تصـــحبن
مبطنـــاً
|
فبطانــة
للســوء
تـذهب
محرمـا
|
|
وبغربـــة
لا
تصـــحبن
مذبــذباً
|
فمذبــذبٌ
أفعــى
تنيــب
مسـمما
|
|
وبغربـــة
لا
تصـــحبن
مبـــذراً
|
إن
المبــذر
للشــياطين
يُرْسـَما
|
|
واصــحب
مــوات
لا
يبطــن
مسـتو
|
ســرفاً
يباعـد
لا
يقـاتر
درهمـا
|
|
واصــحب
لحــرّ
إذ
تلـوم
يقيمـه
|
واصــحب
نسـيباً
لا
يبـدل
معتمـا
|
|
واصـحب
خيـاراً
فالخيـار
تعز
من
|
يـدنو
لهـا
وبصـحبة
لـن
تكلمـا
|
|
واقـدم
كقسـورةٍ
أديبـاً
واقتنـص
|
لعلــوم
نافعـة
حَلَـتْ
أو
علقمـا
|
|
ولمـا
نـأى
قِسْ
بالذي
دنا
وادنُهُ
|
فـإذا
فعلـت
لـذاك
نلت
المحتما
|
|
وإذا
نبـت
بـك
في
الزمان
مواضعٌ
|
أو
نابـك
الكمـد
ارحلـنّ
محذرما
|
|
وإذا
تريــد
طلاق
نســوية
فَقُــمْ
|
وارحـل
أو
ارْحَلْهَا
قبيل
المصرما
|
|
وثلاثــة
ليـس
المكـافي
يكافهـا
|
ضــيفٌ
وطــامِعُ
ثـم
خـاطب
أيمـا
|
|
وثلاثـــة
إياكهـــا
لا
تـــأمنن
|
فعــدىً
نســاءً
أو
سـفيهُ
ملمّمـا
|
|
وثلاثـــة
فـــاظلم
وإلا
تُظلـــم
|
عبـدٌ
كـذا
ولـدٌ
وزوجـةُ
فاظلمـا
|
|
وثلاثـة
لِلْحُـبِّ
تـورث
فـي
الزمـن
|
فتواضـــعٌ
أدبٌ
وديــنٌ
فالزمــا
|
|
وثلاثــة
بجّــل
لهــا
عـزاً
تنـل
|
شـيخاً
وسـلطاناً
ووالـدك
اخـدما
|
|
وإذا
لـك
الأمـر
الصعيب
رموا
له
|
هـوّن
عليـك
يهـن
لـه
تـر
سـلما
|
|
والنـاس
مثـل
النـاس
ثـم
بلادها
|
كبلادهــا
اللائي
بعينـك
فاحكمـا
|
|
ووِفــاقُ
كُــلٍّ
أن
تقابـل
بالـذي
|
يرضــيك
منــه
وفاعـلٌ
ذي
قلّمـا
|
|
وســوى
تقــي
باعـدنَّ
مـن
الـذي
|
ينمــي
لأهــل
الــدهر
كلاً
كلمـا
|
|
وقناعــة
أسـنى
اللبـاس
تجمّلـن
|
بقناعــة
فبعزهــا
لــن
تهـدما
|
|
واكتـم
أمـورك
إذ
تريـد
نجاحها
|
ومعـان
سـِرِّ
الحـق
حقـاً
فاكتمـا
|
|
ودع
التَّـدَعّي
للمقـام
ولـو
تصـل
|
واتـرك
لغيـر
مكـون
كـي
تغنمـا
|
|
وحقيقــة
كــن
وازنــاً
بشـريعة
|
وشــريعة
بحقيقــة
لـك
فاعممـا
|
|
وطريقــة
للقــوم
ســلّم
أهلهـا
|
وإليــك
مـن
نكـران
غـرٍّ
معجمـا
|
|
فخلاف
علــم
ليــس
يحصــر
حاصـر
|
والطّـرق
للمـولى
بعـدِّ
المغنمـا
|
|
واعلـم
بـأني
مـا
ذكرت
لذا
هوى
|
ولـبيس
مـا
يهـوى
يقـال
وبيسما
|
|
بــل
إنــه
لتــذكُّرٍ
ولفيـد
مـن
|
يهــوى
لفــائدة
بحــب
مفعمــا
|
|
ولكــونه
قــد
قيـل
بعـد
تجـرّبٍ
|
يهواه
ذو
القلب
السليم
المسقما
|
|
وإذا
الـدليل
تـراه
جـاء
طريقة
|
منهــا
يجيـء
صـراطه
خـذ
قلمـا
|
|
والـدهر
مثـل
الأيكـة
الْعُلْما
له
|
كقـــوادمٍ
ومُجَــرِّبٌ
عــودٌ
هُمــا
|
|
ولقـد
حمـدت
بعيـد
قـول
لكـونه
|
أُحــبي
بســامعه
وحــبَّ
تَعَلُّمــا
|
|
بفــتى
قريضــا
يُمْلِــهِ
وفنـونه
|
وفنــــونه
بتفنـــن
تتقـــدّما
|
|
حــاولت
حيــن
رأيـت
أن
أمْحَنـه
|
فمنحتــه
بعــد
اختيـاري
يممـا
|
|
فعلمـت
أن
الشـبل
والـده
الأسـد
|
وكريــمُ
أصــلٍ
لا
يغيـره
الظمـا
|
|
فجعلتــه
وســط
الفـؤاد
وشـغفه
|
شــغفاً
لـه
وجزائنـا
المتيممـا
|
|
وبشـــكره
أنميتـــه
بجماعـــة
|
درراً
هواهـا
هـوى
لنـا
متنظمـا
|
|
فأمورنــا
حمــداً
ببــدء
واحـد
|
تعلـو
بحـول
الله
تنمو
المختما
|
|
وبــه
صـلاتي
علـى
النـبي
محمـد
|
لكمــاله
بكمالهــا
لـن
تحتمـا
|
|
وبـه
حمـدت
علـى
الختام
وبدئها
|
مســتغفراً
مـن
كـل
ذنـب
يختمـا
|