|
صــبا
قلـبي
إلـى
نجـد
وهامـا
|
فحــالفت
الصــبابة
والهيامـا
|
|
وطــار
القلـب
مـن
وجـد
وشـوق
|
وطرفـي
فـي
الذم
المسفوح
عاما
|
|
فـدع
يـا
عـاذلى
عـذلى
ولـومي
|
فقلــبي
عـن
ملامـك
قـد
تعـامى
|
|
فلـو
تـدرى
الصـبابة
من
فؤادي
|
لمــا
فـوقت
فـي
عـذلى
سـهاما
|
|
وإنــك
لا
تــرى
للشــوق
معنـى
|
ولا
تــدرى
المجيــة
والغرامـا
|
|
فلا
واللـــه
مــا
قلــب
خلــي
|
كقلــب
قـد
سـقاه
الحـب
جامـا
|
|
ولا
عيــن
تنــام
الليــل
طـرا
|
كعيـن
فـي
المحبـة
لـن
تنامـا
|
|
أمــا
واللــه
إن
الحــب
بـؤس
|
بـه
العشـاق
قد
لبسوا
السقاما
|
|
وأوردهـــم
مـــوارد
مهلكــات
|
فــذاقوا
فـي
مغبتـه
الحمامـا
|
|
ولكنـــى
بـــأمر
الحـــب
راض
|
قريـر
العيـن
أرعـاه
الـذماما
|
|
فـــإن
الحـــب
أقــام
ولكــن
|
أجـل
الحـب
مـا
أعلـى
المقاما
|
|
كحـبي
المصـطفى
خيـر
البرايـا
|
شـفيع
المـذنبين
حمـى
اليتامى
|
|
غيــاث
الكـون
فـي
خصـب
ومحـل
|
نـــديّ
الكــف
كهــف
للأيــامي
|
|
رحيــم
القلــب
فيــاض
كريــم
|
غزيـر
الغيـث
ينسـجم
انسـجاما
|
|
مليــح
الــوجه
يعلــوه
وفـار
|
يضـىء
الليـل
إن
حسـر
اللثاما
|
|
لهيبتـــه
ملـــوك
الأرض
خــرّت
|
إلـى
الأذقـان
خوفـا
واحترامـا
|
|
أتـى
والنـاس
فـي
ظلمـات
شـرك
|
فبــدّد
جيشــه
ومحــا
الظلامـا
|
|
وبــدلهم
بـداجى
الكفـر
نـورا
|
وأرشــدهم
إلــى
ديــن
تسـامى
|
|
وبشــرهم
بــأن
العــز
فيهــم
|
إذا
عرفـوا
المحلـل
والحرامـا
|
|
وأن
الســكون
يخشــاهم
جميعـا
|
وأن
النصــر
رائدهــم
دوامــا
|
|
وخــاطبهم
بليــن
القـول
حـتى
|
إذا
مـا
أعرضـوا
شـهرَ
الحساما
|
|
فبـدّد
شـمل
مـن
رامـوا
عنـادا
|
فـذاقوا
فـي
عنـادهم
الحمامـا
|
|
وكـــم
أرضــى
محــالفه
وأردى
|
مخـــالفه
جـــزاء
وانتقامــا
|
|
بــه
عرفـوا
سـبيل
الحـق
لكـن
|
أرادوا
الكيد
واتبعوا
الخصاما
|
|
فمــا
راعــوا
لحرمتـه
حقوقـا
|
ولا
عرفــوا
التـودد
والوئامـا
|
|
فناشـــدهم
قرابتـــه
فولــوا
|
فأصـــلاهم
حروبــا
واغتنامــا
|
|
وفـــرق
جمعهــم
أســرا
وقتلا
|
ومــزق
جســمهم
قلبــا
وهامـا
|
|
وأيقظهــم
بصـوت
الحـق
جهـارا
|
وكــانوا
قبــل
بعثتـه
نيامـا
|
|
ولـــولا
أن
أجــابوه
لكــانوا
|
جــذاذا
أو
هشــيما
أو
رغامـا
|
|
تحـــداهم
فـــأعجزهم
فخــروا
|
ســجودا
حينمـا
كـانوا
قيامـا
|
|
فــــأعجزهم
بقـــرآن
بليـــغ
|
فصــاروا
مــن
بلاغتــه
كهامـا
|
|
ولمــا
شـاهدوا
الأنـوار
عضـوا
|
مــن
التفريـط
أيـديهم
نـدامى
|
|
وصــاروا
بعــد
هـديهم
جميعـا
|
لأمــر
الـدين
والـدنيا
قوامـا
|
|
وقـد
نـالوا
بنصـرته
المعـالى
|
وبعـد
الغـي
قـد
صـاروا
كراما
|
|
نــبى
قــد
أتـاه
اللـه
علمـا
|
وحلمــا
واعتبــارا
واحترامـا
|
|
نــبى
شــب
فــي
أســمى
كمـال
|
وعـن
وصـف
الـدنايا
قـد
تحامى
|
|
فســـموه
الأميــن
وكــان
طفلا
|
وبعـد
الرشـد
كـان
لهـم
إماما
|
|
ببعثتــه
المكــارم
قـد
تجلـت
|
فـولى
الشـرك
وانهـزم
انهزاما
|
|
وسـاد
الأمـن
بعـد
الخـوف
حـتى
|
ترقـى
الكـون
وانتظـم
انتظاما
|
|
وأشــرقت
العــوالم
مـن
ضـياه
|
فثغــر
العـز
يبتسـم
ابتسـاما
|
|
أجــل
الخلــق
مــن
إنـس
وجـن
|
وأعلاهـــم
وأرفعهـــم
مقامــا
|
|
ملائكـــة
الإلـــه
لــه
جنــود
|
إذا
مـا
نـام
أو
للحـرب
قامـا
|
|
وراء
ركـــابه
جبريــل
يمشــى
|
وميكائيــل
قـد
أخـذ
الزمامـا
|
|
نــبى
كــم
لــه
مــن
معجـزات
|
تفــوق
النجـم
عـدا
وانتظامـا
|
|
كبهمــة
جــابر
لمــا
دعــاهم
|
فأشـبعهم
ومـا
نقصـوا
الطعاما
|
|
ســقى
الآلاف
مــن
مــاء
قليــل
|
فـأرواهم
ومـا
نقصـوا
الجماما
|
|
وكــال
لجــابر
تمــرا
فــوفّى
|
وعـذق
النخـل
مـذ
أو
ما
ترامى
|
|
ولـم
يسـكن
حنيـن
الجـذع
حـتى
|
دنـــا
منــه
وأولاه
التزامــا
|
|
ونطــق
الضـب
والسـرحان
أضـحت
|
لــه
الأســماع
تنفصـم
افصـاما
|
|
لـه
القمـر
المنيـر
انشق
جهرا
|
وعــاد
لأفقــه
بــدرا
تمامــا
|
|
وحيـن
شـكا
إليـه
القـوم
جدبا
|
فمـد
الكـف
واستسـقى
الغمامـا
|
|
ولمــا
أن
طغــى
أو
مـا
إليـه
|
فســار
الغيـث
يسـتبق
الإكامـا
|
|
كنــوز
الأرض
قــد
عرضـت
عليـه
|
فـأعرض
عـن
زخارفهـا
اعتصـاما
|
|
شــفيع
المـذنبين
أجـب
نـدائي
|
فــإني
بعــض
مـن
صـلى
وصـاما
|
|
وخــذ
بيــدي
ولا
تقطـع
رجـائي
|
فقلــبي
فــي
محبتـك
اسـتهاما
|
|
رســول
اللــه
إنــي
مســتجير
|
بجاهــك
أن
أهــان
وأن
أضـاما
|
|
فجاهــك
للــورى
جــاه
عريــض
|
يعــز
المســتجير
بــه
دوامـا
|
|
فمــد
يــديك
نحـوى
واجتـذبني
|
لعلـــى
أن
أرى
ذاك
المقامــا
|
|
وألثــم
تــرب
أرض
أنـت
فيهـا
|
فــإن
ترابهـا
يشـفى
السـقاما
|
|
فطيبـــه
للــورة
طيــب
وطــب
|
وفــردوس
بهـا
الهـادى
أقامـا
|
|
رسـول
اللـه
روحـى
فـي
اشتياق
|
وتطلــب
أن
تـراك
ولـو
منامـا
|
|
رسـول
اللـه
صـبرى
كـاد
يفنـى
|
وكـاد
العمـر
ينصـرم
انصـراما
|
|
وقـد
خـط
المشـيب
بفـود
رأسـى
|
ســطورا
أنهكـت
منـى
العظامـا
|
|
لبسـت
الشـيب
تاجـا
مـن
بيـاض
|
فصــار
بنـاظرى
يحكـى
الظلامـا
|
|
فهـل
لـي
فـي
التلاقـى
من
سبيل
|
فعمــرى
زاد
عـن
خمسـين
عامـا
|
|
أظــل
أقــول
مــن
شـوق
ووجـد
|
علام
الـــدهر
يمنعنــى
علامــا
|
|
فــإن
تكـن
المعاصـى
أقعـدتني
|
وحــالت
دون
أن
نلـت
المرامـا
|
|
فـــإن
اللـــه
غفــار
رحيــم
|
لمــن
للــه
أخلــص
واسـتقاما
|
|
وإنـــى
مخلــص
ســرا
وجهــرا
|
ونفســي
تكـره
الأمـر
الحرامـا
|
|
وإن
أك
فـي
الصـبا
ألممت
ذنبا
|
فعفــوك
يـا
إلهـى
قـد
تسـامى
|
|
ولــى
نســب
بخيـر
الخلـق
طـه
|
بــه
أرجــو
السـلامة
والسـلاما
|
|
محمـــد
ســيد
الأكــوان
طــرا
|
وأفضـل
مـن
بـأمر
اللـه
قامـا
|
|
فكــف
يـد
العـدا
عنـى
وجـدلى
|
بمنحــة
لمحــة
تـروى
الأوامـا
|
|
وأولادي
وذو
رحمــــى
وأهلـــى
|
ومعشـر
إخـوتي
واشـف
السـقاما
|
|
ولا
تجعـــل
لمخلـــوق
علينــا
|
يــدى
ضـغط
ولـو
كـان
الإمامـا
|
|
ولا
تثقـــل
كواهلنـــا
بــدين
|
كـثيرا
كـان
أم
سـاوى
الجراما
|
|
وأمطرنــا
الغنــى
سـحا
ووبلا
|
ولا
تجعـــل
ســحابتنا
جهامــا
|
|
رســول
اللــه
أرضـك
خيـر
أرض
|
فـأنى
لـي
أرى
فيهـا
الخيامـا
|
|
فـــؤادي
بالحجــاز
وســاكنيه
|
مــن
الأشـواق
يضـطرم
اضـطراما
|
|
مــتى
الأقـدار
تـدنيني
إليهـم
|
وتبصـر
مقلـتي
الـبيت
الحراما
|
|
فأرمـل
فـي
طـواف
الـبيت
سبعا
|
وللأركـــان
الــتزم
التزامــا
|
|
وأقصــد
زمزمــا
آنــا
فآنــا
|
ليطفىــء
ماؤهـا
منـى
الأوامـا
|
|
وأســعى
بالخشــوع
بكــل
ركـن
|
وألــتزم
المصــلى
والمقامــا
|
|
وفـي
يـوم
الوقـوف
أعـد
نفسـي
|
سـعيد
الحـظ
إذ
نلـت
المرامـا
|
|
إذا
مـا
النـاس
قد
لبوا
جميعا
|
وهــام
الكـل
واختلفـوا
كلامـا
|
|
ومـا
جـوا
إذ
أفاضـوا
في
سرور
|
بنجـح
القصـد
واشـتدوا
زحامـا
|
|
وفـي
رمـى
الجمـار
أرى
ذنـوبى
|
محطمــة
وقــد
كــانت
جســاما
|
|
وبعــد
وداع
بيـت
اللـه
زدنـا
|
لريــة
طيبــة
الهـادى
غرامـا
|
|
قطعنـا
البيـد
مـن
سـهل
وحـزن
|
فلا
واللــه
لــم
نــدرك
سـآما
|
|
رأينـا
القبـة
الخضـرا
فهمنـا
|
فسـا
لالـدمع
وانسـجم
انسـجاما
|
|
بهـا
السـر
المصـون
وكـل
فضـل
|
بهـا
نـور
النبـوة
قـد
تسـامى
|
|
بهـا
سـر
الوجـود
بها
التهامى
|
بهـا
مـن
علـم
الكـرم
الكراما
|
|
بهــا
مــن
لا
يضـام
لـه
نزيـل
|
ثمـال
المرمليـن
حمـى
اليتامى
|
|
تخيــل
لـي
رسـول
اللـه
نفسـي
|
بـأنى
فـي
حمـاك
أرى
المقامـا
|
|
وأنــى
زرت
بيــت
اللــه
لكـن
|
وحقــك
لـم
أزره
ولـو
لسـماما
|
|
فحقــق
حســن
ظنــى
يـا
إلهـى
|
وبلغنــي
وأحبــابي
المرامــا
|
|
وصـــل
مســـلما
فــي
كــل
آن
|
علـى
مـن
كـان
للعليـا
ختامـا
|