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لـك
اللطـف
الخفـي
فكـل
حي
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بلطفـك
يـا
إلهـي
في
سعاده
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وقـد
عـوّدتني
كرمـا
وحلمـا
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خفـى
اللطـف
من
زمن
الولاده
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فلا
تقطعــه
يـا
مـولاي
عنـي
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فمنـك
اللطـف
لا
أخشى
نفاده
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وجمـل
بـالتقى
روحـي
وقلبي
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وتــوجني
بـأنوار
العبـاده
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ولا
تقطـع
رجـائي
منـك
إنـي
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أخـو
ديـن
فعجّـل
لـي
سداده
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وصـن
مـاء
المحيـا
عن
لئيم
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وبلغنـي
من
العليا
الزياده
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وصــن
أهلـى
وأولادي
وبيـتي
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وشـيد
بـالتقى
أبـدا
عماده
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ومتعنـــي
بإقبـــال
وعــز
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وبلغنـي
السـعادة
والسياده
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وداو
الجسـم
مـن
مـرض
وسقم
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وجنبنــي
التكاسـل
والبلاده
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ونـق
القلـب
مـن
حـد
وحقـد
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ومـن
كـبر
وأصـلح
لي
فساده
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وعــاملني
بإحســان
ولطــف
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فمنـك
اللطـف
والإحسان
عاده
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إلهـى
في
الصبا
حالفت
نفسي
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وخـالفت
التنسـك
والزهـاده
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وكـم
أنضـيت
نضـوى
في
رضاه
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وكـم
أجريـت
مضـطرا
جـواده
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فنــدّ
بمهجـتي
فـي
كـل
واد
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فمـا
أحسـنت
من
ضعفي
قياده
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وألبسـني
ثيـاب
الجهل
قهرا
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وطــــوقني
كمأســـور
قلاده
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وغـالبت
الصـبا
فغلبت
قهرا
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وملّــت
قـوّتي
طبعـا
جهـاده
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وقـد
ضحك
المشيب
بفود
رأسي
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وشـمس
الشيب
قد
سترت
سواده
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وحـل
الضـعف
وانكشف
المخبا
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ولـم
أخـذ
ليوم
الحشر
زاده
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ولكـن
قـد
رددت
جمـاح
غيـي
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ولازمــت
التنسـك
والعبـاده
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وتبت
إلى
المهيمن
من
ذنوبي
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وجــانبت
الأرائك
والوسـاده
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لزمـت
عبـادتي
وتركـت
لهوى
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وقـد
جـانبت
من
ليلى
رقاده
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إلهـى
مـا
عصـيتك
باختياري
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فــإن
جـوارحي
وفـق
الإراده
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ولكـن
كـان
قلـبي
غيـر
راض
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وإن
اللـه
قـد
قوى
اعتقاده
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وبالتوحيــد
معمـور
فـؤادي
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وأحلـى
ما
أقول
هو
الشهاده
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وحـب
المصطفى
المختار
ديني
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وآل
الـبيت
أصـحاب
السياده
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فيــا
مــولاي
وفقنـي
وبلّـغ
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بفضـلك
عبـدك
الفاني
مراده
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فلـى
نسـبٌ
بخيـر
الخلـق
طه
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وأخشــى
أن
يجنبنــي
وداده
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عليـه
اللـه
صـلى
كـل
حيـن
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وسـلم
مـا
سـقى
غيـث
عهاده
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وعــترته
وأصــحابه
كــرام
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نجوم
الفضل
في
أفق
السعاده
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