|
سـل
عـن
فـؤادي
سـلعا
فهـو
مثواه
|
وحــي
حـي
الحمـى
إن
جـزت
مغنـاه
|
|
وانـزل
بوادي
النقا
من
سفح
كاظمة
|
واحـذر
عيون
المها
إن
رسمت
سكناه
|
|
وقــل
لظـبي
جنـى
بالفتـك
نـاظره
|
حلـو
الشـمائل
مـن
بالفتـك
أفتاه
|
|
ومــن
علــى
مهــج
العشـاق
سـلطه
|
ومـن
علـى
الغيـر
بالألحـاظ
أغراه
|
|
ريـم
رمـى
مهجـتي
عـن
قـوس
حاجبه
|
سـهما
أصـاب
صـميم
القلـب
اصـماه
|
|
مـا
كنـت
أحسـب
أن
اللحـظ
يجرحني
|
حـتى
رمتنـي
بسـهم
اللحـظ
عينـاه
|
|
يا
عرب
وادى
النقا
إن
حل
سقك
دمى
|
فــي
شـرعكم
فضـميري
ليـس
يأبـاه
|
|
إن
مــتّ
بالعشــق
لا
خـوف
ولا
جـزع
|
فميــت
العشـق
دار
الخلـد
مـأواه
|
|
وإن
أعـش
كـان
لـي
فـي
قربكم
أمل
|
فالصـبر
تحمـد
بعـد
الضـيق
عقباه
|
|
لا
أكـذب
اللـه
قلـبي
بالنقـا
ولع
|
مهمــا
بعــدت
فـإني
لسـت
أنسـاه
|
|
يـا
حـادي
العيس
بلغ
إن
نزلت
بهم
|
وجـدى
وشـوقي
ومـا
بالبعـد
ألقاه
|
|
وقـل
صـريع
الهـوى
مـن
وجـده
دنف
|
والنفــس
فـي
لوعـة
والقلـب
أواه
|
|
يــبيت
والشــوق
يطــويه
وينشـره
|
ووابــل
الـدمع
خـد
الخـد
مجـزاه
|
|
والنــوم
خــالفه
والسـهد
حـالفه
|
والنجـم
فـي
الليل
أنى
سار
يرعاه
|
|
مـتى
الليـالى
بـذاك
الحـي
تجعنا
|
إن
الوجــوه
لبــدر
التـم
أشـباه
|
|
للــه
ربــع
بــه
الأغصـان
مائسـة
|
وروضــة
الغـض
حسـن
الزهـر
وشـاه
|
|
هـزت
نسـيم
الصـبا
أعطـاف
دوحتـه
|
فعطرتنــا
بنفــح
المســك
ربــاه
|
|
وغــردت
فـوق
غصـن
البـان
سـاجعة
|
من
رقة
اللحن
أهل
العشق
قد
تاهوا
|
|
إذا
ادكــرت
حمــاهم
يـوم
زورتـه
|
زدت
انتعاشـا
ووجـدا
عنـد
ذكـراه
|
|
كــأنني
ويــد
الأشـوقا
تلعـب
بـي
|
مجنــون
ليلــى
عــراه
وجـد
ليلاه
|
|
أوأنــى
ورجــاء
القــرب
خـامرني
|
شــربت
راحــا
رويــا
مـن
حميـاه
|
|
لهفــي
عليـه
ففيـه
العـز
أجمعـه
|
فمــا
أتــم
الهنـا
فيـه
وأهنـاه
|
|
منـه
بـدا
النـور
لا
تخبـو
أشـعته
|
ونـــور
طـــه
رســول
اللــه
جلاه
|
|
محمــد
مــن
أنـار
الكـون
طلعتـه
|
وأصــبح
الكــل
مســرورا
بمــرآه
|
|
الفاتـح
الخـاتم
المختـار
من
مضر
|
مــن
أيـد
اللـه
بـالقرآن
دعـواه
|
|
بخيــر
وصــف
مــن
الأوصـاف
جملـه
|
وأشــرف
اســم
مـن
الأسـماء
سـماه
|
|
كـل
المحامـد
فـي
أسـمائه
اجتمعت
|
فالاسـم
طـابق
فـي
المعنـى
مسـماه
|
|
كــم
آيـة
ظهـرت
فـي
يـوم
مولـده
|
وكـم
وكـم
أفصـحت
بـالنطق
أفـواه
|
|
وأصـبح
الشـرك
والأصـنام
فـي
نكـد
|
وذلّ
مـــن
كــان
معــتزا
بعــزّاه
|
|
وارتـج
إيـوان
كسـرى
عنـد
مولـده
|
وبــات
مضــطرب
الأفكــار
كســراه
|
|
والكفـر
قـد
أغمص
العينين
محتضرا
|
وقـــــال
واحســــرتا
أواه
أواه
|
|
الحـق
جـاء
وروح
الكفـر
قـد
زهقت
|
والحـــق
يعلـــو
لأن
اللــه
أعلان
|
|
شــهر
الربيــع
علا
قـدرا
بمولـده
|
وزاد
عــن
بهجـة
العيـدين
ذكـراه
|
|
وكيـــف
لا
ورســول
اللــه
شــرفه
|
بيمــن
طلعتــه
الغــرا
واســماه
|
|
وكـان
مسـراه
والمعـراج
فـي
رجـب
|
فحبـــذا
حبــذا
للســعد
مشــراه
|
|
فكــان
معراجــه
للعــرش
متصــلا
|
سـبحان
مـن
جعـل
المعـراج
مرقـاه
|
|
وقــد
دنــا
فتــدلى
مـن
حظيرتـه
|
وخصـــه
بجميـــل
القــرب
مــولاه
|
|
لســدرة
المنتهــى
جبريـل
أوصـله
|
والنــور
بالســر
يغشـاه
ويغشـاه
|
|
كقـاب
قوسـين
أو
أدنـى
له
انكشفت
|
حجــب
الغيــوب
وبـالتعظيم
حيـاه
|
|
فنــال
مـا
نـال
مـن
إجلال
خـالقه
|
لا
العـرش
يـدرى
ولا
مـن
فيه
مغزاه
|
|
منـه
عليـه
صـلاة
الخمـس
قـد
فرضت
|
فــي
كــل
يــوم
بلا
وحــي
تلقـاه
|
|
هــذي
هـي
النعمـة
العظمـى
لأمتّـه
|
فيهــا
الســعادة
والإجلال
والجـاه
|
|
تلـك
المزيـة
لـم
يظفـر
بهـا
أحد
|
ولـم
يفـز
بارتقـاء
العـرش
إلا
هو
|
|
فــالعرش
بالمصـطفى
لا
شـك
مفتخـر
|
مـذ
سـار
فـوق
بسـاط
العـرش
نعلاه
|
|
مـن
ذا
يـدانيه
أو
مـن
ذا
يشابهه
|
واللــه
دون
جميـع
الرسـل
أدنـاه
|
|
وكيــف
لا
وإلــه
العــرش
فـي
أزل
|
مــن
نــوره
ببـديع
الصـنع
سـواه
|
|
فكــان
نـورا
علـى
نـور
يسـر
بـه
|
مـن
شـاهد
النـور
يزهـو
في
محياه
|
|
وكـــان
بــالحلم
والآداب
متصــفا
|
إن
الإلـــه
علـــى
الآداب
ربـــاه
|
|
كـل
الكمالات
في
خير
الورى
اجتمعت
|
وكــل
لفــظ
جليــل
فهــو
معنـاه
|
|
قـد
بيـن
اللـه
فـي
نـون
فضـائله
|
ومنتهـى
الفضـل
فيمـا
بيـن
اللـه
|
|
هـذا
النـبي
أبـاد
الكفـر
صـارمه
|
مـن
بعـد
مـا
عاندوا
في
رد
دعواه
|
|
ففــاز
بــالعز
مــن
ولاه
وجهتــه
|
ومــن
تــولى
فــإن
اللـه
أخـزاه
|
|
عقــابه
الأســد
والعقبـان
تتبعـه
|
لتغنــم
الفىــء
مــن
أشـلاء
قتلاه
|
|
تعنــو
لهيبتــه
الأبطــال
واجمـة
|
مــن
بأسـه
وذوو
التيجـان
تخشـاه
|
|
خــرت
لـه
سـجدا
مـن
فـرط
هيبتـه
|
والكـل
منهـم
بصـدق
الوعـد
وفـاه
|
|
لـو
لـم
يوفـوا
بصدق
الوعد
صبحهم
|
بجحفـــل
لجــب
كالشــهب
مرمــاه
|
|
إن
قــام
جـد
ولا
يلـوى
علـى
أحـد
|
وإن
دعــاه
فرنــد
الســيف
لبـاه
|
|
مــن
كــل
أروع
لا
تنبــو
مضـاربه
|
صــعب
الشــكيمة
مـن
لاقـاه
أرداه
|
|
كــأنهم
خلقــوا
للطعـن
مـن
صـغر
|
أو
قلبهـم
مـن
صـميم
الصخر
مبناه
|
|
لا
يبتغــون
سـوى
الرضـوان
منزلـة
|
وكـل
مـن
يبتغـي
الرضـوان
أرضـاه
|
|
وقـائد
العـز
يـوم
الحشـر
قائدهم
|
وكــل
مـن
قـاده
المختـار
بشـراه
|
|
هـذا
النـبي
لـه
الأشـجار
قد
سجدت
|
والضــب
أعــرب
بالفصــحى
وحيّـاه
|
|
والظــبى
كلمــة
والجـذع
حـن
لـه
|
فضـــمة
وبحســن
الصــبر
أوصــاه
|
|
وأنـه
مـن
غـراس
الخلـد
فـي
غـده
|
فطـاب
نفسـا
إلـى
مـا
سـوف
يلقاه
|
|
لـه
الـذراع
بـدس
السـم
قـد
نطقت
|
فلــم
يـذقها
وحسـن
النطـق
نجـاه
|
|
ورد
يــن
قتــاد
بعــد
مـا
قلعـت
|
وديــن
جـابر
أدنـى
النمـر
وفـاه
|
|
بلمسـه
الشـاة
درت
بعـد
مـا
يبست
|
للـــه
در
غــدا
الهــادي
وأرواه
|
|
مـن
كفـه
فـاض
نبـع
الماء
منبجسا
|
فـراق
شـربا
كمـا
قـد
راق
مجـراه
|
|
بـاليمن
واليسـر
كف
المصطفى
وكفت
|
سـيان
فـي
الجـود
يمنـاه
ويسـراه
|
|
لــولا
النــبي
ولــولا
سـر
بعثتـه
|
مــا
كــان
كـون
ولا
الخلاق
أنشـاه
|
|
ولا
وجــود
لهـذا
الكـون
مـن
عـدم
|
ولـــم
يكــن
آدم
شــاقته
حــواه
|
|
ولا
ســــماء
ولا
شـــمس
ولا
قمـــر
|
ولا
اســتنار
الــدجى
لـولاه
لـولاه
|
|
يـا
مـن
سـما
العرش
والأفلاك
منزلة
|
ومـن
بنصـر
الصـبا
قـد
خصـه
الله
|
|
ومـن
أنـاف
علـى
الجـوزاء
مقعـده
|
ومـن
حبـاه
المعـالي
حيـن
أعطـاه
|
|
ومـن
إذا
التجـأ
العـاني
لجـانبه
|
يبغــى
العنايــة
أغنـاه
وأقنـاه
|
|
قلــبي
بحبــك
مغمــور
وممتلىــء
|
وبيــت
حبـك
حاشـى
الضـيق
يغشـاه
|
|
ولا
يعـــذب
قلـــب
أنــت
ســاكنه
|
بـل
جنـة
الخلـد
والفـردوس
مأواه
|
|
يسـعى
إلى
الحور
والولدان
مغتبطا
|
ولا
يخيــب
بفضــل
اللــه
مســعاه
|
|
فكن
شفيعي
إذا
ما
الناس
قد
حشروا
|
والصـحف
قد
نشرت
والناس
قد
تاهوا
|
|
وأشـفق
الكـل
مـن
خـوف
ومـن
فـزع
|
وبـان
مـن
طـائرى
مـا
كنـت
أخشاه
|
|
فــامنن
علـيّ
بعطـف
منـك
يشـملني
|
فـأنت
وحـدك
لـي
دون
الـورى
جـاه
|
|
فأحمـــد
الحملاوي
فــرع
دوحتكــم
|
حاشـاك
حاشـاك
يـوم
الهـول
تنساء
|
|
واجعــل
لـه
منـك
حظـا
لا
يفـارقه
|
مــى
الزمــان
بــدنياه
وأخــراه
|
|
واعطـف
علـى
مـن
بمحض
الحب
أخلصه
|
وألأصـل
والفـرع
مـع
أفـراد
قرباه
|
|
ومــن
حمـى
دينـك
السـامي
وأيّـده
|
وللعبـــاد
بصـــدق
القصــد
أداه
|
|
والآل
والصــحب
والأحبــاب
قاطبــة
|
مـا
حـرّك
الشـوق
مشـتاقا
لرؤيـاه
|