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خـل
الأنـام
وخـذ
خير
الورى
جاها
|
ولـذ
بأنـدى
الـورى
كفا
وأرجاها
|
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جــاه
عريـض
وكـف
بالنـدى
وكفـت
|
سـيان
فـي
الجود
يمناها
ويسراها
|
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فكــل
جــاه
وذي
جــاه
لـه
تبـع
|
إن
الملــوك
بــه
ولـت
مزاياهـا
|
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كســرى
وقيصــر
لمـا
هـل
طـالعه
|
عليهمـا
الأرض
قـد
ضـاقت
بأرجاها
|
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وزال
مجـــدها
وانحــط
ســعدهما
|
إلـى
الحضـيض
فلا
كسـرى
ولا
شـاها
|
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وشــمس
عزهمــا
بالمصـطفى
أفلـت
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بعـد
الظهـور
فمـا
سارت
بمسراها
|
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وأصـبح
الكـون
بالمختـار
في
رغد
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والأرض
تضـحك
حيـث
الغيـث
وافاها
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هـذا
النـبي
الـذي
كـانت
نبـوّته
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طـب
القلـوب
فـداوات
كـل
مرضاها
|
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أحييـت
قواهـا
وكـانت
قبـل
ميتة
|
جـل
الـذي
برسـول
اللـه
أحياهـا
|
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وكيـف
لا
ورسـول
اللـه
مـن
أنـزل
|
أصــل
العـوالم
أعلاهـا
وأدناهـا
|
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سـر
الوجـود
وأسـمى
الكون
منزلة
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وخيـر
مـن
بحـديث
الصدق
قد
فاها
|
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هــذا
النـبي
لنـا
ركـن
وملتجـا
|
مـن
يلتجىـء
لسـواه
ضـل
أوتاهـا
|
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حصــن
حصــين
وجــاه
كلــه
أمـل
|
وكعبــة
فــاز
مـن
للنجـح
ولاهـا
|
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حاشــى
أضـام
ولـى
قلـب
يحـدثني
|
بـأن
لـي
مـن
يد
المختار
جدواها
|
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فكــم
لــه
نعــم
جلـت
مناقبهـا
|
وكــم
لــه
منــح
غـراء
أسـداها
|
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بحـر
مـن
الفضـل
لكـن
سال
ساحله
|
وبــر
بــر
ولكــن
قــل
اشـباها
|
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فيـض
الفـرات
وماء
النيل
من
يده
|
كقطـرة
مـن
سـحاب
الكـف
ألقاهـا
|
|
عـم
البرايـا
بفيض
الفضل
من
يده
|
فمنـه
نـالت
بغيـث
الغوث
سقياها
|
|
وكـم
وكـم
يـده
بـالغيث
قد
هطلت
|
جـودا
وبـرا
وكـم
فاضـت
عطاياها
|
|
فـي
حسـن
صورته
الوصاف
قد
عجزوا
|
جـل
الـذي
مـن
بهاء
النور
سواها
|
|
تكــاد
تختطــف
الأبصــار
طلعتـه
|
لـولا
الجلال
لأعيـا
النـاس
مرآهـا
|
|
مـا
الشـمس
والبدر
إلا
بعض
طلعته
|
مـن
نـوره
الشـمس
قد
غطت
محياها
|
|
مـن
ذا
يـدانيه
فـي
ذات
وفي
صفة
|
حاشــى
وكلا
فكـل
الحسـن
فـي
طـه
|
|
يـا
سـيد
الرسل
كم
أوليتني
نعما
|
لـولاك
واللـه
مـا
أعطيـت
إياهـا
|
|
وكـم
أجبـت
نـدائي
عنـد
ما
طلبت
|
نفسـي
المعالي
فنالت
منك
علياها
|
|
وكـم
رددت
يـدا
بالسـوء
تقصـدني
|
فطـاب
قلـبي
كمـا
قد
خاب
مرماها
|
|
لأننــي
بضــعة
الزهــراء
فاطمـة
|
مـن
أنجـب
السـادة
الأشراف
نجلاها
|
|
فــانظر
إلـيّ
ولا
تقطـع
مواصـلتي
|
واعطـف
علـى
نفـس
عبد
أنت
مولاها
|
|
وامنع
أناسا
بأيدي
الغدر
تقصدني
|
لـولا
التجائي
لكم
ما
كان
أقساها
|
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لكــن
بجاهــك
رد
اللــه
كيـدهم
|
وأرغــم
الكــل
أقلامـا
وأفواهـا
|
|
حسـبي
النـبي
وحسـبي
حـب
عـترته
|
جــل
المهيمـن
مـن
بـالحب
ولاه
ا
|
|
يـا
خير
من
يرتجى
العاصي
شفاعته
|
وخيــر
مـن
كـان
أويـاا
وأواهـا
|
|
نفسـى
وإن
جنحـت
للغـي
فـي
صـغر
|
لكنهــا
رجعــت
تســتغفر
اللــه
|
|
أرجو
الشفاعة
يوم
الحشر
من
زللى
|
ومـن
ذنـوب
يـثير
الحـزن
ذكراها
|
|
لكـن
لـي
أملا
فـي
العفـو
يطمعني
|
وفـي
الشـفاعة
عظماهـا
وقصـواها
|
|
فقـد
روى
السـادة
الأخيار
أجمعهم
|
روايــة
صــح
معناهــا
ومبناهـا
|
|
مـن
زار
قبر
النبي
المصطفى
وجبت
|
لـه
الشـفاعة
مهمـا
ضـل
أو
تاها
|
|
والحمـد
للـه
قـد
شـاهدت
حجرتـه
|
وزرتــه
زورة
مــا
كـان
أبهاهـا
|
|
فكـم
بكيـت
وكـم
قـدمت
مـن
نـدم
|
والـروح
خاشـعة
والنـور
يغشـاها
|
|
وكــم
بروضــته
للــه
قـد
سـجدت
|
رأسـى
وعيـن
رسـول
اللـه
ترعاها
|
|
مــتى
أعـود
رسـول
اللـه
ثانيـة
|
أشـمّ
عـرف
الشـذا
مـن
طيب
ريّاها
|
|
فالبعـد
عنـك
رسـول
الله
أنهكني
|
ونـار
وجـدي
زنـد
الشـوق
أوراها
|
|
للــه
طيبـة
قـد
طـابت
بسـاكنها
|
واللــه
جــل
بنـور
العـز
جلاهـا
|
|
فـالطيب
والطـب
من
مدلول
لفظتها
|
بــذا
المهيمـن
سـماها
وأسـماها
|
|
تزهـو
بخيـر
الورى
والله
رؤيتها
|
كمـا
زهـت
برسـول
اللـه
سـكناها
|
|
لا
يشـتكى
الضـيم
من
آوته
ساحتها
|
والسـعد
والمجـد
مضمون
لمن
جاها
|
|
حمـى
الإلـه
حماهـا
يـوم
أن
شرفت
|
بالمصـطفى
المجتـبى
والله
زكاها
|
|
ترابهـا
التـبر
مـن
سلع
ومن
أحد
|
ومـن
قبا
ثم
ما
في
القرب
حاذاها
|
|
يشـفى
الجـذام
ويشـفى
كل
ذي
مرض
|
كمـا
شـفى
من
صدور
الناس
مرضاها
|
|
وعينهـا
العذبـة
الزرقاء
من
ضرب
|
مـا
كـان
أطيبهـا
طعمـا
وأحلاهـا
|
|
كأنهـا
وهـي
فـي
الأخـدود
جاريـة
|
من
كوثر
الخلد
باسم
الله
مجراها
|
|
ياسـا
كنـى
طيبـة
المختار
حسبكم
|
قـرب
النـبي
فبـاهوا
كل
من
باهى
|
|
بـالقرب
مـن
قـبره
فزتم
بمأربكم
|
هـذا
هـو
الفخـر
هـذا
سر
معناها
|
|
واهـا
وواهـا
لمـن
كانت
له
سكنا
|
يمسـى
ويصـبح
مغبوطـا
بهـا
واها
|
|
بــالله
لا
تتركوهــا
فهـي
أمكـم
|
والأم
تحنـو
إلـى
إرضـاء
أبناهـا
|
|
فلا
المسـيخ
ولا
الطـاعون
يدخلوها
|
بــل
الملائكــة
الأبـرار
ترعاهـا
|
|
يـاليتني
كنـت
في
دار
الهى
معكم
|
اسـتمطر
الجـود
والإحسـان
مـن
طه
|
|
للــه
مـن
روضـة
بالحسـن
زاهيـة
|
غيـث
النهـبي
رحيم
القلب
أرواها
|
|
فـاقت
جميـع
بلاد
اللـه
فـي
شـرف
|
فمــا
دمشـق
ومـا
مصـر
وأحياهـا
|
|
أســتغفر
اللــه
إلا
مكــة
فلهـا
|
بـالبيت
فضـل
أتاهـا
قبل
مبناها
|
|
مـولاي
أسـألك
التوفيـق
فـي
سـعة
|
للحــج
والســعي
مـرات
بمسـعاها
|
|
والشـرب
مـن
زمزم
أطفى
بها
ظمئي
|
وبالمناســك
أحظـى
بيـن
بطحاهـا
|
|
يـا
خـاتم
الرسـل
هـذا
كل
مطلبي
|
مـع
عـزة
النفـس
دنياها
وأخراها
|
|
وصـحة
الجسـم
مـن
سـميع
ومن
بصر
|
وقـوة
العقـل
إن
العقـل
أرقاهـا
|
|
وامنـح
بنـي
وأهلـى
مع
ذوي
رحمى
|
عـزا
فنفسـي
مناهـا
عـز
قرباهـا
|
|
وانظـر
لصـحبي
وأشياخي
ومن
لهمم
|
فضـل
علـى
النفـس
رباهـا
ورقاها
|
|
صـلى
عليـه
إلـه
العـرش
ما
سجعت
|
فـي
الـدوح
ورق
وما
غنت
بمغناها
|
|
أوقـات
أمـدح
خيـر
الخلـق
ملتجأً
|
خـلّ
الأنـام
وخـذ
خير
الورى
جاها
|