|
إن
كـان
لك
بالصالحين
قدوه
|
جـانب
لقـومٍ
فارقوا
المروه
|
|
واصـبر
وصـابر
ما
بقيت
حياً
|
ولا
تمــار
ذا
غنــىً
وجفـوه
|
|
ولا
تضــق
بالنائبـات
ذرعـاً
|
واصـمت
إذا
لم
تعتزل
بخلوه
|
|
لا
خيـر
فـي
أهل
الزمان
هذا
|
قـد
فارقوا
الإنصاف
والمروه
|
|
لـم
تلـق
فيهـم
حافظاً
لعهدٍ
|
إن
يصـطفيك
اليوم
خان
غدوه
|
|
وإن
يــوالي
ظــاهراً
يجـده
|
مــن
يختـبره
باطنـاً
عـدوه
|
|
أف
لـــدهرٍ
أهلـــه
رعــاعٌ
|
حلـوا
الشـريعه
عروةً
فعروه
|
|
قـد
أذهبوا
الأعمال
في
غرورٍ
|
غايـاتهم
دعـوى
وفـرط
قسوه
|
|
بــخٍ
لمـن
دارى
علـى
حـذارٍ
|
وألــزم
النفــس
علا
ونخـوه
|
|
وقـام
بالمنـدوب
بعـد
فـرضٍ
|
وبــاين
المحظـور
والممـوه
|
|
وصــاحب
الأحـرار
ثـم
أدلـى
|
مـع
خيـار
الـواردين
دلـوه
|
|
أمـا
أنـا
لمـا
رأيـت
دهري
|
قـد
أنـزل
الجـم
حضـيض
هوه
|
|
دعــوتهم
للواجبــات
نصـحاً
|
فلـم
يجيبـوا
للنصـيح
دعوه
|
|
تركتهــم
زهـداً
ولـم
أبـال
|
بـذي
عنـا
أو
ذي
جفا
وسطوه
|
|
لـي
همـةٌ
تعلو
إلى
المعالي
|
لـم
ترض
دون
الزاهرات
نبوه
|
|
يـا
صاحبي
إن
كنت
لي
رفيقاً
|
فمــذهبي
أم
الهـدى
ونحـوه
|
|
هيـا
بنا
نطوي
السوى
ونقفو
|
آثـار
خيـر
العـالمين
قدوه
|
|
لنأخــذ
الـزاد
علـى
كمـالٍ
|
مـن
دار
حاصـلها
عنا
وشهوه
|
|
وبعـد
ذا
نقفـي
ومـن
عليها
|
كـأن
لـم
يكن
شخص
بها
تقوه
|
|
تبــاً
لقـوم
عولـوا
عليهـا
|
أخلبهــم
جـاهٌ
بهـا
وثـروه
|
|
فحولـوا
كرهـاً
مـن
الصياصي
|
فاجـأهم
حتـم
القضـا
بقـوه
|
|
يـا
ربنـا
يـا
ربنـا
أغثنا
|
والطف
بنا
وامنن
بخير
عطوه
|
|
اختـم
لنـا
الأعمار
في
سرورٍ
|
على
الهدى
وادفع
بلاء
وأذوه
|
|
ثــم
صــلاةُ
اللـه
مـع
سـلام
|
علــى
رسـول
خـاتمِ
النبـوه
|
|
مـع
آلـه
والصـحب
مـا
نباتٌ
|
قـد
أعشـبت
أوراقـه
بربـوه
|