|
الشــعر
خيــر
نتــائج
الأفكـار
|
لاســيّما
فــي
المـدح
والتـذكار
|
|
إن
قلـت
هل
حلو
فحلو
الطعام
أو
|
مــر
فمــرّ
شــيب
لهــب
النـار
|
|
شـبب
بـه
إن
كنـت
من
أهل
الهوى
|
إن
الهـــوى
لمرونــق
الأشــعار
|
|
أو
قلـت
هـل
خافي
الغرام
وشوقه
|
أو
ظــاهر
البلــوى
فكالاحجــار
|
|
أو
كالزنــاد
حديـدة
إن
رمتهـا
|
وإذا
قــدحت
فكالشـهاب
الـواري
|
|
كالثلــج
بـردا
والـزلال
عـذابه
|
عـــذب
ويرمــي
لفحــه
بشــرار
|
|
لاهــــو
مختـــصّ
بـــوقت
لا
ولا
|
بمجـــــزإ
الأدواء
والأضــــرار
|
|
مـن
لـم
يمـت
فيـه
فليـس
بعاشق
|
والعشــق
فينــا
شـيمة
الأحـرار
|
|
هـــل
نــافع
آه
والصــعداء
أو
|
إهراقنـــا
للمــدمع
المــدرار
|
|
من
أين
ذاك
لمن
يرى
النسمات
لل
|
أســـحار
والنغمـــات
للاطيــار
|
|
ويـرى
التـذلل
والتـدلل
والتمل
|
مــل
والتعلّــل
ســاعة
الأسـحار
|
|
وتمايــل
الأغضـان
فـي
كثبانهـا
|
وتــورّد
الوجنــات
فـي
الأقمـار
|
|
وتفلـج
الـبرق
الشتيت
العذب
من
|
ثغـــر
مليـــح
بــارد
معطــار
|
|
ولياليــا
كســت
الصـباح
دجنّـة
|
وكســا
الصــباح
ظلامهـا
بنهـار
|
|
وتناشــد
الأشـعار
مـن
أريابهـا
|
وتدنـدن
النغمـات
فـي
المزمـار
|
|
قسـما
بـبيض
الـبيض
وهـي
فواتر
|
وخـــدود
ورد
صـــوغها
بنضــار
|
|
المصــــمتات
دمالجـــا
وخلاخلا
|
ولكـــل
قلـــب
مفصــح
وســوار
|
|
الســـالبات
رمــاحهنّ
عقولنــا
|
فحـذار
مـن
تلـك
الرمـاح
حـذار
|
|
لحـديث
كـل
الغانيـات
ومـا
جرى
|
مــن
فتكهــنّ
باســهم
الأوتــار
|
|
هو
الصحيح
سوى
العيون
أو
الخضو
|
ر
فــــإنه
لمضـــعف
الأخبـــار
|
|
لمــا
رأى
شــعبان
الـزوار
مـن
|
أنــي
أنــا
رجـب
مـدى
الأطـوار
|
|
قـالوا
بـه
عيـن
فقلـت
نعم
وبي
|
ثغــر
حمتـه
الـبيض
وهـي
غـوار
|
|
قـالوا
نشـوان
فقلـت
لهـم
أجـل
|
مـن
سـكر
خمـر
رضـابها
المعطار
|
|
أو
ما
جعلت
العطف
لي
بذل
الجفا
|
توكيــده
بنعــوت
وصــل
الـدار
|
|
أمرضـتني
وأنـا
الـذي
لا
بـد
من
|
صــلة
وعائدهــا
عــن
الــزوار
|
|
وأبيـت
عـن
هـذين
هـل
أفتي
بذا
|
نحـو
النحـاة
ومـن
لهـم
من
قار
|
|
جـولت
فكـري
في
العجائب
لم
أجد
|
كعجيبــة
فــي
ســائر
الأقطــار
|
|
ليـل
علـى
صـبح
علـى
ريـم
علـى
|
غصــن
علــى
حقــف
مـن
الأوعـار
|
|
فــي
صــبحه
ســينات
درختمهــا
|
ميـــم
علــى
مســك
ذكــي
واري
|
|
وبغصـــنه
رمانتـــان
عليهمــا
|
حيــات
فـرع
ضـل
فيهـا
السـاري
|
|
عجبـا
ونـون
فـوق
ألحـاظ
المها
|
ذا
بالقفـــار
وهـــذه
ببحــار
|
|
بـل
إنمـا
العجـب
العجاب
تشوّقا
|
ألـف
لـذا
جمعـت
بأيـدي
الباري
|
|
ألــف
ولا
للوصــل
بــل
قطعيــة
|
قطعــت
مكــان
توصــّلي
ومـزاري
|
|
لا
تعجبــوا
ممــا
ذكــرت
فهـذه
|
أعجوبــــة
كتفتـــق
الأزهـــار
|
|
نـور
يـداه
السـحب
تسـكب
عسجدا
|
جمعـــت
لكــل
فضــيلة
وفخــار
|
|
يــوم
النــدى
بحـر
خضـمّ
زاخـر
|
إذ
في
الوغى
ليث
العوين
الضاري
|
|
طـود
الوغى
جمّ
الجدا
فلك
العلى
|
رحـب
الفضـا
حـامي
حمـى
الجـار
|
|
وهـو
ابـن
عبـاس
لدى
القرآن
لا
|
كـن
فـي
الحـديث
بخـاري
الأخبار
|
|
وهـو
الخليل
لدى
العروض
وسيبوي
|
ه
النحـــاة
فكيــف
بالأنبــاري
|
|
أو
مـالكيّ
الفقـه
بـل
هـو
جامع
|
كــل
المــذاهب
قــل
عقـد
إزار
|
|
بــل
كــلّ
فــنّ
منـه
عـن
غيـره
|
لكــن
تســربل
ســنّة
المختــار
|
|
أمـا
الحقيقـة
فهـو
طلسـم
سرها
|
لكنـــه
كنـــز
مـــن
الســرار
|
|
فبعــبرة
وعبــارة
يقضـي
الظلا
|
م
وعــبرة
خــال
مــن
الأغبــار
|
|
وتــــورّع
وتــــبرّع
وتولّــــع
|
وتخضــــّع
وتضــــرّع
للبـــاري
|
|
مـرآة
أهـل
اللـه
ضـوء
شـعاعهم
|
روح
الزمــان
مشــارق
الأنــوار
|
|
ذو
نعمــة
ذو
نعمــة
ذو
رأفــة
|
ذو
رتبــة
فــي
هيبــة
ووقــار
|
|
إن
قيـل
إن
النهـر
يوجد
فيه
ما
|
لافــي
البحــار
فـأعظم
الأنهـار
|
|
أو
كـان
من
جهة
العظامة
والندى
|
فهــو
البحــار
فكيـف
بالأمطـار
|
|
وهـو
الربيـع
الفضل
من
يحيا
به
|
ميـــت
القلــوب
وميــت
الأوزار
|
|
للفضــل
أقفـال
وهـو
مفاتـح
ال
|
أقفــال
معطـى
الفضـل
بالإكثـار
|
|
يرتــاح
للعـافي
إذا
مـا
جـاءه
|
مثــل
ارتيــاح
فــرزدق
لنـوار
|
|
هــو
خيــر
الأعلام
والأحبـار
بـل
|
علـــم
علـــى
الأعلام
والأحبــار
|
|
أفــراد
كـل
فضـيلة
هـو
فردهـم
|
لكنـــه
هـــو
خيـــر
الأخيــار
|
|
يوصـي
بحفـظ
الجـار
وهـو
كفيله
|
واللــه
وصــانا
بحفــظ
الجـار
|
|
بيمينـه
فـي
الجـود
ألـف
حـاتم
|
وكــــذاك
ألا
جعفـــر
بيســـار
|
|
ويـــذهنه
إيــاس
ألفــى
مــرة
|
والشــافعي
فــي
جـودة
الأفكـار
|
|
مـا
ظنكـم
بمـن
اصطفاه
الله
من
|
أهــل
التقــرّب
ســادة
الأعصـار
|
|
فكفــاه
تفضــّلا
جميــع
أمــوره
|
وجــرت
ببغيتــه
يــد
الأقــدار
|
|
أدنـى
مراتبـه
العلـو
عن
الورى
|
وإدامـــة
التــدريس
والأذكــار
|
|
يـا
قائسـا
مـاء
العيـون
بغيره
|
مــن
ســائر
الغيــاب
والحضـار
|
|
قسـت
السـها
بالشـمس
والنيـران
|
بالمــاء
والظلمــات
بــالأنوار
|
|
وكـذاك
أنـت
أيـا
حسود
فقصر
أو
|
بــالغ
وضــاعف
صــيغ
الإنكــار
|
|
أو
ضـائر
نبـح
الكلاب
الشـمس
أو
|
يــؤذى
النجــوم
تحـرك
الأشـجار
|
|
وكـذاك
يا
من
رمت
تحصى
خصال
ال
|
قطــب
فــي
الإظهــار
والإضــمار
|
|
أجمـل
وفصـل
واسـتعن
واشرح
وزد
|
وامــدح
وبـالغ
أنـت
بالمختـار
|
|
لـم
تبلـغ
المعشـار
مـن
أمداحه
|
كلا
ولا
جـــزءا
مـــن
الأعثـــار
|
|
تتســابق
الأمــداح
نحـو
جنـابه
|
وقـــرائح
الشــعراء
بالأشــعار
|
|
هــذا
وليــس
بمقـدح
مـا
قلتـه
|
فــي
فضـل
حـبر
شـامخ
المقـدار
|
|
فجلالــة
الصـديق
والخلفـاء
لـم
|
تنقـــص
فضــيلة
الال
والأنصــار
|
|
ولقــد
علمـت
بـأن
فضـلك
ظـاهر
|
شمســـا
ولا
تحتـــاج
للإظهـــار
|
|
ببوكقـائل
إنّ
السـماء
من
فوقنا
|
والنــار
تحـرق
والضـيا
بنهـار
|
|
وعلمــت
أن
مقـالتي
تحصـيل
مـا
|
هـــو
حاصــل
وإرادة
التكــرار
|
|
لكــن
قــول
الحـق
ليـس
بضـائر
|
تكــراره
عــن
كــل
مـا
اخبـار
|
|
أو
ضــائر
تكرارنــا
للــذكرأو
|
إدماننـــا
الصــلوات
للغفــار
|
|
يـا
قطـب
يا
خنذيذ
يا
صمصام
يا
|
بحــر
البحــور
وقــرّة
الأبصـار
|
|
يـا
زينـة
الـدنيا
وبهجة
أهلها
|
يـا
خيـر
أهـل
البـدو
والمصـار
|
|
يـا
عـدتي
يـا
عمـدتي
يا
نزهتي
|
يــا
نصـرتي
يـا
زينـتي
ومنـار
|
|
لازلــت
تـاج
علـى
وبـدر
مهابـة
|
وطــراز
مكرمــة
وســيف
وقــار
|
|
ورجـوت
مـن
يـدعى
مجيبا
أن
يصي
|
ر
عمركــم
مــن
آخــر
الأعمــار
|
|
يـا
وارث
المختـار
دمـت
معافيا
|
وصــلاة
مولانــا
علــى
المختـار
|
|
مــا
قــال
تـذكرة
غريـم
منشـد
|
الشــعر
خيــر
نتــائج
الأفكـار
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