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نــداؤك
يــا
فـؤادُ
كفـى
نـداء
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أمــا
تنفــك
تســقيني
الشـقاء
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أنــا
ظمــآن
لــم
يلمـع
سـراب
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علــى
الصــحراء
إلا
خلــتُ
مـاءَ
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وأنــت
فــراش
ليــل
كــلّ
نـور
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تبعــت
وكــلَّ
بــرق
قــد
أضـاءَ
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فـؤادي
قـل
لهـا
لمـا
افترقنـا
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علــى
شـجن
ومـا
نرجـو
اللقـاء
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حببتــكِ
مـا
شـدوت
لـديك
شـعرا
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ولكنــي
اعتصــرت
لــكِ
الـدماءِ
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إذا
أنـا
فـي
هـواك
أضـعت
روحي
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فلســت
أضــيع
فيـك
دمـي
هبـاء
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غرامــك
كــان
محــراب
المصـلى
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كــأني
قــد
بلغـتُ
بـك
السـماء
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خلعـــت
الآدميـــة
فيــه
عنــي
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ولكــن
مــا
خلعــت
بـه
الإبـاء
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فلـــم
أركــع
بســاحته
ريــاء
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ولا
كالعبـــــد
ذلاً
وانحنــــاء
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ولكنـــي
حببتـــك
حـــب
حـــرٌ
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يمــوت
مــتى
أراد
وكيــف
شـاء
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وحـــبيب
كـــان
دنيــا
أملــي
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حبــه
المحـراب
والكعبـة
بيتـه
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مـن
مشـى
يومـاً
علـى
الـورد
له
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فطريقــي
كــان
شــوكا
ومشـيته
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مــن
ســقى
يومـاً
بمـاء
ظـامئاً
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فأنــا
مـن
قـدح
العمـر
سـقيته
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خفـــق
القلـــب
لــه
مختلجــاً
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خفقـة
المصـباح
إذ
ينضـب
زيتـه
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قـــد
ســـلاني
فتنكـــرت
لـــه
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وطـــوى
صــفحة
حــبي
فطــويته
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أقبلـتُ
للنيـل
المبـارك
شـاكياً
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زمنــي
وقـد
كـثرت
علـيَّ
همـومي
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ومســحت
كفــي
والجـبين
بمـائه
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علّــي
أهــدئ
ثــورة
المحمــومِ
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وجلســت
أنــثر
جعبــة
معمـورة
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بالـــذكرياتِ
جديــدها
وقــديم
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لهفــي
لحــب
مــات
غيـر
مـدنس
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وشــباب
عمــر
مــرَّ
غيـر
ذميـم
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خـان
الأحبـة
والرفـاق
ولـم
أخن
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عهــدي
لهـم
وصـفحتُ
صـفح
كريـم
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أيخيفني
العشب
الضعيف
أنا
الذي
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أســلمت
للشــوك
الممـض
أديمـي
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وإذا
ونــى
قلــبي
يـدق
مكـانه
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شــممي
وتخفــق
كبريـاء
همـومي
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إنــي
لأحمــل
جعبــتي
متحــديا
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زمنــي
بهــا
وحواسـدي
وخصـومي
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أحنـي
لعرش
الله
رأساً
ما
انحنى
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بالــذل
يومـاً
فـي
رحـاب
عظيـم
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