|
يـــا
فــؤادي
رحــم
اللــه
الهــوى
|
كـــان
صـــرحاً
مـــن
خيــال
فهــوى
|
|
اســــقني
واشـــرب
علـــى
أطلالـــه
|
واروِ
عنــــي
طالمـــا
الـــدمع
روى
|
|
كيـــف
ذاك
الحـــب
أمســـى
خـــبراً
|
وحـــديثاً
مـــن
أحـــاديث
الجـــوى
|
|
وبســــاطا
مــــن
نــــدامى
حلـــم
|
هــم
تــواروا
أبــداً
وهــو
انطــوى
|
|
يـــا
رياحــا
ليــس
يهــدا
عصــفها
|
نضـــب
الزيـــت
ومصـــباحي
انطفــا
|
|
وأنـــا
أقتـــات
مـــن
وهــم
عفــا
|
وأفـــي
العمـــر
لنــاسٍ
مــا
وفــى
|
|
كــــم
تقلبــــت
علــــى
خنجــــره
|
لا
الهـــوى
مـــال
ولا
الجفــن
عفــا
|
|
وإذا
القلـــــب
علــــى
غفرانــــه
|
كلمـــا
غـــار
بـــه
النصــل
عفــا
|
|
يــا
غرامــا
كــان
منــي
فــي
دمـي
|
قــــدراً
كـــالموت
أوفـــى
طعمـــه
|
|
مـــا
قضـــينا
ســـاعة
فــي
عرســه
|
وقضــــينا
العمـــر
فـــي
مـــأتمه
|
|
مـــا
انــتزاعي
دمعــة
مــن
عينــه
|
واغتصــــابي
بســــمة
مـــن
فمـــه
|
|
ليـــت
شـــعري
أيــن
منــه
مهربــي
|
أيـــن
يمضـــي
هـــارب
مـــن
دمــه
|
|
لســــت
أنســـاك
وقـــد
أغريتنـــي
|
بفــــمٍ
عـــذبِ
المنـــاداة
رقيـــق
|
|
ويـــــد
تمتــــد
نحــــوي
كيــــدٍ
|
مـــن
خلال
المـــوج
مُـــدّت
لغريـــق
|
|
آه
يـــــا
قِبلــــة
أقــــدامي
إذا
|
شـــكت
الأقـــدام
أشـــواك
الطريــق
|
|
وبريقــــاً
يظمـــأ
الســـاري
لـــه
|
أيــن
فــي
عينيــك
ذيــاك
الــبريق
|
|
لســــت
أنســـاك
وقـــد
أغريتنـــي
|
بالـــذرى
الشــم
فــأدمنت
الطمــوح
|
|
أنــــت
روح
فـــي
ســـمائي
وأنـــا
|
لــــك
أعلـــو
فكـــأني
محـــض
روح
|
|
يـــا
لهــا
مــن
قمــم
كنّــا
بهــا
|
نتلاقــــــى
وبســـــرّينا
نبـــــوح
|
|
نستشـــف
الغيـــب
مـــن
أبراجهـــا
|
ونـــرى
النـــاس
ظلالاً
فــي
الســفوح
|
|
أنــتِ
حســن
فــي
ضــحاه
لــم
يَــزَل
|
وأنــــا
عنـــديَ
أحـــزان
الطفَـــل
|
|
وبقايـــا
الظـــل
مــن
ركــب
رحــل
|
وخيـــوط
النـــور
مــن
نجــم
أفــل
|
|
ألمــــح
الـــدنيا
بعينـــي
ســـئمٍ
|
وأرى
حـــــولي
أشــــباح
الملــــل
|
|
راقصــــات
فـــوق
أشـــلاء
الهـــوى
|
معــــولات
فــــوق
أجـــداث
الأمـــل
|
|
ذهــــب
العمـــر
هبـــاء
فـــاذهبي
|
لــــم
يكــــن
وعــــدك
إلا
شـــبحا
|
|
صـــفحة
قـــد
ذهـــب
الــدهر
بهــا
|
أثبــــت
الحــــب
عليهـــا
ومحـــا
|
|
انظــــري
ضـــِحكي
ورقصـــي
فرحـــا
|
وأنــــا
أحمــــل
قلبــــاً
ذبحـــا
|
|
ويرانـــي
النـــاس
روحـــاً
طــائراً
|
والجَـــوى
يطحننـــي
طحـــن
الرحــى
|
|
كنــــت
تمثــــال
خيـــالي
فهـــوى
|
المقـــــــادير
أرادت
لا
يـــــــدي
|
|
ويحهـــا
لـــم
تــدر
مــاذا
حطمــت
|
حطمــــت
تــــاجي
وهـــدت
معبـــدي
|
|
يـــا
حيـــاة
اليـــائس
المنفـــرد
|
يـــا
يبابــاً
مــا
بــه
مــن
أحــد
|
|
يـــا
قفـــاراً
لافحـــاتٍ
مــا
بهــا
|
مـــن
نجـــي
يـــا
ســـكون
الأبـــد
|
|
أيـــن
مـــن
عينـــي
حــبيب
ســاحر
|
فيــــــه
نبـــــل
وجلال
وحيـــــاء
|
|
واثــــق
الخطـــوة
يمشـــي
ملكـــاً
|
ظـــالم
الحســـن
شـــهي
الكبريــاء
|
|
عبـــق
الســـحر
كأنفـــاس
الربـــى
|
ســـاهم
الطـــرف
كـــأحلام
المســاء
|
|
مشــــرق
الطلعــــة
فـــي
منطقـــه
|
لغـــة
النـــور
وتعـــبير
الســماء
|
|
أيـــن
منـــي
مجلـــس
أنـــت
بـــه
|
فتنَــــة
تمــــت
ســــناء
وســــنى
|
|
وأنــــــا
حــــــب
وقلــــــب
ودم
|
وفــــراش
حــــائر
منــــك
دنــــا
|
|
ومــــن
الشــــوق
رســـول
بيننـــا
|
ونــــديم
قــــدم
الكــــأس
لنـــا
|
|
وســـــقانا
فانتفضـــــنا
لحظــــة
|
لغبـــــــارٍ
آدمــــــي
مســــــنا
|
|
قــد
عرفنــا
صــولة
الجســم
الــتي
|
تحكـــم
الحــي
وتطغــى
فــي
دمــاه
|
|
وســــمعنا
صــــرخة
فـــي
رعـــدها
|
ســــــوط
جلاد
وتعـــــذيب
إلـــــه
|
|
أمرتنـــــا
فعصـــــينا
أمرهـــــا
|
وأبينــا
الــذل
أن
يغشــى
الجبــاه
|
|
حكــم
الطــاغي
فكنــا
فــي
العصـاه
|
وطردنـــا
خلـــف
أســـوار
الحيــاه
|
|
يـــا
لمنفييــن
ضــلا
فــي
الوعــور
|
دميـــا
بالشـــوك
فيهــا
والصــخور
|
|
كلمـــا
تقســـو
الليـــالي
عرفـــا
|
روعــة
الآلام
فــي
المنفــى
الطهــور
|
|
طــردا
مــن
ذلــك
الحلــم
الكــبير
|
للحظــوظ
الســود
والليــل
الضــرير
|
|
يقبســـان
النـــور
مـــن
روحيهمــا
|
كلمـــا
قــد
ضــنت
الــدنيا
بنــور
|
|
أنـــت
قـــد
صـــيرت
أمــري
عجبــا
|
كــــثرت
حـــوليَ
أطيـــار
الربـــى
|
|
فــــإذا
قلــــت
لقلــــبي
ســـاعة
|
قـــم
نغـــرد
لســـوى
ليلــي
أبــى
|
|
حجبــــت
تـــأبى
لعينـــي
مأربـــا
|
غيــــــر
عينيـــــك
ولا
مطلبـــــا
|
|
أنــــتِ
مــــن
أســـدلها
لا
تـــدعي
|
أننــــي
أســـدلت
هـــذي
الحجبـــا
|
|
ولكــم
صــاح
بــي
اليــأس
انتزعهـا
|
فيـــرد
القـــدر
الســـاخر
دعهـــا
|
|
يــا
لهــا
مــن
خطــة
عميــاء
لــو
|
أننـــي
أبصــر
شــيئاًَ
لــم
أطعهــا
|
|
ولـــــيَ
الويـــــل
إذا
لبيتهــــا
|
ولـــي
الويـــل
إذا
لـــم
أتبعهــا
|
|
قــد
حنــت
رأســي
ولــو
كـل
القـوى
|
تشـــتري
عــزة
نفســي
لــم
أبعهــا
|
|
يـــا
حبيبـــا
زرت
يومـــا
أيكـــه
|
طــــائر
الشــــوق
أغنـــي
ألمـــي
|
|
لــــك
ابطـــاء
الـــدلال
المنعـــم
|
وتجنـــــي
القـــــادر
المحتكــــم
|
|
وحنينــــي
لــــك
يكـــوي
أعظمـــي
|
والثــــواني
جمـــرات
فـــي
دمـــي
|
|
وأنــــا
مرتقــــب
فــــي
موضـــعي
|
مرهــــف
الســـمع
لوقـــع
القـــدم
|
|
قــــدم
تخطــــو
وقلــــبي
مشـــبه
|
موجــــة
تخطــــو
إلـــى
شـــاطئها
|
|
أيهــا
الظــالم
بــالله
إلــى
كــم
|
أســــفح
الـــدمع
علـــى
موطئهـــا
|
|
رحمـــة
أنـــت
فهـــل
مـــن
رحمــة
|
لغريـــــب
الــــروح
أو
ظامئهــــا
|
|
يــا
شــفاء
الــروح
روحــي
تشــتكي
|
ظلــــم
آســــيها
إلـــى
بارئهـــا
|
|
أعطنــــي
حريــــتي
أطلـــق
يـــديّ
|
إننــي
أعطيــت
مــا
اســتبقيت
شــيّ
|
|
آه
مــــن
قيـــدك
أدمـــى
معصـــمي
|
لـــمَ
أبقيـــه
ومـــا
أبقــى
علــيّ
|
|
مــا
احتفــاظي
بعهــود
لــم
تصـنها
|
وإلام
الأســـــر
والــــدنيا
لــــديّ
|
|
هــا
أنــا
جفـت
دمـوعي
فـاعف
عنهـا
|
إنهـــا
قبلـــك
لـــم
تبــذل
لحــي
|
|
وهـــب
الطـــائر
عــن
عشــك
طــارا
|
جفـــت
الغـــدران
والثلــج
أغــارا
|
|
هــــذه
الــــدنيا
قلـــوب
جَمَـــدت
|
خبـــت
الشـــعلة
والجمـــر
تــوارى
|
|
وإذا
مــــا
قبـــس
القلـــب
غـــدا
|
مـــن
رمــاد
لا
تســله
كيــف
صــارا
|
|
لا
تســـل
واذكـــر
عــذاب
المصــطلي
|
وهـــو
يـــذكيه
فلا
يقبـــس
نـــارا
|
|
لا
رعــــى
اللـــه
مســـاءً
قاســـياً
|
قـــد
أرانـــي
كـــل
أحلامــي
ســدى
|
|
وأرانــــي
قلــــب
مــــن
أعبـــده
|
ســاخراً
مــن
مــدمعي
ســخر
العــدا
|
|
ليــــت
شـــعري
أي
أحـــداث
جـــرت
|
أنزلــــت
روحـــك
ســـجناً
موصـــدا
|
|
صــــدئت
روحــــك
فــــي
غيهبهـــا
|
وكــــذا
الأرواح
يعلوهـــا
الصـــدا
|
|
قـــد
رأيــت
الكــون
قــبراً
ضــيقا
|
خيّـــم
اليـــأس
عليـــه
والســـكوت
|
|
ورأت
عينــــي
أكــــاذيب
الهــــوى
|
واهيـــــات
كخيــــوط
العنكبــــوت
|
|
كنـــت
ترثـــي
لــي
وتــدري
ألمــي
|
لـــو
رثــى
للــدمع
تمثــال
صــموت
|
|
عنــــد
أقـــدامك
دنيـــا
تنتهـــي
|
وعلــــى
بابــــك
آمــــال
تمـــوت
|
|
كنـــــت
تـــــدعونيَ
طفلاً
كلمـــــا
|
ثــــار
حــــبي
وتنــــدت
مقلــــي
|
|
ولـــك
الحـــق
لقــد
عــاش
الهــوى
|
فــــيّ
طفلاً
ونمــــا
لــــم
يعقـــل
|
|
ورأى
الطعنـــــــة
إذ
صــــــوبتها
|
فمشــــــت
مجنونـــــة
للمقتـــــل
|
|
رمــــت
الطفــــل
فـــأدمت
قلبـــه
|
وأصـــــَابت
كبريـــــاء
الرجـــــل
|
|
قلــت
للنفــس
وقــد
جزنـا
الوصـيدا
|
عجلـــي
لا
ينفـــع
الحـــزم
وئيــدا
|
|
ودعــــي
الهيكــــل
شـــبت
نـــاره
|
تأكـــل
الركـــع
فيـــه
والســجودا
|
|
يتمنّــــى
لــــي
وفــــائي
عـــودة
|
والهــوى
المجــروح
يـأبى
أن
نعـودا
|
|
لـــي
نحـــو
اللهــب
الــذاكي
بــه
|
لفتـــة
العـــود
إذا
صــار
وقــودا
|
|
لســـــــت
أنســـــــى
ابـــــــداً
|
ســـــــاعة
فـــــــي
العمـــــــر
|
|
تحــــــــت
ريـــــــح
صـــــــفقت
|
لارتقـــــــــــاص
المطـــــــــــر
|
|
نــــــــــــوّحت
للــــــــــــذكر
|
وشــــــــــــكت
للقمــــــــــــر
|
|
وإذا
مـــــــــــا
طربـــــــــــت
|
عربـــــــدت
فـــــــي
الشــــــجر
|
|
هـاك
مـا
قـد
صبت
الريح
بأذن
الشاعر
|
|
وهي
تغري
القلب
إغراء
النصيح
الفاجر
|
|
أيهــــــا
الشــــــاعر
تغفــــــو
|
تــــــذكر
العهــــــد
وتصــــــحو
|
|
وإذا
مــــــا
التــــــام
جـــــرح
|
جـــــــد
بالتــــــذكار
جــــــرح
|
|
فتعلـــــــم
كيـــــــف
تنســــــى
|
وتعلـــــــم
كيـــــــف
تمحــــــو
|
|
أو
كــــــل
الحــــــب
فــــــي
رأ
|
يـــــــك
غفـــــــرانٌ
وصـــــــفح
|
|
هـاك
فـانظر
عـدد
الرمل
قلوبا
ونساء
|
|
فتخيـر
مـا
تشـاء
ذهـب
العمـر
هبـاء
|
|
ضـل
في
الأرض
الذي
ينشد
أبناء
السماء
|
|
أي
روحانيــة
تعصــر
مـن
طيـن
ومـاء
|
|
أيهــــا
الريــــح
أجـــل
لكنمـــا
|
هــــي
حــــبي
وتعلاتــــي
ويأســـي
|
|
هـــي
فـــي
الغيــب
لقلــبي
خلقــت
|
أشــرقت
لــي
قبــل
أن
تشــرق
شمسـي
|
|
وعلـــى
موعـــدها
أطبقـــت
عينـــي
|
وعلـــى
تـــذكارها
وســـدت
رأســـي
|
|
جنــت
الريـح
ونـادته
شـياطين
الظلام
|
|
أختاما
كيف
يحلو
لك
في
البدء
الختام
|
|
يـا
جريحـا
أسـلم
الجـرح
حبيبا
نكأه
|
|
هـو
لا
يبكـي
إذا
النـاعي
بهـذا
نبأه
|
|
أيهـا
الجبـار
هل
تصرع
من
أجل
امرأة
|
|
يــا
لهــا
مــن
صــيحة
مــا
بعثــت
|
عنــــده
غيــــر
أليــــم
الـــذكر
|
|
أرقــــت
فـــي
جنبـــه
فاســـتيقظت
|
كبقايــــــا
خنجــــــر
منكســـــر
|
|
لمــــع
النهــــر
ونــــاداه
لـــه
|
فمضــــــى
منحـــــدراً
للنهـــــر
|
|
ناضـــب
الـــزاد
ومـــا
مــن
ســفر
|
دون
زادٍ
غيـــــر
هــــذا
الســــفر
|
|
يـــا
حبيـــبي
كـــل
شــيء
بقضــاء
|
مـــا
بأيـــدينا
خلقنـــا
تعســـاء
|
|
ربمـــــا
تجمعنـــــا
أقـــــدارنا
|
ذات
يــوم
بعــد
مــا
عــز
اللقــاء
|
|
فـــــإذا
أنكـــــر
خــــل
خلــــه
|
وتلاقينـــــا
لقـــــاء
الغربــــاء
|
|
ومضـــــى
كــــل
إلــــى
غــــايته
|
لا
تقــل
شــيئاً
وقـل
لـي
الحـظ
شـاء
|
|
يــا
مغنــي
الخلــد
ضــيعت
العمــر
|
فــــي
أناشــــيد
تغنّـــى
للبشـــر
|
|
ليـــس
فــي
الأحيــاء
مــن
يســمعنا
|
مـــا
لنـــا
لســنا
نغنــي
للحجــر
|
|
للجمـــارات
الـــتي
ليســـت
تعـــي
|
والرميمــات
البــوالي
فــي
الحفــر
|
|
غنّهــــا
ســـوف
تراهـــا
انتفضـــت
|
ترحـــم
الشـــادي
وتبكـــي
للــوتر
|
|
يــــا
نــــداء
كلمــــا
أرســـلته
|
رد
مقهــــوراً
وبــــالحظ
ارتطــــم
|
|
وهتافـــاً
مـــن
أغاريـــد
المنـــى
|
عـــاد
لـــي
وهـــو
نـــواحٌ
ونــدم
|
|
رب
تمثــــــال
جمـــــالٍ
وســـــنا
|
لاح
لــــي
والعيـــش
شـــجو
وظلـــم
|
|
ارتمـــى
اللحـــن
عليـــه
جاثيـــاً
|
ليـــس
يـــدري
أنـــه
حســـن
أصــم
|
|
هــــدأ
الليــــل
ولا
قلــــب
لـــه
|
أيهـــا
الســـاهر
يـــدري
حيرتـــك
|
|
أيهـــا
الشـــاعر
خـــذ
قيثارتـــك
|
غــــن
أشـــجانك
واســـكب
دمعتـــك
|
|
رب
لحــــن
رقــــص
النجــــم
لـــه
|
وغـــزا
الســـحب
وبـــالنجم
فتـــك
|
|
غنّـــه
حـــتى
نـــرى
ســتر
الــدجى
|
طلــــع
الفجـــر
عليـــه
فانهتـــك
|
|
وإذا
مــــــا
زهـــــرات
ذعـــــرت
|
ورأيـــت
الرعـــب
يغشـــى
قلبهـــا
|
|
فـــــترفق
واتئد
واعــــزف
لهــــا
|
مــن
رقيــق
اللحــن
وامســح
رعبهـا
|
|
ربمـــا
نـــامت
علــى
مهــد
الأســى
|
وبكــــــت
مستصـــــرخات
ربهـــــا
|
|
أيهـــا
الشـــاعر
كــم
مــن
زهــرة
|
عـــوقبت
لــم
تــدر
يومــاً
ذنبهــا
|