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أصـبحت
مـن
يأسي
لو
ان
الردى
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يهتــف
بــي
صــحت
بــه
هيـا
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هيـا
فمـا
فـي
الأرض
لـي
مطمح
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ولا
أرى
لـــي
بعـــدها
شــيا
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مـاذا
بقـائي
هـا
هنـا
بعدما
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نفضــت
منــه
اليــوم
كفيــا
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أهـرب
مـن
يأسـي
لكأسـي
التي
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أدفــن
فيهــا
أملــي
الحيّـا
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يـا
أيهـا
الهـارب
مـن
جنـتي
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تعـــال
أو
هـــات
جناحيـــا
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نبكـي
شـبابينا
ونبكـي
المنى
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وترتمــــي
بيـــن
ذراعيـــا
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إنـي
علـى
يأسـي
وكأسـي
كأبي
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وعلــى
سـرابي
عـاكف
وشـرابي
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ولقـد
فرغتُ
من
التعلل
بالمنى
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إلا
وميضـاً
فـي
الرماد
الخابي
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رمقــاً
يعللنــي
بأنـك
عـائد
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يومـاً
لقلـبي
قبـل
يوم
ذهابي
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حـتى
إذا
الأقدار
شئن
وعدتَ
لي
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راجعـتُ
نفسـي
واتهمـت
صـوابي
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أأرى
شـروقك
فـي
أفول
مغاربي
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وأشـم
عطـرك
فـي
ذبـول
شبابي
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هات
اسقني
واشرب
على
سر
الأسى
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وعلــى
بقايـا
مهجـة
وشـجاها
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مهلاً
نـديمي
كيـف
ينسـى
حبهـا
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مـن
ينشـد
السلوى
على
ذكراها
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ما
زلت
تسقيني
لتنسيني
الهوى
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حـتى
نسـيت
فمـا
ذكـرت
سواها
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كـانت
لنـا
كـأس
وكـانت
قصـة
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هـذا
الحبـاب
أعادهـا
ورواها
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الآن
غشـاها
الضـباب
وهـا
أنا
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خلـف
المآسـي
والـدموع
أراها
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غـال
الزمـان
ضبابها
وحبابها
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وتبخـــرت
أحلامهــا
ورؤاهــا
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لا
تبكهـا
ذهبـت
ومـات
هواهـا
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فـي
القلـب
متسـع
غدا
لسواها
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أحببتهـا
وطـويت
صـفحتها
وكم
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قـرأ
اللـبيب
صـحيفة
وطواهـا
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تلـك
الوليـدة
لم
تطل
بشراها
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لمّـا
تكـد
تطـأ
الثرى
قدماها
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زف
الصباح
إلى
الرمال
نداءها
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وسـرى
النسـيم
عشـية
فنعاهـا
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