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بشــراك
هــذا
منـار
الحـي
ترفمـه
|
وهـــذه
دور
مــن
تهــوى
وتعشــقه
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وهــذه
الروضــة
الغنــاء
مهديــة
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مــع
النسـيم
شـذا
الأحبـاب
تنشـقه
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وتلـــك
أعلامهــم
للعيــن
باديــة
|
تزهـو
بهـا
بهجـة
النـادي
ورونقـه
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فحــي
ســكان
ذاك
الحــي
إن
شـهدت
|
عينـاك
سـرب
الغـواني
حيـن
يطرقـه
|
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واخلـع
بـه
النعل
والثم
تربة
عبقت
|
بالمســك
لمـا
مشـى
فيهـا
مقرطقـه
|
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جـد
فـي
الربوع
بمرجان
الدموع
ولا
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تبخــل
فمحمــر
دمـع
الحـب
أصـدقه
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واقرع
على
البخت
باب
الحان
عن
أدب
|
لعــل
يفتــح
عنــد
القـرع
مغلقـه
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فَثَــمَّ
تلـق
الحسـان
الـبيض
عاكفـة
|
فــي
منظــر
ورده
يــذكو
وزنبقــه
|
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علــى
تنــاول
شــيء
مــن
خصائصـه
|
سـلب
النهـى
إن
سـرى
فيهـا
معتقـه
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تجلــو
أشــعته
غيــم
الهمـوم
إذا
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تصـــاعدت
ويــد
الســاقي
تروقــه
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يــدعو
إلــى
كــرم
الأخلاق
ســاكبه
|
بســائل
مــن
دم
العنقــود
يهرقـه
|
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بـدر
يـدور
علـى
تلـك
البـدور
بما
|
يكـاد
فـي
الكـأس
لولا
المزج
يحرقه
|
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مــن
كــل
غـان
كـأن
الليـل
طرتـه
|
والشــمس
غرتــه
والســحر
منطقــه
|
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يزهـو
بـه
مـن
عقـود
الجيد
لؤلؤها
|
كــأنه
مــن
دراري
الثغــر
يسـرقه
|
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لـدن
القـوام
دقيـق
الخصـر
خـاتمه
|
لـو
شـاء
مـن
غيـر
تكليـف
يمنطقـه
|
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مـا
أطيـب
العيـش
فـي
أكنافهن
وما
|
أولـى
الفـتى
بنفيـس
العمـر
ينفقه
|
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ألــذه
حيــث
كـان
الشـمل
مجتمعـا
|
وشـــرّه
لا
قضــى
المــولى
تفرّقــه
|
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للّــه
فرصــة
أنـس
قـد
ذكـرت
بهـا
|
عصــراً
بنيـل
المنـى
يشـدو
مطـوقه
|
|
أبـان
نيلـي
فـي
شرخ
الشباب
من
ال
|
أحبــاب
مـا
لا
أظـن
الغيـر
يرزقـه
|
|
انــاء
عــز
بســاحات
لبســت
بهـا
|
مـن
الصـبا
مـا
يكـاد
البين
يخلقه
|
|
فــي
مربــع
ممـرع
نيطـت
علـي
بـه
|
تمـــائمي
وبفـــؤدي
شــد
بخنقــه
|
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أهكــذا
ليــت
شــعري
كـل
ذي
كـرم
|
يصــبيه
تــذكاره
المـأوى
ويقلقـه
|
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يـا
أيهـا
الراكـب
الغادي
إلى
بلد
|
جرعــاؤه
خصــبة
المرعــى
وأبرقـه
|
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ناشـدتك
اللّـه
والـود
القـديم
إذا
|
مـا
بَـانَ
مِـن
بَانِ
ذاك
السفح
مورقه
|
|
وشــاهدت
عينــك
الغنــاء
غادرهـا
|
مخضــلة
بالحيــا
الوســمي
مغـدقه
|
|
أن
تســتهل
صــريخاً
بالتحيــة
عـن
|
بـاك
مـن
البعـد
كـاد
الدمع
يغرقه
|
|
يــثير
أشـجانه
فـوج
الصـبا
سـحراً
|
وســاجع
الــورق
بالــذكرى
يـؤرقه
|
|
لـــه
فـــؤاد
نـــزوع
لا
يفــارقه
|
حــر
الغــرام
وجفــن
ليـس
يطبقـه
|
|
بالهنـد
نـاءٍ
أخـي
وجـدٍ
يَحِـنُّ
إلـى
|
أوطــانه
وســهام
الــبين
ترشــقه
|
|
إلـى
العرانيـن
مـن
أقرانـه
وإلـى
|
حــديثهم
عــبرات
الشــوق
تخنقــه
|
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وللظبــاء
بهاتيــك
الســفوحخ
لـه
|
تـــأله
برقيـــق
الشــعر
ينطقــه
|
|
لـم
يسـل
عنهم
ولم
ينس
العهود
ولم
|
ينقــض
وإن
طــالت
الأيــام
مـوثقه
|
|
ومــا
دعــاه
لطـول
الإغـتراب
سـوى
|
أمــر
بــه
ظـل
سـعد
الحـظ
يسـبقه
|
|
وكيـف
لا
يحمـد
المسـعى
وقـد
بلغـت
|
بــه
إلـى
الـدكن
المـأنوس
أنيقـه
|
|
حــتى
أنــاخ
ببــاب
الآصــفي
نظـا
|
م
الملــك
أهيــب
ســلطان
وأليقـه
|
|
النيـر
الفـرد
محبـوب
العلـي
ومـن
|
مـن
أفضـل
الدولـة
العـالي
تـألقه
|
|
سـامي
المقـام
أغـرّ
الـوجه
مسـفره
|
زاكـي
النجـار
حسـيب
الأصـل
معرقـه
|
|
مـن
دوحـة
فـي
روابـي
العز
منبتها
|
ومــاء
عيــن
العلا
فيهــا
تــدفقه
|
|
خيــار
مــن
ملــك
الـدنيا
أبـوّته
|
ورهطـــه
لرهـــان
المجــد
ســبقه
|
|
أصــول
مجـد
إلـى
الصـديق
نسـبتهم
|
وشـــاهد
القــول
أفعــال
تصــدقه
|
|
كــأنهم
عقــد
زهــر
فـي
تناسـبهم
|
يـــد
الخلافـــة
للهــادي
تنســقه
|
|
جــاءت
بــأكرم
فــرع
طـاب
منشـؤه
|
وخيــر
مــن
أمــل
الراجـي
يحققـه
|
|
صـافي
الرغـام
فلـم
يلمـم
بـه
أشب
|
يشــين
أو
قـتر
فـي
الـوجه
يرهقـه
|
|
ليــث
العريــن
تصـك
الخطـب
همتـه
|
وتنطــح
الشــامخ
الراسـي
فتسـحقه
|
|
ثبــت
إذا
مكفهــر
النائبـات
دهـى
|
فبالقنــا
وســديد
الــراي
يفتقـه
|
|
نجيــع
هـام
العـدا
صـهباء
مرهَفِـه
|
محكـــم
فـــي
تراقيهـــم
مــذلقه
|
|
الرابــط
الجـأش
والهيجـاء
كاشـرة
|
إذ
كــل
قـرم
خفـوق
القلـب
مشـفقه
|
|
والقـاحم
الهـول
لـو
أدنـى
قوارِعِه
|
طنــت
بســمع
أخــي
عبــس
تصــعقه
|
|
والخـائض
الغمـرات
اللاء
لـو
هـدأت
|
وخـاض
شـاطئها
ابـن
الـورد
تغرقـه
|
|
والقــائد
الجيــش
كـرّاراً
بمعـترك
|
تهــوى
هـوي
الـبزاة
الشـهب
سـبقه
|
|
والقـائل
الفصل
ما
بين
الملوك
فلو
|
ناجــاه
ذو
لهجــة
بـالريق
يشـرقه
|
|
والــواهب
الــذهب
الآبــي
لكـثرته
|
عــن
أن
يحيــط
بــه
عَــدَّاً
مفرقـه
|
|
لا
يشـهد
الفضـل
في
بذل
النوال
سوى
|
لقــــابليه
ولا
بـــالمن
يمـــذقه
|
|
يعلـي
إذا
أمـه
الحـر
الكريـم
لـه
|
شـأوا
ومـن
رق
صـرف
الـدهر
يعتقـه
|
|
يهــوي
إلـى
جـوده
مـن
كـل
قاصـية
|
مقيــد
الــدهر
بــالأرزا
ومطلقــه
|
|
مــا
فـي
الملـوك
لـه
نـدّ
ولا
مثـل
|
لا
هـــم
إلا
إن
البـــاري
ســيخلقه
|
|
تجـري
سـباقاً
إلـى
العليـاء
ضمرهم
|
ومــن
إذا
مـا
جـرت
حاشـاه
يلحقـه
|
|
ميــزان
عــدل
يحـق
الحـق
مقتـدراً
|
ويــدمغ
الجــور
تنزيهــاً
ويزهقـه
|
|
يـولي
ذوي
الفضـل
فضلاً
والمسيء
بما
|
جنــى
ومــا
كســبت
أيـديه
يـوبقه
|
|
بسـبقه
فـي
مجال
الفخر
يشهر
في
ال
|
مســكون
مغربــه
الأقصــى
ومشــرقه
|
|
ولـم
يـزل
لاقتنـاء
المجـد
مجتهـداً
|
وبارتقــا
فلــك
العليــا
تعلقــه
|
|
لنيـل
مـا
عجـزت
عنـه
الملـوك
على
|
علاتـــه
أبـــداً
ينمـــو
تشـــوقه
|
|
يـا
أيهـا
الملـك
الميمـون
لا
برحت
|
علــى
لــوائك
ريـح
النصـر
تخفقـه
|
|
وافتــك
مــن
نـازح
ذابـت
حشاشـته
|
بــالبين
فهـو
كئيـب
الصـدر
ضـيقه
|
|
عـذراء
يعنـو
جريـر
لـو
أصـاخ
لها
|
ســمعاً
ويســجد
تعظيمــاً
فرزدقــه
|
|
تزهـو
وتختـال
فـي
برد
البيان
لكي
|
تـــرد
دعــوى
مضــاهيها
وتحنقــه
|
|
تَمُـتُّ
بالصـدق
إذ
لـم
تـأت
مُختَلَقـاً
|
مــن
الثنـاء
وخيـر
القـول
أصـدقه
|
|
ضــمنت
أبياتهــا
آي
البـديع
فلـم
|
يقـدر
عليهـا
بليـغ
القـول
مفلقـه
|
|
فــإن
قبلــت
فأهــل
للقبــول
وإن
|
تعــرض
فيكبـو
لحـظ
المـرء
أبلقـه
|