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فــي
سـالف
الأيـام
والأزمـان
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رأت
ذئابُ
فئةً
للضــــــــّان
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فــي
بلــد
ليسـت
بـه
تهـان
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آمنـــة
يحرســـها
الانســان
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فقـــالت
الــذئاب
للأكبــاش
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لهيبنهـا
مضـطرم
فـي
الجـاش
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يـا
أسـفا
للضأن
كم
ذا
يشقى
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واحســرة
عــمّ
غــدا
سـيلقى
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كــم
ذابــح
قلبــه
لا
يحــن
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لقتلــــه
ســــكينه
يُســـن
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فارتشـعت
مـن
الـردى
النعاج
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وقــالت
الأكبــاش
مـا
العلاج
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فقـــالت
الــذئاب
لا
ضــرار
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لكــل
داء
أو
جــدوا
عقــار
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ســـرن
بأســـركن
للجبـــال
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فنعـم
الحصـن
هـي
في
القتال
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فيها
النجا
من
عاشق
الذبيحة
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إنـا
نصـحنا
والهدى
النصيحه
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فمـدحت
عـن
فعلهـا
الـذئابا
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وصــدقت
جنســا
بـدا
كـذابا
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وغرهــا
مــن
جمعـه
البكـاء
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وقــد
يغــر
الأبلـهَ
الأعـداء
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ولــو
تــردت
بثيـاب
العقـل
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لأدركـت
مـا
خلـف
هـذا
القول
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لكنهـــا
بجهلهــا
تســارعت
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إلـى
إجابـة
العـدا
واندفعت
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وأعجبــت
مـن
تلكـم
الخصـال
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وكلهــا
سـارت
إلـى
الجبـال
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عنــدئذ
أتــت
لهـا
الـذئاب
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واشــتدت
المحنــة
والمصـاب
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فقـال
جنـس
الضـأن
قد
خُدِعنا
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حيـث
إلـى
أعـدائنا
استمعنا
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لقـد
فررنـا
مـن
هول
المنية
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إذا
بنــا
بتلكــم
البليــة
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وهكــذا
الخـوف
مـن
الممـات
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يبيــد
ظـل
العيـش
والحيـاة
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فقـالت
الـذئاب
العيـش
حـرب
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والحـرب
مـن
دون
الخداع
صعب
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ومـن
يغـرره
مظهـر
الصـداقه
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مــن
العـدو
طبعـه
الحمـاقه
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