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يـا
أميـر
البيـان
أيـد
جـدك
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مــن
أتـى
أيـده
ابـاك
وجـدك
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يا
حفيد
الأولى
حموا
مجد
لبنا
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ن
وان
صـنته
فقـد
صـنت
مجـدك
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ذاك
عهــد
للمشــرفية
زانــو
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ه
كمـا
زنـت
باليراعـة
عهـدك
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عهـد
فخـرٍ
مـن
يوم
سركيس
حتى
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يومنـــا
كلــه
يصــعر
خــدك
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بالســـلاحين
مرقـــمٍ
وحســامٍ
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أيهــا
الخـازني
حـررت
مهـدك
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قـد
صـحبت
المعنـي
خيـر
رفيقٍ
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وصـحبت
القيـل
الشـهابي
نـدك
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وركبـت
الحصـان
فـي
عهـد
حصنٍ
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معليـا
فـي
مواقف
الروع
بندك
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كنـت
كالرمح
طاعناً
لبة
الحيف
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وكالســـيف
لا
تقــارب
غمــدك
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ووردت
الحمــام
شــنقاً
ولــم
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تجـزع
لتنـدي
ببذل
روحك
وردك
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ورأينـاك
تشـرب
الصاب
مختاراً
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لتبقــي
لقــوم
لبنـان
شـهدك
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شـدت
في
كسروان
ما
شاده
كسرى
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وفيــه
اقمــت
بالعــدل
حـدك
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أيـن
ملـت
تلـق
آثارك
الغراء
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فــي
كســروان
تنشــد
حمــدك
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يـا
أبـا
نـادرٍ
سلاحك
يا
يفني
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وهــذا
يــراعُ
يوســف
بعــدك
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ومضـاء
البيـان
فـي
عصـرنا
م
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مثـل
مضـاءٍ
بـه
جلـوت
فرنـدك
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ان
هـذا
الحفيـد
احيـاك
حـتى
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خلتـه
مـن
غيـاهب
المـوت
ردك
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قـد
وجـدنا
فيـه
ابـاءك
حقـاً
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ووجــدنا
فيــه
نهـاك
ورشـدك
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ووجـدناه
فـي
السياسـة
ينحـو
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نحـوك
المقتفـى
ويقصـد
قصـدك
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لـك
يـا
ابـن
الشجيع
عهد
على
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قـوم
باكبـادهم
يصـونون
عهدك
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قـوم
لبنان
من
ابحت
لهم
عمرك
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رفـــداً
فــاكبر
الأرز
رفــدك
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فملكــت
القلـوب
حـتى
رأينـا
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حرهــا
صــاد
بـالمودة
عبـدك
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واراك
الزعيــم
حقــاً
ولكنـك
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تــأبى
تيهــاً
وتلــزم
زهـدك
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حمــلٌ
انــت
غيـر
انـك
تمسـى
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قـائداً
مـن
شـباب
لبنان
اسدك
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تتهــادى
بـك
المنـابر
زهـواً
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ليتـك
المجلـس
النيـابي
وحدك
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