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رجــلٌ
ينحنـي
لـوقر
الزمـانِ
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شـائب
الـرأسِ
مرسـل
الأجفـانِ
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اشــبع
العمـرُ
قلبـه
فتخطـى
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منــه
محصــول
تسـعةٌ
بثمـانِ
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قـام
فـي
معبـد
يصـلي
خشوعاً
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عابـداً
ضـارعاً
تقـي
الجنـان
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طالبـاً
أن
يـرى
قبيـل
ممـاتٍ
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مولـد
المرتجـى
لذاك
الزمان
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ذاك
شـيخ
وسـط
المصـلى
مقيمٌ
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زاهــدٌ
عـن
مسـالك
الطغيـان
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يرتجي
رؤية
المخلص
قبل
المو
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ت
مــن
ربــه
بغيــر
تــوان
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فـإذا
بـالبتول
يوسـف
والعذ
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راء
قـد
عرجـا
بـذاك
المكان
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وعلـى
سـاعديهما
الطفـل
يسو
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ع
قـــد
احضــراه
للاختتــان
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بلغـا
ذلـك
المصـلى
ومـا
في
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ه
أحــد
غيـر
شـيخنا
سـمعان
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اخـذ
الطفـل
فـي
يديه
ونادى
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انــت
ربــي
ومبـدع
الأكـوان
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بـارك
اللَـه
ثـم
انشـد
ربـي
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عبــدك
الأن
اطلقــن
بأمــان
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قـد
رأت
اعينـي
الـذي
املته
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ورأت
مـــا
أعـــد
للإنســان
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لفظ
الشيخ
ذا
ومال
إلى
العذ
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را
بـوجه
تطـوف
فيه
التهاني
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قـال
هـذا
الفـتى
يكون
لاسقا
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ط
وانهــاض
اكــثر
الفتيـان
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واعلمـي
ان
قلبـك
الغض
يوماً
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ســوف
تفريـه
حربـة
الأحـزان
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هكـذا
قـال
ذلك
الشيخ
سمعان
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بـوحي
مـن
روح
بـاري
الكيان
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يوسـف
والبتـول
مريـمُ
كانـا
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عنــد
تلـك
الأقـوالِ
ينـذهلان
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قــدما
للإلــه
فرخــي
يمـام
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طـوع
ناموسـهم
لـذاك
الزمان
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وقضى
الشيخ
بعدما
تم
وحي
ال
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روح
فيـه
ونـال
كـل
الأمـاني
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كـل
هـذا
يـا
قـوم
سـرٌّ
عجيب
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أيــن
منــي
بيـانه
ببيـاني
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