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مـا
هـاجتِ
الـذكرى
شـجونَ
شبابي
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إلا
أمـــام
شــبابكَ
المتصــابي
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يــا
حـاملاً
هـمَّ
الهـوى
وعـذابه
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لا
ذُقـتَ
همـي
فـي
الهـوى
وعذابي
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لـكَ
عـبرةٌ
بـي
لـو
فقهت
صبابتي
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ودرسـتَ
فـي
عهـدِ
الغـرام
كتابي
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هـو
شـرُّ
ما
كتبَ
الشبابُ
وخيرُ
ما
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يلقيــــه
أســـتاذٌ
علـــى
طلاب
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هـو
روعـةُ
الأهـواءِ
فـي
سكراتها
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وقــرارةُ
الاهــوالِ
فـي
الألبـاب
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هـو
معـرِضُ
الشيطانِ
شيطان
الهوى
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لغضاضــــةٍ
ومضاضـــةٍ
وتبـــاب
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ألقيـت
فيـه
شـواردي
غصصـاً
على
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غصــصٍ
واوصــاباً
علــى
أوصــابِ
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زفـراتُ
صـدرٍ
لـو
بثثـت
بها
إلى
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فلــك
الـدجى
أطفـأتُ
كـل
شـهاب
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ولـو
ان
ليلـى
انشـدت
مجنونهـا
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شــعري
لثـاب
إلـى
هـدىً
وصـوابِ
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ولكـان
يُعـرضُ
عـن
هواهـا
خائفاً
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أن
يبتلــى
منــه
بمثـل
مصـابي
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قـد
ذاقَ
قيـسٌ
مـن
هـواه
صـبابةً
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وشــربتُ
اكوابــاً
علــى
أكـوابِ
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مـن
قـاس
مـا
لاقيـتُ
من
وجدٍ
بما
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لاقـــاه
قــاس
جهنمــاً
بثقــابِ
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لا
العقـلُ
يُعدَلُ
بالجنونِ
ولا
ابنةُ
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السـلطانِ
تُعـدَلُ
بابنـةِ
الحطّـاب
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والهـــولُ
أرهبــه
إذا
لاقيتــه
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وســراجُ
ذهنــكَ
مشــعلٌ
لا
خــابِ
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وذِمـارُ
ليلـى
لـم
يكن
كذِمارِ
فا
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تنــتي
تحــفُّ
بـه
أسـودُ
الغـاب
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كــانت
ثريـا
بنـتَ
أكـرم
عِـترةٍ
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موصـــولةَ
الأنســـاب
بالاحســاب
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مقصــورةً
فــي
خِـدرها
ولهـا
أبٌ
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عــالي
المُقــام
معظَّـمُ
الألقـابِ
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حسـناءُ
فـي
شرخ
الصبا
وانا
فتىً
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يتلَّقـــــطُ
الغفلاتِ
بالأهــــداب
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فُتنـت
بشـعري
وافتتنـتُ
بحسـنها
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فـأتى
الهـوى
عفـواً
بغيـر
حساب
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ما
كنتُ
أحلمُ
أن
أرى
وجهَ
الثريا
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هابطــــاً
متعفـــراً
بـــترابي
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ما
كنتُ
احلم
في
الكرى
ان
نلتقي
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متســـاقيين
رُضــابها
ورضــابي
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حـتى
أتـاني
فـي
الظلام
رسـولها
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فـــذهبتُ
غيــرَ
مؤمّــلٍ
بايــاب
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ولقــد
تلاقينـا
ولـم
يـكُ
سـامعٌ
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غيــرَ
الظلام
خطابهــا
وجــوابي
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قـالت
وربـك
ان
شـعرك
قـد
سـبى
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قلـبي
وجـاءَ
بـه
اليـكَ
السـابي
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إِن
كنــتَ
بـراً
بالسـبيّ
جعلتَنـي
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وحــدي
عــروس
قريضــك
الصـياب
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فأجبتهــا
وهــواكِ
وهـو
أليـتي
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وقــفٌ
عليــكِ
قريحــتي
وشـبابي
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وتصـــرمت
حجـــجٌ
ثلاثٌ
والهــوى
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مــا
بيننــا
متعاقــدُ
الأسـبابِ
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لاقيـت
مـن
اهواله
ما
يردِع
الطا
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غـــي
ويكســـرُ
شــرَّةَ
الوثــابِ
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لـو
شـاهد
العبسـيُّ
بعـض
مواقفي
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لـــروى
لعبلاهُ
حـــديثَ
عجـــاب
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ولهـاب
عنـترةٌ
مخـاطر
كنـت
اغش
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اهـــا
بقلــبٍ
ليــس
بالهبــاب
|
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إنــي
بليـت
بفتيـةٍ
مـن
قومهـا
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لا
يلتقــون
النــاس
غيـرَ
غضـاب
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كـم
صـادفوني
فـي
السبيل
وانذر
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ونـي
بـالمنون
واغرقـوا
بسبايي
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كـم
ليلـة
تحـت
الغمـامِ
سهرتها
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وعيـــونهم
حــولي
عيــونُ
ذئاب
|
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وكـم
اقفتـوا
أثري
إلى
أبوابها
|
فرجعــتُ
مرجومــاً
عــن
الأبـواب
|
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مــا
كنـت
أظفـر
مـرةً
بوصـالها
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إلا
ودسُّ
المـــوتِ
تحــت
ثيــابي
|
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وتـبيت
واجـدةً
واعلـم
مـا
بهـا
|
وابيـتُ
ملتاعـاً
وتعلـم
مـا
بـي
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حجــجٌ
ثلاثٌ
مــا
قضــيت
دقيقــةً
|
منهـا
خلـيَّ
البـالِ
فـي
محرابـي
|
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قطعتهـــا
متهتكـــاً
بقصــائدي
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حـتى
خلعـتُ
علـى
الهـوى
آدابـي
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ووضــعت
قــدري
واســتبحت
محـرَّ
|
مـاتِ
الـدين
مـن
سُكرٍ
ومن
ألعاب
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ذا
مـا
جنـاه
علـيَّ
شـعري
ليتني
|
لثَّمــتُ
وجــهَ
قريحــتي
بنقــاب
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أمــا
ثريــا
فاســتقلَّ
بامرهـا
|
كهــلٌ
كــثير
المــالِ
والاعتـابِ
|
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لـم
ترضـه
بعلاً
لهـا
إلا
واهلوها
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كمـــــاةُ
خنــــاجرٍ
وحــــراب
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هـي
مهجـتي
عـابت
وطـال
غيابها
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عنـي
فطـالَ
عـن
الحيـاة
غيـابي
|
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أنـا
ذلـك
الميـتُ
الذي
يعظ
الش
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بـابَ
بشـعره
حيـاً
علـى
الأحقـابِ
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وانـا
الـذي
ديـوانه
كأس
اللظى
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قــد
تُــوجت
مــن
جمـره
بحبـابِ
|
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يـا
حـاملين
علـى
الصبا
آمالكم
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هــي
عبــءُ
اوهــامٍ
علـى
كـذابِ
|
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لا
شــارعٌ
منكــم
علـى
مـاءِ
ولا
|
كـان
الصـبا
في
العمرِ
غير
سراب
|
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لــذاته
تلــد
المصـائب
للفـتى
|
ومــتى
ولــدن
مـررنَ
مـرَّ
سـحاب
|
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كـأسٌ
تـذوق
الشـهدَ
منهـا
طافياً
|
أمــا
قرارتُهــا
فمــرُّ
الصــاب
|
|
مـن
يقـضِ
فـي
تعب
الغرام
شبابه
|
شــدَّ
المشــيبُ
عليــه
بالاتعـاب
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