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يــا
قلمـاً
أزرى
بخـوط
الأراك
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فـي
لطفـه
سـبحان
من
قد
براك
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اخجلـتَ
فـي
الأرض
قـدود
القنا
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وفـي
السـما
هابك
رمح
السماك
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أنــت
الـذي
اقسـم
رب
الـورى
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بـه
فسـد
مـا
شئت
واقهر
عداك
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تمشـي
على
الطِرس
الهوينا
وما
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فـاز
بفضـل
السـبق
يوماً
سواك
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يــا
مســتقيماً
جــوفه
فـارغ
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فـاز
بنـور
اللَـه
قلـب
حكـاك
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شـقّوا
لسـاناً
منـك
فاضـت
على
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اطرافـه
الحكمـة
دون
انفكـاك
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كـالفجر
لمـا
انشـق
ضاءت
لنا
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أنــواره
تنــبيءُ
عمّـا
هنـاك
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قـم
خـطّ
مـا
أملـي
وشـنّف
بـه
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سـمع
العلـى
فهـي
ستروي
صداك
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صـغ
مـن
لآلـي
المـدح
في
عارف
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أحسن
ما
في
الوسع
ان
كنت
ذاك
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وهــــذه
أوصـــاف
عليـــائه
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فـرائد
الـدرّ
فمـا
شـئت
هـاك
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وأحســن
الســبك
فــان
يُرضـه
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يـا
قلمـي
صـيرّتُ
روحـي
فـداك
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فمـــدحه
فــرض
علــى
ذمــتي
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ومــا
يفــي
فرضــي
إلا
وفـاك
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وكيـــف
لا
وهــو
ملاذي
الــذي
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انشـط
بالفضـل
حظـوظي
الركاك
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وهـو
فتى
المجد
الرفيع
الذرى
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فلتَحـيَ
يـا
مجـد
ويحيـا
فتاك
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طــوبى
لســوريا
بــه
واليـاً
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ألقـى
علـى
الفضل
يمين
امتلاك
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شـيد
فيهـا
العـدل
هـدياً
وهل
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للعــدل
إلا
بالهـداة
امتسـاك
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أخلاقــه
كالشــهب
فـي
حسـنها
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لهـا
علـى
أوج
الجلال
احتبـاك
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ممتليــء
علمــاً
وحلمـاً
ومـا
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لـه
بغيـر
المكرمـات
انهمـاك
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أحيــا
بنـي
الآداب
حـتى
لقـد
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تبسـمت
منهـا
العيـون
البواك
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وانعـــش
العلـــم
وأنصــاره
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فشـكّ
عيـن
الجهـل
سـهماً
وشاك
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يَغــارُ
للــدين
وللدولــة
ال
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عليـا
إذا
مـدت
عداها
الشباك
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فكــم
لــه
فــي
نصـرها
همـة
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عاليــة
لا
يعتريهــا
انتهـاك
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ســل
برقـة
الغـراء
إذ
امّهـا
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مجاهــداً
يضــرب
وجــه
الهلاك
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وكــم
لــه
ثَمّــةَ
مــن
موقـف
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سـدّ
علـى
العادي
مجال
الحراك
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هـذا
هـو
الفَخـرُ
المعلـى
فقل
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للحاسـد
الواجـد
اقصـر
عنـاك
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ان
الخِلال
الزاكيـــات
الــتي
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تبصـرها
ارث
الجـدود
الـزواك
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مـولاي
عفـواً
عـن
قصـوري
فمـا
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مـن
طـوق
مثلـي
ان
يوفي
ثناك
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لا
زلــت
للعفــو
ســحاباً
ولا
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جفّـت
مـدى
الـدهر
غوادي
نداك
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واهنــأ
بمجــد
ســائد
خالـد
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فمــا
هنـاء
الـدين
إلا
هنـاك
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ودم
بــأفلاك
العلــى
صــاعداً
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يــا
أبــد
اللَـه
تعـالى
علاك
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