|
تعـالى
اللَه
ما
اسمى
اقتداره
|
واعظــم
شــانه
واعــز
جـاره
|
|
لقــد
جعـل
الـورى
دولا
ولكـن
|
علـى
قـدر
بهـم
اجرى
اختياره
|
|
فمنهــم
كــل
مقتــدر
شــكور
|
غـدا
بـرد
التقـى
ابداً
شعاره
|
|
ومنهــم
ظــالم
للنفـس
أمسـى
|
مبيع
الدين
في
الدنيا
اتجاره
|
|
ومنهـم
مـن
تذبذب
في
البرايا
|
فيصــدق
تــارة
ويميـن
تـاره
|
|
أولئك
أمــة
يــا
مـن
يراهـم
|
بهــم
اضــحت
طرابلـس
شـراره
|
|
لهــم
فـي
كـل
عـرس
قـرص
فـن
|
وكــل
شــريط
طنبــور
عبـاره
|
|
فمــن
متكــبر
بالمـال
مغـرى
|
يخـــال
بــأنه
رب
الــوزاره
|
|
ولا
عجــب
فـذا
ابـن
خلا
ولكـن
|
ظننــا
ان
تهــذبه
الحضــاره
|
|
ومـن
متهـافتٍ
دومـاً
علـى
مـا
|
يـزول
مـن
الحطـام
ولو
قطاره
|
|
جهـول
ليـس
يـدري
العار
يوماً
|
وبـرد
الكبريـاء
غـدا
دثـاره
|
|
يظــن
الفضـل
فـي
طـول
وعـرض
|
وفــي
دجـل
ومكـذوب
اسـتخاره
|
|
وكـم
أجـرى
الـدموع
لنهب
مال
|
وكـم
أبدى
لدى
النصب
اضطراره
|
|
وهـل
يشكو
الكريم
من
البرايا
|
لغير
اللَه
في
الدنيا
افتقاره
|
|
ولكــن
لا
أراك
اللَــه
كرهــاً
|
لـه
طمـع
تـذوب
بـه
المـراره
|
|
فمــا
يخلـو
محـل
مـن
مرامـي
|
مطــامعه
ولا
زيــت
المنــاره
|
|
ورب
فــتى
حكــاه
وزاد
فضـلاً
|
وكـم
يعـدي
ضنى
الجربان
جاره
|
|
فــتى
بمصـارف
الأوقـاف
مغـرى
|
كســنور
يظــن
المــال
فـاره
|
|
يـدل
علـى
الخيانـة
مـن
تولى
|
مصـــالحها
إلا
بئس
التجــاره
|
|
وينهــب
معهـم
مـال
اليتـامى
|
ويظهـــر
ان
ذلــك
بالاجــاره
|
|
لـه
فـي
الشـر
يرجع
حيث
اضحى
|
علـى
فتـوى
الضـلال
لـه
جساره
|
|
وانــي
يهتــدى
للحــق
يومـاً
|
فــتىً
ابليـس
اصـبح
مستشـاره
|
|
فيـا
تعسـا
لقـوم
قـد
طغـاهم
|
غـبي
ليـس
يـدري
مـا
الطهاره
|
|
لميـراث
العفـاة
قد
استباحوا
|
وقـد
اكلـوه
يـال
بنـي
فزاره
|
|
فمــا
ربحــت
تجـارتهم
ولكـن
|
لعمـر
اللَـه
ذا
عيـن
الخساره
|
|
واربـاب
المحـاكم
يـا
لقـومي
|
بصـائرهم
خلـت
منهـا
البصاره
|
|
وفيهـــم
كــل
مغــرور
وغــر
|
تــدرع
بالضــلالة
والــدعاره
|
|
يــروح
مسـربلاً
ثـوب
المعاصـي
|
ويغــدو
خالعـاً
فيهـا
عـذاره
|
|
فكــم
مــثر
أعــانوه
ولكــن
|
بطـول
يمينهـم
سـلبوا
يسـاره
|
|
وكـم
مـن
معسـر
حبسـوه
ظلمـاً
|
ومـا
تخفـى
على
الفطن
الإشارة
|
|
قلــوب
كالحجــارة
بـل
وزادت
|
قســاوتها
وان
مــن
الحجـاره
|
|
فــوا
بلـواي
مـن
زمـن
مسـيء
|
أبــى
يهــدي
لنـا
إلا
شـراره
|
|
لقـد
ضـاعت
حقـوق
الناس
ظلماً
|
فمـن
للعـدل
مـن
يحمـي
ذماره
|
|
ومحكمـة
الشـريعة
ضـاع
فيهـا
|
مكـان
الحـق
بل
تركوا
ادكاره
|
|
فقاضــيها
وسـوف
اللَـه
يقضـي
|
عليــه
ولا
يقيــل
لـه
عثـاره
|
|
يسـوم
النـاس
ظلماً
أو
يداووا
|
فضـــيلته
بفضــل
أو
عصــاره
|
|
فكــم
بوعــود
عرقــوب
يمنـي
|
ورب
الحــق
قـد
مـل
انتظـاره
|
|
تلاعــب
بالشـريعة
كيفمـا
قـد
|
أراد
ولـم
يخـف
مـن
ذا
بواره
|
|
وارشــد
رهطــه
للظلــم
جهلاً
|
وانهلهـم
كمـا
رامـوا
عُقـاره
|
|
فمــا
منهــم
فـتى
إلا
وأمسـى
|
ردا
الأوزار
فـي
الدنيا
ازاره
|
|
فكـم
ولغـوا
اناء
أخي
اضطرار
|
وكـم
ذي
عسـرة
بلغـوا
ضـراره
|
|
وكــم
وقــف
أبـادوه
وشـادوا
|
بغلتــه
كمــا
شـاؤوا
عمـاره
|
|
وكــم
جنحــوا
لأغــراض
قبـاح
|
وجنـح
الليـل
قـد
أرخى
ستاره
|
|
كـذا
البلديـة
البلـداء
فيها
|
بغيـر
السـوء
ليـس
لهم
شطاره
|
|
ولــولا
ان
فيهــا
بعــض
قـوم
|
كــرام
هــدم
المظلــوم
داره
|
|
فكـم
هـي
قـد
حـوت
مـن
كل
فظ
|
غليــظ
القلـب
معـدوم
الإداره
|
|
يصــعر
خــده
للنــاس
كــبرا
|
وقــد
أبـت
العلـى
إلا
صـغاره
|
|
ويـا
شـتان
مـا
بيـن
المعالي
|
وبيـن
ألـي
الدناءة
والحقارة
|
|
فليـت
الـدهر
يسـعفنا
إذا
ما
|
أزاح
الانتخــاب
لنــا
خمـاره
|
|
فكـم
يسـر
أتـى
مـن
بعـد
عسر
|
وكـم
للـدهر
يومـاً
مـن
آثاره
|
|
ألا
يـا
أيهـا
الناس
اتقوا
من
|
لـه
تعنـوا
الوجوه
المستناره
|
|
فيـا
طـوبى
لمـن
رفض
المعاصي
|
وامســى
آخــذاً
منهـا
حـذاره
|
|
أخــي
إلـى
م
غفلتنـا
فبـادر
|
لطاعـة
مـن
يخـاف
العبد
ناره
|
|
ألــم
تعلـم
بـأن
المـوت
حـق
|
فمـا
لـك
لاكمـن
يخشـى
بـداره
|
|
لعمــرك
انمـا
الـدنيا
غـرور
|
بلـى
وحقيقـة
العمـر
استعاره
|