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مرحبــــاً
مرحبـــاً
بربـــة
خـــالِ
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صــانها
الحســن
بيــن
عــمٍ
وخــالِ
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أقبلـــت
تنجلـــي
وفــي
معطفيهــا
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مــن
بــديع
البــديع
فــرط
الـدلالِ
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قــد
روانــا
الـورديّ
عـن
وجنتيهـا
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مــا
روانــا
عــن
ثغرهـا
ابـن
هلالِ
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مــن
بنــات
الأفكــارِ
يصـبو
إليهـا
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حيــن
تجلــى
أخـو
الحجـى
والكمـالِ
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جـــاء
مكحـــول
جفنهـــا
بحـــديثٍ
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قـــد
رواه
عــن
العيــون
الكحــالِ
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نعــم
بكــرٌ
مــن
الكرامــة
ســادت
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فـــأتت
مربــع
الكــرام
المــوالي
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وســرت
فــي
الجهــات
شـرقاً
وغربـاً
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فـــوق
متـــن
القبـــول
والإقبــال
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ثــم
عــادت
مــن
العــراق
إلينــا
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بعـــد
بيـــنٍ
مشـــمولةً
بــالنوالِ
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قــد
حباهــا
موسـى
الشـريف
وإبـرا
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هيــمُ
يحيــى
عقــدَيْ
بَهــا
وجمــالِ
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خمســـاها
بـــل
شـــرفاها
بعقـــدِ
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ذي
معــــانٍ
أزرت
بعقـــد
اللآلـــي
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لســـت
أدري
هـــل
ســمطاها
بشــعرٍ
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أخجــــل
الــــدر
أم
بســــحرٍ
حلالِ
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إن
موســى
قــد
أبطــل
السـحر
قبلا
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ونـــراه
أتـــى
بســـحر
المقـــالِ
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وعجيبـاً
قـد
أخمـد
النـار
إبراهيـم
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قـــــدماً
وفضــــله
ذو
اشــــتعالِ
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حبــذا
حبــذا
العــراق
ومــا
فيـه
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مـــن
المجــد
والســنا
والمعــالي
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قـــام
فيـــه
لكـــل
فـــنٍ
خطيــبٌ
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صــــادحٌ
فــــي
منـــابر
الآمـــالِ
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وغـــدا
للعلـــوم
فــي
كــل
عصــرٍ
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فلكـــاً
مشـــرقاً
بزهـــر
الرجــالِ
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أيهــا
النيــران
فــي
فلـك
الفضـل
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كمـــا
ازهـــرت
نجـــوم
الشـــمالِ
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ليــس
بــدعاً
وانتمـا
وارثـا
الآداب
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والعلـــــم
عـــــن
جـــــدودٍ
وآلِ
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غزلـــي
فيكمـــا
ثنـــاءً
ومـــدحاً
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لا
بعيـــن
المهــا
وجيــد
الغــزالِ
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أننــي
والهــوى
علــى
البعــد
صـبٌ
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قـــانعٌ
منكـــم
بطيـــف
الخيـــالِ
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إن
شــــوقي
إليكـــم
شـــوق
حـــرٍّ
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ذي
وفـــاءٍ
يهــوى
كريــم
الخصــالِ
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أصـــبح
القلـــب
ســالياً
بهــواكم
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مــا
تلقــاه
مــن
صــروف
الليـالي
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إن
يكنـــب
يننـــا
انفصــالٌ
ففــي
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الحب
الحب
انفصال
الحبيب
عين
اتصالِ
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وإذا
لـــم
تكـــن
رأتكــم
عيــوني
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فرأكـــم
فكـــري
بعيـــن
المثــالِ
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أو
تمــادى
بيــنٌ
ولــم
يــك
وصــلٌ
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ففـــؤادي
عــن
حبكــم
غيــر
ســالِ
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دمتمـــا
كوكـــبيُ
علـــومٍ
أضــاءَت
|
منكمــا
الفضــل
فــي
سـنا
الأفضـالِ
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مــــا
تعنـــت
ورقٌ
وبـــات
شـــجيٌّ
|
تحــت
ذيــل
الرجــا
لنيـل
الوصـالِ
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