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صــدحت
ورق
الهنـا
لمـا
أضـا
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قمــر
الســعد
بــأفق
الشـهبِ
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وجلا
الـدهر
لنـا
ثغـر
الرضـى
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فاغتنمــا
منــه
ســامي
الأدبِ
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عـج
بنا
يا
صاح
للروض
العجيب
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ننهـب
اللـذة
بـالعيش
الهنـي
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حيث
وافى
يرتعي
الظبي
الربيب
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وصــفا
مــورد
أنــس
الزمــن
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إنمـا
الزهـر
حكى
ثغر
الحبيب
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وانجلــى
بالشـوق
قـدّ
الغصـن
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مـا
تـرى
النهر
اللجيني
فضضا
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بلجيــن
المــاءِ
روض
الــذهب
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قــل
لمـن
أصـبح
عنـه
معرضـاً
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كـلُّ
مـن
ضـيع
ذا
الـوقت
غـبي
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أيهـا
السـاقي
أدر
أخـت
لماك
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واســقنيها
بيــن
ريحـان
وآس
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ليــس
للعشــاق
ســكر
بسـواك
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عنــدما
غصـن
نقـا
قـدك
مـاس
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مـا
رأينـا
قبـل
أن
ننظر
فاك
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قمــراً
أصــبح
للصـهباءِ
كـاس
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همـت
مـذ
بـرق
المحيـا
ومضـا
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وانجلـى
بالصـبح
ليـل
الحجـبِ
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أخــذ
الحــب
فــؤادي
ومضــى
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يتثنــــى
بشـــمول
العجـــبِ
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يـا
نسـيمات
الصـبا
عطفاً
علي
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ان
مــررتِ
بيــن
أطلال
ســعاد
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حبـذا
الـوادي
وذيـاك
الشـذي
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ســلبت
أرواحـه
منـي
الفـؤاد
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هـل
بحـالي
علمـت
يـا
صاح
مي
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أذنفـت
عـن
ناظري
طيب
الرقاد
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يـا
بريقـاً
مـن
حماهـا
عرضـا
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مخــبراً
عــن
ثغرهـا
والشـنب
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إن
تــرد
مبســمها
بـي
عرضـا
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إننــي
ظــامٍ
لــذاك
الحبــبِ
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غـادة
قـد
سـلبت
بـدر
التمام
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مثلمـا
تغزو
الظبا
بالمقلتين
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كلمـا
أشـكو
لجفنيهـا
السقام
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عللتنــي
بلهيــب
الوجنــتين
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أطلعـت
للصـب
مـن
تحت
اللثام
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بظلام
الفــرع
نـور
الفرقـدين
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رشـــق
الحـــاجب
نبلاً
ونضــى
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جفنهـا
المكحـول
ماضـي
القضبِ
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حكــم
الحــب
علينــا
وقضــى
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فــي
هواهــا
إن
دعتنـا
نجـبِ
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علمـت
مـن
ليـن
عطفيهـا
الأسل
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ميَسـاً
يحسـده
الغصـن
النضـير
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ســحر
لحظيهــا
بهـاروت
فعـل
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كيــف
لا
تتخــذ
القلـب
أسـير
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فتنـة
يحلـو
بعينيهـا
الغـزل
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مثلمـا
يحلـو
مـديحي
بالبشير
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الشــهابي
الأميــر
المرتضــى
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كــوكب
العليـاءِ
بـدر
الشـهبِ
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مـن
علـى
جيـد
المعـالي
قبضا
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فاتـــاه
طائعــاً
كــلُّ
أبــي
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ســيد
أصـبح
فـي
الـدهر
علـم
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بمعـــانيه
الـــثي
لا
تحصــرُ
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ســاد
حلمــاً
ونــوالاً
وشــئم
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طيبهــا
فــي
كــل
حـيّ
ينشـرُ
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ونضــى
عزمــاً
وحزمــاً
وهمـم
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أصــبحت
فــي
كـل
خطـب
تنصـرُ
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يـا
لـهُ
شـهماً
بـه
قـد
نهضـا
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معلــم
العــدل
وصـدر
الرتـبِ
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وإذا
هـــز
صـــقيلاً
أبيضـــا
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أســكن
الأعــداء
بطـن
التُـربِ
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وبروحـي
نجلـه
المولى
الخليل
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السـني
اللـوذعي
نعـم
النبيه
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قـد
غـدت
مـن
كفه
السحب
تسيل
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بالعطايـا
والفـتى
سـرّ
أبيـه
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ماجـد
قـد
زانه
الخلق
الجميل
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وكــذا
لا
فضــل
إلا
قـد
حـبيه
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لـم
يكـن
حسـن
المزايـا
عرضا
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فيـه
بـل
مـن
جـوهر
الأصل
الأب
|
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وعلـى
النفـس
اعـتزازاً
فرضـا
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ان
غيــر
المجــد
لـم
يكتسـب
|
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إن
تــزره
تلقـه
أوفـى
جـواد
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وبــروض
العــز
نجمـاً
زاهـرا
|
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مشـرق
الطلعـة
مرفـوع
العماد
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عــاطر
الشـئمة
مـولى
ناصـرا
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خلتــه
لمـا
علا
ظهـر
الجـواد
|
كوكبـاً
مـن
فـوق
بـرقٍ
سـائرا
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أو
تـرى
ليثـاً
على
سير
الغضا
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إن
تـداعى
القـوم
يـوم
الحربِ
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تأخــذ
الأعيــن
منـه
الغرضـا
|
إذ
تــرى
فيــه
كمـال
الطلـبِ
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تتهنـى
يـا
أخـا
العليـا
بما
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جـادك
اللَـه
من
الفضل
العميم
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خيـر
مولـود
حكـى
بـدر
السما
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وانجلـى
فـي
مهـده
أوفى
كريم
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قـد
غـدا
ثغـر
الحمـى
مبتسماً
|
عنــدما
هــلّ
محيـاه
الوسـيم
|
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يــا
لـه
نجمـاً
سـعيداً
محضـا
|
كــل
قلــبٍ
للهنــا
والطــربِ
|
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دام
فــي
عـزك
مـأمون
القضـا
|
مـا
جلا
البـدر
لثـام
الغيهـبِ
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عمـت
الأفـراح
مـا
بيـن
الملا
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عنــدما
أشــرق
مولـود
سـعيد
|
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نـادت
الآمـال
يـا
نجـد
العلى
|
هـنّ
فيـه
جـدّة
السامي
المجيد
|
|
دام
مســـروراً
ينـــال
الآملا
|
والمنـى
مـن
كـل
نجـل
وحفيـد
|
|
مـا
أضـا
الصـبح
بافاق
الفضا
|
وتغنــى
الــورق
فـوق
القضـبِ
|
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وشــدا
فــي
مــدحه
مستنهضـاً
|
كــــلّ
مـــداحٍ
لســـان
الأدبِ
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