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حننـت
لـذكر
الربـا
والمعاهـد
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فمـا
الدمع
راقٍ
ولا
الطرف
راقد
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أمــا
تسـكن
النـوم
عينيـك
إذ
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أتـاك
بطيـف
الـذي
بـات
هاجـد
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وتمســـي
وتصـــبح
ذا
صـــبوةٍ
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فقلبــك
والطــرف
سـاه
وسـاهد
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ويشــتاق
طــوراً
إلــى
رامــه
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وأقماره
وظباه
وظباها
الخرائد
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وطيـــب
معاهـــد
أنــس
بهــا
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هـواك
فسـقياً
لهـا
مـن
معاهـد
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فهــل
فتنتـك
العيـون
المـراض
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وهـل
طعنتـك
القـدود
المـوائد
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فمــا
عــائد
لـك
شـرخ
الصـبا
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ولا
مــن
تصـباك
بالوصـل
عـائد
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ولكــن
أرى
بــك
غيــر
الــذي
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عهـدناه
مـن
فاقـد
القلب
واجد
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نعـم
لـم
تكـن
تتصـبا
الفـؤاد
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خــد
لجــةٍ
سـهلة
الخـد
ناهـد
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فمـا
القلـب
منـي
كنـاس
الظبا
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وقـد
كـان
غابـاً
لليـث
مناجـد
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علــى
وصــي
الرســول
الأميــن
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وزوج
البتــول
ســليل
الأماجـد
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إمــام
الأمــر
بعــد
الرســول
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فتعســـاً
لجاحــده
والمعانــد
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فــتى
ليــس
يــدرك
مـن
ذاتـه
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ســوى
أنــه
ليـس
ربّـاً
لعابـد
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اتتـــه
الإمامـــة
مــن
ربــه
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نجـم
فأضـحى
إلـى
الحـق
قـائد
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أقــام
الصـلوة
وآتـى
الزكـاه
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بخــاتمه
راكعـاً
فـي
المسـاجد
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وجاهـد
فـي
اللَـه
حـق
الجهـاد
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وقـد
فضـل
اللَـه
شـأن
المجاهد
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وهــم
معشــر
يطعمـون
الطعـام
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علــى
حبــه
ولـه
اللَـه
شـاهد
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لــه
ردت
الشــمس
غـب
الغـروب
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وقــد
كلمتـه
الوحـوش
الأوابـد
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فكــم
بــرأت
راحتـاه
السـليم
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فأضـحى
سـليماً
وقـد
كـان
بايد
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ولــو
تلــي
اســم
علــي
علـى
|
ســقيم
لأصــبح
للســقم
فاقــد
|
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ولــو
طرحـوا
منـه
حرفـاً
علـى
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لهيـب
لظـىً
لاغتـدى
منـه
هامـد
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وأشـــباله
عـــترة
المصــطفى
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فــأكرم
بأشــرف
جــد
ووالــد
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رقــى
ذروة
المجــد
فـي
سـؤدد
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فــدان
لــه
كــل
سـام
وسـامد
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عميــم
الفـوائد
جـم
المحامـد
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واصــل
الأماجــد
فـرع
الأجـاود
|
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فكــم
قـال
فـي
حقـه
المصـطفى
|
علــى
أخــي
ووزيـري
المسـاعد
|
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وقــد
كــان
معناهمــا
واحـداً
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كمـا
تجـد
الحـق
والصـدق
واحد
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لقـــد
فقــدت
بعــده
أحمــداً
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منــابره
والتقــى
والمســاجد
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علــي
مــع
الحــق
والحـق
مـع
|
علــي
فتبــت
يــدا
كـل
مـارد
|
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لقــد
فــاز
بالخلــد
مـن
وده
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كمـا
أن
شـانيه
في
النار
خالد
|
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أديـــن
الإلـــه
بحـــبي
لــه
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بصــدق
وأبــرأ
ممــن
يعانــد
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ولــو
أركبــوني
حــد
السـيوف
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ونــاب
الأســود
وســم
الأسـاود
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لقـد
عقـد
اللَـه
يـوم
الغـدير
|
علـى
النـاس
بيعته
في
المعاقد
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وقــد
حلهـا
بعـد
فقـد
النـبي
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لئيـــم
وخــم
وشــان
وحاســد
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أبــا
حســن
لـك
روحـي
الفـدا
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ونفســي
وطــارف
مـاني
وتالـد
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فــأنت
منــار
الهــدى
للـورى
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لـو
استمسـكوا
بـك
ما
ضل
حايد
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وتـــاهت
بمنعـــاك
آراؤهـــم
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فمــن
عابــد
لـك
غـالٍ
وجاحـد
|
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وولاك
أحمـــد
أمـــر
الـــورى
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بـأمر
مـن
اللَـه
فـي
ذاك
وارد
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وقــد
كنــت
مــن
دون
أصـحابه
|
تقيــه
بنفســك
شــر
المكايـد
|
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فــأنت
الخليفــة
مــن
بعــده
|
بنـــص
وإجمــاع
حــق
مواكــد
|
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فلــم
تــك
أحــدثت
مـن
بدعـة
|
ظلالاً
ولا
ظلـــــت
للآت
ســــاجد
|
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ولــم
تقــض
إلا
بــأمر
الإلــه
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فحكمــك
لا
عــن
يميــن
وشـاهد
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وســوغ
غيــرك
أمــر
القيــاس
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لتنتـج
عكسـاً
قضـايا
المقاصـد
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وكــم
لــك
فـي
خيـر
أم
حنيـن
|
وفـي
أحـد
مـن
عظيـم
المشـاهد
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فقـد
كنـت
تقري
البغاة
القناة
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وتســقيهم
صــبر
حـز
البـوارد
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وسـيف
إلـه
السـما
ذي
الفقـار
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وأنـت
يـد
اللضـه
بطشـاً
وساعد
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وأشـــهد
أنــك
نــور
الهــدى
|
إمـام
الـورى
خيـر
حـام
وحامد
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وولـــدك
أعلام
ديـــن
الإلـــه
|
أئمتنــا
واحــداً
بعــد
واحـد
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مصــابيح
مشــكاة
ديــن
الإلـه
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ومــن
حبهـم
رأس
كـل
العقايـد
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بطـــاعتهم
تســـتجاب
الصــلاة
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ويوجبهـا
ذكرهـم
فـي
المـوارد
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أيـا
أكـرم
الخلـق
يـا
من
غدت
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تزيـن
المحافـل
منـه
المحامـد
|
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تركــت
الوفــود
ومــن
أملـوا
|
وجئتـك
يـا
أكـرم
العـرب
وافد
|
|
وأعـــددت
حبـــك
للنائبـــات
|
ونيـل
الأمـاني
ودفـع
الشـدائد
|
|
وإن
حجبتنـــي
عنــك
الــذنوب
|
فهـا
أنـا
يا
هادي
الخلق
هائد
|
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وإنـــي
الـــذي
جئت
مفتقــراً
|
إلــى
صــلة
مـن
نـداك
وعـائد
|
|
وصـــيرت
مــدحك
لــي
شــافعاً
|
وإن
حصـرت
عـن
ثنـائك
القصائد
|
|
فخـــذها
ثــواقب
مــا
ثقبــت
|
لدى
النظم
منها
لئالي
الفرائد
|
|
فـــرائد
نظمتهـــا
بالمديــح
|
فأضــــحت
لحيـــد
علاك
القلائد
|
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فحيـــاك
ربــك
مــا
أن
ســرت
|
نواســم
وانهـل
دمـع
الرواعـد
|