|
هلال
الهــدى
فــي
دارة
المجــد
أشـرق
|
ودونــك
ليــل
الغــي
بالرشـد
فـامحق
|
|
ويــا
علــم
الأعلام
كــم
خفقــت
قلــو
|
ب
قــومٍ
إلــى
مــرأى
حفافيـك
فـاخفق
|
|
أطــل
علــى
الفســطاط
أصــبح
أهلــه
|
ثاقــل
الرزايــا
بيــن
عــانٍ
ومطلـق
|
|
يســاقون
مــن
أيـدي
اليـالي
وريبهـا
|
مــــرارة
صـــابٍ
بـــالهوان
مرنـــق
|
|
فيـا
هـل
أتـى
ابـن
النيل
ما
حل
بعده
|
بمصــر
ومــا
أدراه
بالنيـل
مـا
لقـى
|
|
كـــأني
بــه
يرنــو
بألحــاظ
والــدٍ
|
إلــى
مصــر
حنــانٍ
إلـى
النيـل
شـيق
|
|
تـرى
مـا
جـرى
مـن
بعـدنا
فـي
ديارنا
|
لـــدى
خطـــر
فـــوق
الأنــام
محلــق
|
|
فيفهــم
لحــن
الريــح
إن
ذكــرت
لـه
|
تباريـــح
ضـــيم
بـــالبلادين
محــدق
|
|
نــأيتم
فـألقى
الـذل
فـي
مصـر
رحلـه
|
بســــــــيرة
لاوانٍ
ولا
مــــــــترفق
|
|
وعــادت
ريــاض
النيـل
نـاراً
جحيمهـا
|
يشـــب
لغيـــر
الخـــائن
المتملـــق
|
|
فكــم
ســيد
بيــن
الغيابــات
حتفــه
|
وآخـــر
بالأصـــفاد
والســـوط
مرهــق
|
|
تــرى
أدمــع
النعمــى
بنــاعم
جسـمه
|
نجيـــع
دمٍ
مـــن
جلـــده
المتمـــزق
|
|
يقضـــي
ليـــالٍ
بيــن
ظلــم
وظلمــة
|
طريــد
الكــرى
فـي
جـوف
أغـبر
مطبـق
|
|
وتمســي
نجــي
الحــزن
جــارة
بيتــه
|
ســواد
الــدجى
بالمــدمع
المــترقرق
|
|
وفــي
حجرهــا
لـو
أبصـروا
ذو
تمـائم
|
يكلمهــا
بــالعين
مــن
غيــر
منطــق
|
|
إذا
فزعـت
فـي
الخـدر
مـن
هول
ما
ترى
|
فلا
راحمـــاً
تلقـــى
ولا
عطــف
مشــفق
|
|
ودارة
عـــز
أوحشـــت
مـــن
أنيســها
|
ومــا
كــان
فيهــا
مــن
جلال
ورونــق
|
|
تحمـــل
أهلوهــا
علــى
غيــر
موعــد
|
وبــانوا
علــى
حكـم
الزمـان
المفـرق
|
|
ينــادي
لســان
الحــال
مـن
شـرفاتها
|
قفــوا
ودعونــا
قبــل
وشــك
التفـرق
|
|
ولــم
ينســها
التوديــع
موقـف
شـامت
|
يقلــب
فــي
الغــادين
أجفــان
محنـق
|
|
ومـــا
ملهــم
فيهــا
ثــواءٌ
وإنمــا
|
نجــوا
بـالنوى
مـن
ظلـم
أرعـن
أحمـق
|
|
ينــاديه
فينــا
قــائد
الجيـش
قـومه
|
ومـــا
قــادهم
إلا
إلــى
شــر
مــأزق
|
|
تســــف
بالأحكــــام
غيــــر
موفـــق
|
ومـــا
ظـــالم
فـــي
حكمــه
بموفــق
|
|
فكـم
سـاق
مـن
مصـرٍ
إلـى
المـوت
فتيةً
|
زهاهــا
الصــبا
فــي
عنفــوان
وريـق
|
|
جمـــوع
كآجـــال
النعـــام
تلفهـــا
|
يــد
القهــر
للآجــال
مــن
كـل
منعـق
|
|
لـــه
عصـــب
فــي
غورهــا
وصــعيدها
|
تخيـــر
أبنـــاء
الشـــباب
وتنتقــي
|
|
ففـــي
كـــل
إقليـــمٍ
حجــول
مقيــدٍ
|
لغيــــر
عصــــيٍّ
أو
حبـــال
مربـــق
|
|
وفـــي
كــل
وادٍ
منهــم
ســوط
معجــل
|
بهــــدد
بالتنكيــــل
كـــل
معـــوق
|
|
ومـن
لـم
يسـقه
السـوط
والسـيف
سـاقه
|
إلــى
حيــث
شــاءوا
جهـد
عيـش
مرمـق
|
|
ومـــا
أجـــدبت
مصـــرٌ
ولا
ز
أهلهــا
|
مــن
النيــل
عيــش
النـاعم
المتفنـق
|
|
ولا
ضــاق
لــولا
كيــدهم
حــوض
سـينها
|
ولا
شــــرقت
أرض
العــــراق
بمشـــرق
|
|
يـرى
المـوت
هـذا
بيـن
عينيه
إذا
يرى
|
أخــاه
هــوى
فــي
المصــرع
المتضـيق
|
|
فهـــذا
فريـــق
فـــي
التلال
مصـــرعٌ
|
وذلــــك
فـــوق
الأمعـــز
المتوهـــق
|
|
يجـــرع
هـــذا
حتفـــه
كـــل
مصــبح
|
ويكــرع
ذاك
المــوت
فــي
كــل
مغبـق
|
|
وكــم
ثــم
خــدٍّ
فــي
الــتراب
معفـر
|
إلـــى
حـــر
وجــه
بالشــواظ
محــرق
|
|
تســــائل
عنـــه
أمـــه
أيـــن
داره
|
ويــذري
أبــوه
الـدمع
فـي
كـل
مهـرق
|
|
ويســـألنا
أبنـــاؤه
عـــن
معـــاده
|
بنـــي
بــه
يــوم
المعــاد
ســنلتقي
|
|
ففـــي
كـــبيتٍ
صـــوت
ثكلــى
مرنــة
|
وتحنـــان
بـــاكٍ
بالأســـى
متمنطـــق
|
|
بلاء
علـــى
القطريـــن
أغطــش
ليلــه
|
ضـــحى
يــوم
نحــس
بــالخطوب
مــؤوق
|
|
دجـــت
يـــوم
إعلان
الحمايــة
شمســه
|
فيــا
لــك
مــن
يـوم
علـى
مصـر
أورق
|
|
بــه
لقحــت
ســود
الليــالي
فليتــه
|
قضــى
فــي
بطــون
الغيـب
لـم
يتخلـق
|
|
قضــينا
بــه
يــوم
المــدله
بالأســى
|
وبتنــا
علــى
ليــل
السـليم
المـؤرق
|
|
عشـــية
يـــدعو
مكســـويل
ســـراتها
|
لعيــدين
يــوم
الجمــع
يـوم
التفـرق
|
|
يبــوئ
عــرش
النيـل
مـن
شـاء
جانفـاً
|
فننشـــده
والخطــب
بــالخطب
يلتقــي
|
|
رويـــدك
حــتى
تنظــري
عــم
تنجلــي
|
غيابـــة
هـــذا
العـــارض
المتــألق
|
|
فمــن
دون
عــرش
النيــل
كــل
مــدرب
|
كمــي
مــتى
يرعــد
لـه
الهـول
يـبرق
|
|
بصــير
بأســباب
الــردى
غــرب
سـيفه
|
لبــوس
المنايــا
بيــن
هــام
ومفـرق
|
|
ثــوت
نفســه
مــن
بأســه
فــي
مجنـة
|
مــتى
يـدن
منهـا
طـائف
المـوت
يصـعق
|
|
كـــأن
حصـــون
الـــدردنيل
ضـــمنها
|
علــى
الــدهر
فـي
عهـد
مصـون
وموثـق
|
|
فــأبلغ
بنــي
التـاميز
عنـا
وحلفهـم
|
ببـــاريس
أنبــاء
النــذير
المصــدق
|
|
عشـــية
يحـــدون
الأســـاطيل
شـــرعاً
|
علـى
اليـم
تحبـو
فـي
الحديـد
المطبق
|
|
تشـــن
علـــى
دار
الخلافـــة
غـــارةً
|
مـن
البحـر
إن
تقـرع
بهـا
الدهر
يفرق
|
|
كــأن
الســحاب
الجـون
يحمومهـا
سـما
|
علــى
الجـو
فـي
داجٍ
مـن
النـق
مطبـق
|
|
كـــأن
جبـــالاً
ســـيرت
فـــوق
لجــة
|
تـــداعين
شـــتى
بيـــن
جــون
وأزرق
|
|
تألفنبالعــــدوان
يجريـــن
باســـمه
|
إلــى
غــرض
فــي
مـدحض
الهـون
مزلـق
|
|
ســرين
علــى
بــرق
مـن
الـرأي
كـاذب
|
لمعتســـف
عــارٍ
مــن
الحــزم
أحمــق
|
|
فــأقبلن
فــي
شـمل
مـن
البغـي
جـامع
|
وعــــدن
بشـــمل
بـــالهوان
مفـــرق
|
|
لقحـــن
بأســـباب
الخـــراب
وإنمــا
|
لقيــن
بهــا
حتــف
الولــود
المطـرق
|
|
ومــن
يتحــرض
بــالردى
يكـرع
الـردى
|
زعافــاً
ومــن
يتنبــث
النــار
يحـرق
|
|
نصــبنا
لهــم
فــي
كــل
جــو
خـبيئةً
|
تصـــب
عليهـــم
كــل
شــعواء
خيفــق
|
|
وقمنــا
لهــم
فــي
مرتقـى
كـل
تلعـةٍ
|
بكــــل
ملــــئ
بـــالردى
متفيهـــق
|
|
فبــاتوا
علــى
نــار
شـببنا
شـواظها
|
فكــانت
عليهــم
غيــر
نــار
المحلـق
|
|
كـــأن
بنـــي
شـــيبان
يـــوم
أوارة
|
بمـــا
كســبوا
يصــلون
نــار
محــرق
|
|
ســقوا
بأسـنا
صـرفاً
فهـم
بيـن
طـائح
|
علــى
المــوج
صــالٍ
بـالجحيم
ومغـرق
|
|
وطــــود
تشـــطى
خاشـــعاً
متصـــدعاً
|
علـــى
إثـــر
طـــود
واجــب
متفلــق
|
|
كـــؤوس
أدرناهـــا
ســـجالاً
عليهـــم
|
تناســوا
بهــا
طعـم
الشـراب
المـروق
|
|
رأوا
ذنـــب
العيــوق
أهــون
مطلبــاً
|
وأيســر
مرقــىً
مــن
فــروق
لمرتقــى
|
|
هنالــك
لمــا
ضـل
فـي
البحـر
كيـدهم
|
وصــاروا
إلــى
كيـد
الضـعيف
المحمـق
|
|
تــداعوا
بجــرار
علــى
الــبر
زاخـر
|
يـــزوف
مـــدلّا
فـــي
صــفيح
وبنــدق
|
|
لـه
زجـر
يغشـى
بـه
العصـم
فـي
الذرى
|
وبــأسٌ
مــتى
ينـذر
بـه
النجـم
يصـدق
|
|
فلمــا
التقينــا
والمنايــا
جــواثمٌ
|
تطـــالعهم
مـــن
كــل
شــعب
وخنــدق
|
|
دلفنــا
إليهــم
كوكبــاً
خلــف
كـوكب
|
وجاشــوا
إلينــا
فيلقــاً
بعـد
فيلـق
|
|
فمــا
خيمــوا
حــتى
كســونا
سـماءهم
|
بأســود
مــن
نســج
القنابــل
عوهــق
|
|
دجــا
فاســتكانوا
تحتــه
بيـن
حـائر
|
يشـــق
بعينيـــه
الســـماء
ومطـــرق
|
|
وإن
يســــتغيثوه
يغـــاثوا
وإنمـــا
|
بـــذي
لهــب
يشــوي
الوجــوه
محــرق
|
|
طغـــت
نارنــا
فيهــم
فمــا
لمغــرب
|
مـــن
النـــار
منجـــاة
ولا
لمشـــرق
|
|
يـــودون
لـــو
أن
الســـماء
تشــققت
|
لهـــم
طرقـــاً
هيهــات
لــم
تتشــقق
|
|
فمــا
إن
تـرى
إلّا
صـريعاً
علـى
الـثرى
|
وملتهبـــاً
يقفـــو
مصـــاباً
بــأولق
|
|
ومختبطــاً
فــي
الــدو
يركــب
رأســه
|
ضــلالاً
ومــن
يســتكبر
الهــول
يخــرق
|
|
يقــول
أنـج
سـعد
بـالهوان
فقـد
هـوى
|
ســـعيد
وحـــاق
البـــأس
بــالمتعوق
|
|
وكوكبـــة
يعـــدو
الفــرار
بخيلهــا
|
إلــى
البحــر
بالإدبـار
للنـار
تتقـي
|
|
إذا
البحـر
لـم
يعصـم
مـن
الحين
جنده
|
فهيهــات
أينجـي
عـائذ
الـبر
أو
يقـي
|
|
وأخـــرى
تولاهـــا
الغــرور
فأقــدمت
|
لمهلكهــــا
ملمومـــةً
لـــم
تفـــرق
|
|
غــدت
تســتجم
البــأس
فانســطرت
بـه
|
هنالــك
فــي
لــوح
الفنــاء
المنمـق
|
|
ســعرنا
لهــا
فـي
عـش
بابـاً
وأختهـا
|
جهنــم
يصــلى
نارهــا
كــل
مـن
شـقى
|
|
تركنــا
عتــاق
الطيــر
فـي
حجراتهـا
|
تخطـــف
منهـــم
كـــل
شـــلوٍ
ممــزق
|
|
فكــانت
جــزاء
الظـالمين
مضـوا
بهـا
|
كــذلك
نجــزي
منهــم
كــل
مــن
بقـى
|
|
ومستأســـرٍ
بالـــذل
يرفـــع
نحونــا
|
أكــــف
منيــــب
بـــالهوان
مطـــوق
|
|
تربـــع
فــي
ظــل
مــن
العفــو
وارفٍ
|
لــــدينا
وعهـــدٍ
بالأمـــان
موثـــق
|
|
وبـــات
طليقــاً
فــي
الإســار
تحفــه
|
مكارمنــــا
كالسلســــبيل
المصـــفق
|
|
وأصــبح
مــن
ولــى
يــود
لــو
أنــه
|
أســيرٌ
لــدينا
عانيــاً
غيــر
مطلــق
|
|
فــإن
أزعقــوا
بالــدردنيل
مشــارباً
|
فقـد
صـدروا
فـي
مصـر
عـن
حـوض
مزعـق
|
|
تبصــر
خليلــي
هــل
تـرى
مـن
كتـائب
|
دلفــن
بهــا
كالســيل
مـن
كـل
مـودق
|
|
ســراعاً
إلــى
الحانـات
تحسـبهم
بهـا
|
نعامـــاً
تمشـــى
رزدقــاً
خلــف
رزدق
|
|
بهولـــك
مرآهــا
إذا
اصــطخبت
بهــم
|
مـــواخير
تجلـــو
فاســـقات
لفســـق
|
|
إذا
أجلبــوا
فيهــا
حســبت
جنادبــاً
|
تجــاوبن
إيقاعــاً
علــى
صــوت
نقنـق
|
|
كـــأن
بنــي
حــام
بمصــر
تواعــدوا
|
ليجتمعـــوا
مــن
بعــد
ذاك
التفــرق
|
|
زعـــانف
شـــتى
مـــن
طويــل
مشــذب
|
طــري
القــرا
عــاري
الأشــاجع
أعنـق
|
|
وملتصــــق
بـــالأرض
تحســـب
خطـــوه
|
إذا
مــر
فــي
أحيائهــا
خطــو
خرنـق
|
|
وأخنـــس
ممحــوق
الحجــاجين
ينتحــي
|
لأصـــمع
معـــروق
العـــذارين
أشــنق
|
|
وأســـود
نهـــد
الوجنـــتين
حــديثه
|
بجحفلـــة
تنهــال
عــن
شــدقٍ
أفــوق
|
|
تــرى
منـه
فـي
بحبوحـة
الأمـن
باسـلاً
|
وإن
يــدع
الــداعي
إلـى
الكـر
يحبـق
|
|
ويحســب
إن
صــرت
مــن
الفــزع
إسـته
|
مطــــارة
طيــــار
عليــــه
محلـــق
|
|
وكــائن
طــوى
عنهـم
طـوى
مـن
حـوادث
|
مــن
الخــزي
ســارت
بيـن
مصـر
وجلـق
|
|
عشــية
راحــوا
ألــف
ألــف
يقودهــا
|
إلــى
حتفهــا
جهــل
الزنيـم
الحفلـق
|
|
تــرى
كــل
ألــف
منهــم
قــرن
واحـد
|
وقــد
علقــوا
مــن
خــوفه
كـل
معلـق
|
|
فمــا
لبثــوا
أن
أرزم
المـوت
بينهـم
|
بداهيـــةٍ
مـــن
حـــول
غــزة
بهلــق
|
|
فـإن
أقبلـوا
طـاحوا
وإن
أدبروا
فنوا
|
وإن
أبقــــوا
فالويــــل
للمتـــأبق
|
|
ومــا
كـان
جيـش
الشـام
إذ
ضـل
كيـده
|
بأشـــأم
مـــن
جيــش
هنالــك
معــرق
|
|
تركنــا
لهــم
سـيف
العـراق
ليشـهدوا
|
ببغـــداد
كيـــد
الحــارش
المتنفــق
|
|
فمـــا
وطئوا
بغــداد
حــتى
تــبينوا
|
وجـــوه
الــردى
أو
ذي
إســار
محلــق
|
|
غــداة
حزقنــا
تاوشــيد
فلــم
يــرم
|
ومـــادت
بمــود
كــل
ميثــاء
ســملق
|
|
عجبــت
لهــم
إذا
ينشـر
الـبرق
عنهـم
|
علــى
النـاس
أنبـاء
الكـذوب
المنفـق
|
|
ومـاذا
عليهـم
لـو
أنـابوا
إلى
النهى
|
فلـــم
يأتفـــك
غــاوٍ
ولــم
يتخــرق
|
|
فللحــق
نــور
كلمــا
ائتلــق
ازدهـى
|
وللبطــل
بــرق
حيثمــا
يــزه
يزهــق
|
|
ألـم
تـر
كيـف
استأصـل
الـروس
بغيهـا
|
ومزقهــــا
العـــدوان
كـــل
ممـــزق
|
|
إذا
احتقبــوا
بـأس
الجهـول
فـأقبلوا
|
مســـير
الــدجى
بالبــاعق
المتــدفق
|
|
جــراداً
يســد
الأرض
مـن
مـدرج
الصـبا
|
إذا
حيـــث
دب
الأرض
بالنســر
يلتقــي
|
|
إذا
ســاحة
لــو
أقســم
الجــن
أنــه
|
دان
مــن
ذراهــا
خلســةً
لــم
يصــدق
|
|
ولــو
أن
طيفـاً
مـن
عـداها
هفـا
بهـا
|
لعـــد
مــن
الأســرى
إذا
لــم
يمــزق
|
|
هنــاك
لقــوا
مــن
خيلنـا
كـل
مقـرم
|
مشـــوق
إلــى
لحــم
الأعــادي
متــوق
|
|
تقـــذفهم
بيـــن
المتــالع
والربــى
|
ونلقــى
بهــم
مــن
كــل
حصـنٍ
وجوسـق
|
|
فمـــا
وردوا
أرمينيــا
غيــر
أنهــم
|
رأوا
حلمـــا
تـــأويله
لـــم
يحقــق
|
|
ومــالوا
عــن
القوقــاز
ميلـة
هالـك
|
رمتــه
المرامــي
بالصــفيح
المــذلق
|
|
ســقيناهم
كأســاً
دهاقــاً
مـن
الـردى
|
وإنــا
مــتى
مـا
نسـق
بالكـأس
نـدهق
|
|
وصـــب
عليهــم
ليــث
برليــن
غضــبةً
|
ســـقاهم
بهــا
مســمومةً
لــم
تــروق
|
|
فمــن
مــأزق
فــي
ملتقـى
الكـر
ضـيق
|
إلــى
درك
فــي
منــق
المــوت
أضــيق
|
|
كــأني
بهــم
يــوم
البحيــرات
كبهـم
|
بهـــاجيش
هنــدبرج
مــن
كــل
مزلــق
|
|
جنــود
تــروع
الليـل
أنزلهـا
الـردى
|
ضــيوفاً
علـى
الحيتـان
فـي
شـر
فنـدق
|
|
تغــوص
وتطفــو
فـي
العـاب
ومـن
يخـض
|
عبابــاً
بــه
لا
يحــذق
العــوم
يغـرق
|
|
وأخــرى
صــلوها
بيــن
ريغــا
وجوهـا
|
مؤججــــةً
تزهـــو
بنكبـــاء
ســـوهق
|
|
فلــم
يغنهــم
شـيئاً
نقـولا
وقـد
جـرى
|
علــى
نهــج
أعمـى
فـي
المغـار
ملفـق
|
|
ولــم
ينجهــم
أن
قــام
بـالأمر
قيصـر
|
مقـــام
دعــيٍّ
فــي
القيــادة
ملصــق
|
|
وشـتان
مـا
بيـن
الخمسـين
فـي
الـوغى
|
إذا
الحــرب
جــدت
فــي
مضـيق
ومـدعق
|
|
فــذا
ســعيه
بــالعلم
فينــا
مــورق
|
وبالجهــل
هــذا
ســعيه
ســعي
مــورق
|
|
إذا
شــاد
رب
التــاج
بــالعلم
ملكـه
|
فقـل
يـا
سـماء
الملـك
بـالعز
غيـدقي
|
|
وإن
تـــر
شــعباً
بالجهالــة
ســابحاً
|
فقـــل
لعـــداه
رمــد
الضــأن
ريــق
|
|
هـوى
الـروس
فـي
درك
الجهالة
فانمحوا
|
ومــن
لـم
يسـالم
دولـة
العلـم
يمحـق
|
|
فلمـــا
رأوا
أن
الفنـــاء
ســـبيلهم
|
وأعجزهـــم
مـــن
درئه
حمـــل
مقلــق
|
|
إذا
خلصــوا
مــن
خيــل
ممــسٍ
دهتهـم
|
أحــاطت
بهــم
مـن
خلفهـم
خيـل
مشـرق
|
|
رضـوا
بـالتي
لا
يرتضـي
السـيف
غيرهـا
|
ومــن
يعــص
أحكــام
الظبــا
يتمــزق
|
|
وراح
أثيمـــاً
عنـــدهم
كـــل
مقــدم
|
وعـــد
كريمـــاً
بيهـــم
كـــل
عــوق
|
|
فيــا
حلفــاء
الــروس
يــوم
تـألبوا
|
وجــاءوا
بــرأي
فــي
السـفاهة
معـرق
|
|
وظنــوا
بــبرلين
الظنــون
فأمســكوا
|
بحبـــل
علــى
ميــت
الأمــاني
معلــق
|
|
هــل
الحــرب
إلا
مــا
علمتــم
وذقتـم
|
ومـــاهو
عنهـــا
بالحــديث
المــزوق
|
|
عــدوا
طــورهم
مـا
كـل
بيضـاء
شـحمة
|
ومــا
كــل
وثـاب
إلـى
النيـق
يرتقـي
|
|
رمــاهم
بمجــر
أصــغر
الأرض
فــانبرى
|
علـــى
خطــط
فــوق
الســحاب
وأطــرق
|
|
يــدك
الجبــال
الشــم
إن
عرضــت
لـه
|
بنــار
مــتى
يرجـم
بهـا
الشـم
يسـحق
|
|
ويخلــق
فــي
الـترب
الجبـال
عواتيـاً
|
علــى
كــل
مــوهٍ
للقــوى
جــد
مخلـق
|
|
ويرســـلها
فـــوق
العبـــاب
وتحتــه
|
مـــواخر
تزجـــي
بيــن
جمــع
وفــرق
|
|
فــإن
ذكــرت
بــاريس
غوثــاً
تزلزلـت
|
وإن
يــذكر
التــاميز
زبليــن
يحبــق
|
|
ولــو
علمــوا
عقــابهم
مــا
تورطـوا
|
لنصــر
غــواة
الضــرب
فـي
شـر
مـودق
|
|
أصـاخوا
إلـى
داعـي
الغـرور
فأسـرعوا
|
إلـــى
فتــح
بــاب
للمكــاره
مغلــق
|
|
لكـــل
ســـفير
منهـــم
صــوت
مرعــد
|
بـــبرلين
يـــدعو
بــالثبور
ومــبرق
|
|
يــــؤزره
مــــن
خلفــــه
متعمــــق
|
بحجــــة
ذاك
الملحــــف
المتعمــــق
|
|
فمستأســــد
يـــبري
إلـــى
متنمـــر
|
ومعتســــف
يــــأوي
إلـــى
متعســـق
|
|
ولـو
سـمعوا
أمـر
النهـى
مـا
تسـمعوا
|
مقالــة
ألــوى
فــي
الخصــومة
ألـوق
|
|
سينســون
أطماعــاً
عليهــا
تعــاقروا
|
عــذاب
المنــى
مشــمولةً
لــم
ترنــق
|
|
إذ
الشــرق
فيهــا
بينهـم
نهـب
غـالب
|
مـتى
يعتقـد
رهنـاً
علـى
الشـرق
يغلـق
|
|
يقلبـــه
مـــوج
المطـــامع
بينهـــم
|
كمــا
اعتســفت
هــوج
الريـاح
بـزورق
|
|
وتحمـــل
أهليـــه
علــى
كــل
مــذهب
|
شــريعة
الاســتعمار
فــي
كــل
موبــق
|
|
فمــن
لــم
يكرمــه
الإبـاء
يـدن
لهـا
|
ذليلاً
ومـــن
يـــأب
المذلـــة
يرهــق
|
|
شـــريعة
جــود
لــم
يخنــا
رســولها
|
بمعجــــز
وحـــى
أو
كتـــاب
مصـــدق
|
|
ولكنهـــا
إرهــاق
قــوم
هــوت
بهــم
|
يــد
الــدهر
أو
تأييــد
حــق
ملفــق
|
|
بلاد
أذل
اللَــــه
بالجهـــل
أهلهـــا
|
وذو
الجهــل
مـن
حـوض
المذلـة
يسـتقي
|
|
تقســــم
كالنفـــال
بيـــن
معاشـــر
|
تنـــادوا
إليهــا
فــي
عديــد
ودردق
|
|
فهــذي
لهــا
فــي
المغربيــن
مصـالح
|
وتلــك
لهــا
حــق
علــى
كــل
مشــرق
|
|
وهـــذي
لهـــا
أرض
الجــزائر
نحلــةً
|
ومــا
كيـد
أخـرى
فـي
البـوير
بمخفـق
|
|
وإن
ســبقت
هــذي
إلــى
الهنـد
غيلـةً
|
تصــل
بــأرض
الســند
أخــرى
فتلحــق
|
|
وإن
هجســــت
بالصـــين
أحلام
طـــامع
|
فــــرب
رؤىً
مــــرت
ولـــم
تتحقـــق
|
|
وهــذي
لهــا
فـي
الشـام
بعـض
مرافـق
|
وتلــك
لهــا
فــي
أختــه
كــل
مرفـق
|
|
فســائل
بنــا
أعلاج
لنــدن
هـل
وفـوا
|
بعهـــد
لنــا
بيــن
الأنــام
وموثــق
|
|
لـدى
فتنـة
لـم
يغـن
عـن
مصـر
عنـدها
|
حميــــة
حــــام
أوتقيــــة
متقـــي
|
|
جــرت
عممــاً
لــم
تبـق
أرضـاً
أمينـةً
|
ولا
بلــــداً
بناؤهـــا
لـــم
يحـــرق
|
|
فـــأجلب
أهلونـــا
لهـــا
وتفرقــوا
|
بهـــا
شـــيعاً
والويـــل
للمتفـــرق
|
|
عصى
الجيش
فيها
صاحب
العرش
فالتوى
ال
|
قرينــان
فــي
حبـل
مـن
الشـرف
موثـق
|
|
ولــو
رحــم
الحــرب
العرابــي
قـومه
|
لفــاد
إلــى
راي
مــن
الحــزم
أصـدق
|
|
ولكنــه
الجــد
العثــور
هــوى
بنــا
|
لشـــؤم
احتلال
فـــي
الضــلالة
موبــق
|
|
ثلاثيـــن
عامــاً
لاتــرى
مصــر
منهــم
|
ســـوى
صـــلف
المســـتكبر
المتعــزق
|
|
ثلاثيــن
عامــاً
لــم
تشـم
بـرق
راحـةٍ
|
ولا
طيــب
مخضــر
مــن
العيــش
غيــدق
|
|
ثلاثيـــن
عامــاً
بيــن
يــأس
وحســرةٍ
|
وهـــول
زمـــان
بـــالحوادث
متـــأق
|
|
إذا
ودعــت
عامــاً
منــالجور
أبقعــا
|
تفيــء
إلــى
عــام
مـن
البـؤس
أبلـق
|
|
ثلاثيـــن
عامـــاً
بــالهوان
تســومها
|
ســفاهة
غــارٍ
فــي
المكايــد
مغــرق
|
|
يــرى
نفســه
فــوق
القـوانين
بيننـا
|
مــتى
مــا
نــذكره
القــوانين
يحنـق
|
|
يبيــح
غـداً
مـا
حـرم
اليـوم
بـالهوى
|
لغيــر
الهــوى
فــي
حكمـه
لـم
يوفـق
|
|
إلاهــــة
جبــــار
وإمــــرة
خاطـــل
|
وتــدبير
أعمــى
فــي
الحكومـة
أحمـق
|
|
إذا
مــا
شــكوناهم
عميــداً
فأمرنــا
|
لأعلــــم
منـــه
بالنكايـــة
أحـــذق
|
|
يقــــرب
خوّانـــاً
ويرفـــع
جـــاهلا
|
ويســعد
أشــقاها
ويشــفى
بـه
التقـى
|
|
إذا
مــا
مضــى
هــذا
أتـى
ذاك
بعـده
|
علــى
النهــج
لـم
يعـدل
ولـم
يـترفق
|
|
وكـــلٌّ
علينـــا
أن
نســـبح
باســـمه
|
إذا
نحــن
أهللنــا
ومــن
يعـص
بفسـق
|
|
لنــا
عنــده
حــق
الضــعيف
وعنــدنا
|
لـــه
نعمـــة
المســـتكثر
المتصــدق
|
|
يمـــن
علينـــا
بالحيـــاة
وحظنـــا
|
إلــى
ناصـل
منهـا
علـى
الجهـد
أفـوق
|
|
وبـالعلم
سـلم
دنلـوبهم
لـم
لـم
يـدع
|
ذواقـــاً
مـــن
العرفـــان
للمتــذوق
|
|
هــو
الجهــل
فينــا
حشــدته
لحكمــة
|
يـــد
اللَـــه
تنكيلاً
بشـــعب
مـــدوق
|
|
رمتنـــا
بـــه
حمـــى
أصـــابت
بلاده
|
تطـــاير
عنهـــا
كـــل
فــدم
حبلــق
|
|
فحـــل
بنـــا
فيمـــن
تمــرق
منهــم
|
فيـــا
عجبـــاً
للســـارب
المتمـــرق
|
|
ولــو
وزنــوا
فــي
غيـر
مصـر
مقـامه
|
لأرخصـــه
فـــي
الســـوم
كــل
مــدنق
|
|
فأصـــبح
داء
فــي
المعــارف
قــاتلاً
|
يســـدد
فيهـــا
كـــل
ســـهمٍ
مفــوق
|
|
فواهـا
علـى
تلـك
العقـول
الـتي
ثـوت
|
بكفيــه
فــي
لحــد
مــن
الجهـل
ضـيق
|
|
ثلاثيــن
عامــاً
يســكب
النيــل
حسـرةً
|
علــى
العلــم
دمـع
الـواله
المتشـوق
|
|
ومــا
وردوا
مــن
عــذبه
غيــر
لامــع
|
مـــن
الآل
فـــي
بيـــدائها
مـــتريق
|
|
ولــولاه
كــانت
مصــر
بــالعلم
روضـة
|
تلألأ
بــــــــالأنوار
للمتــــــــأنق
|
|
أدنلــوب
مــا
تلــك
المبـاني
رفيعـةً
|
مـتى
مـا
تسـامق
هامهـا
النجـم
تمسـق
|
|
ومــا
العلــم
أن
يعلــو
رتـاج
وقبـةً
|
علــــى
فــــدن
بـــالأرجوان
مـــزوق
|
|
أدنلــوب
هــل
أرضــيت
قومــك
غايــةً
|
أم
العيـر
إن
يبعـد
بـه
الشـوط
ينفـق
|