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رمــى
وســهام
اللَــه
فـي
نحـره
رد
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فلا
تــأس
حاطتـك
العنايـة
يـا
سـعد
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رمـى
عـن
يـدٍ
تبـت
يـدا
من
رمى
بها
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أثيــمٌ
تخطتــه
الهدايــة
والرشــد
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رمـى
عـن
يـدٍ
حـالت
يـد
اللَه
دونها
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فطـاش
عـن
المرمـى
وضـل
بـه
القصـد
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يـد
اللَـه
سـدٌّ
دون
سـعدٍ
مـن
الـردى
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منيــعٌ
ولطـف
اللَـه
مـن
فـوقه
بـرد
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وقــاه
كتــاب
اللَـه
مـا
رام
معتـدٍ
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خــؤونٌ
علــى
أحشــائه
ختـم
الحقـد
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عقـوق
لـوادي
النيـل
مـا
هـو
بابنه
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ومـا
كـان
مـن
أبنـائه
الغدر
الوغد
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عزيـز
علينـا
يـا
أبنـا
مصر
أن
نرى
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يـداً
لـك
بالعـدوان
مـن
مصـر
تمتـد
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فمــا
ذلــك
القـاني
بصـدرك
جاريـاً
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لــه
أرجٌ
مـن
طيبـه
المسـك
والرنـد
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دمٌ
هــو
ذوب
المجــد
فـي
نفـس
أمـة
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لأبنائهــا
قبـل
الـورى
كتـب
المجـد
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دمٌ
هــــو
آمـــال
كبـــارٌ
ومـــرةٌ
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جــرى
قــدماً
للَـه
فـي
حفظهـا
وعـد
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زكــيٌّ
زهـا
فـي
لوحـة
الـدهر
حليـةً
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تحلـى
بهـا
التاريـخ
فهـي
لـه
عقـد
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برئنــا
مــن
الجـاني
عليـك
بـراءةً
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يقــر
بهــا
مــن
مثلـه
الأب
والجـد
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بــراءة
قــومٍ
أنــت
عصــمة
أمرهـم
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وغيــث
أمـانيهم
إذا
احتكـم
الجهـد
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فليـــــــس
منـــــــا
أب
لا
ولا
أخ
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ولا
عصـــبةً
تحنــو
عليــه
ولا
فــرد
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ألــم
تـر
أرض
النيـل
كيـف
تزلزلـت
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وكــادت
رواسـيها
مـن
الهـول
تنهـد
|
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ألــم
تــر
أفواجــاً
إليـك
تـدافعت
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يضــيق
بهــا
هضـب
الأباطـح
والوهـد
|
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يطبـــق
أرجــاء
الفضــاء
ضــجيجها
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كمــا
يملأ
الآفــاق
إن
هــزم
الرعـد
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دعــاء
لــه
فــي
كــل
قلـبٍ
حـرارةٌ
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يهــب
لهــا
مــن
كــل
ناحيـةٍ
صـهد
|
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لــه
نبـأ
فـي
الفجـر
دون
احتمـاله
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تسـاوي
الجبـان
النكس
والبطل
النجد
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وفـي
الخطب
ما
يأتي
على
نجدة
الفتى
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ولــو
أنــه
فــي
مســكه
أســدٌ
ورد
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فــإن
يـأس
أبنـاء
البلاديـن
فالأسـى
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لـه
فـي
فـؤاد
الملـك
مـن
شـفق
وقد
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حمــدنا
لملــك
النيـل
حسـن
صـنيعه
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وللملــك
المحبــوب
يرتجــل
الحمـد
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بنــى
ملكــه
فخمــاً
علـى
ود
قـومه
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كــذاك
عـروش
الملـك
يرفعهـا
الـود
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وأنزلهــم
فــي
روضــة
مــن
شـمائل
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تـوالى
بهـا
الإحسـان
والكـرم
العـد
|
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ولــم
يحتفــل
بالعيـد
بـرّاً
بشـعبه
|
فلا
حفــل
فــي
عيــدٍ
لـديه
ولا
حشـد
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فطـب
يـا
أبا
الفاروق
بالعرش
ثابتاً
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وبالملـك
يـدعو
باسمه
الغور
والنجد
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وقـالوا
أصـاب
الـدهر
سعداً
ومادروا
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بــأن
الليــالي
تحــت
رايتـه
جنـد
|
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وحاشــى
يخــون
الـدهر
زينـة
أهلـه
|
وأصـفى
ذوي
الألبـاب
قلبـاً
إذا
عدوا
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وأوفــى
بنــي
مصــرٍ
وأوفرهـم
حجـاً
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وأصــدقهم
عهــداً
إذا
نقــض
العهـد
|
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كفــى
اللَـه
رعنـاء
الحـوادث
عبـده
|
فلــم
يربيــن
القـاديحن
لهـا
زنـد
|
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نجــا
خيـر
مـن
أحيـا
أمـاني
قـومه
|
وأنعشــهم
مـن
بعـد
مـا
عـثر
الجـد
|
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ونــادى
أســاة
الحــي
مـرت
سـليمةً
|
وحــاقت
براميهـا
الندامـة
والبعـد
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جـزى
اللَه
بالحسنى
بنى
الطب
أقبلوا
|
سـراعاً
فـرد
والضـر
عنـه
بمـا
ردوا
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يمــدون
راحـاً
يسـبق
الـبرء
لمسـها
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ألا
ســلمت
راحٌ
إليــه
بهــا
مــدوا
|
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مـع
اللَـه
فـي
ركـب
السـلامة
يا
سعد
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يســايره
بــاليمن
طالعــك
الســعد
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نـــودعه
والــدمع
بالشــوق
معــرب
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وفــي
كــل
قلــبٌ
مــن
تلهبـه
وجـد
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قلــوب
وقفناهــا
علــى
حـب
شـيخها
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وفـــاءً
فلا
هنــدٌ
هواهــا
ولا
دعــد
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ولكـــن
هواهـــا
أن
يتــم
شــفاؤه
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ونلقاه
في
نعمى
إذا
ما
انطوى
البعد
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فسـر
فـي
ذمـام
اللَـه
ترعـاك
عينـه
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علـى
خيـر
حـال
مـا
تروح
وما
تغدوا
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عرفنــاك
ألقينــا
لــك
الأمـر
كلـه
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لـك
الصـدر
المحمـود
من
قبل
والورد
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فـإن
سـنحت
يـا
سـعد
سـانحة
المنـى
|
فليــس
يضــيع
الحـزم
سـانحةً
تبـدو
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ومـن
لـم
يفـز
بالـدر
والبحـر
جازرٌ
|
يفتـــه
إذا
غشــى
ســواحله
المــد
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وإن
كــانت
الأخــرى
فلا
تــأس
إننـا
|
عرفنــا
الليـالي
والأمـور
لهـا
حـد
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