|
يــا
للرجــال
لجــرح
ليــس
يلـتئم
|
عمــر
الزمــان
وداء
ليــس
ينحســم
|
|
حــتى
مــتى
أيهــا
الأقـوام
والأمـم
|
الحـــق
مهتضـــم
والــدين
مخــترم
|
|
وفيـــــء
آل
الرســــول
مقتســــم
|
|
أودى
هــدى
النـاس
حـتى
إن
أحفظهـم
|
للخيــر
صــار
بقـول
السـوء
لفظهـم
|
|
فكيــف
تــوقظهم
إن
كنــت
مــوقظهم
|
والنــاس
عنــدك
لا
نــاس
فيحفظهــم
|
|
ســـوم
الرعــاة
ولا
شــاء
ولا
نعــم
|
|
يـا
ليـت
شـعري
أيـدري
مـن
تعرقنـي
|
بعـــذله
وبطـــوق
الهـــم
طــوقني
|
|
ونــام
عـن
ليـل
أو
صـابي
وأقلقنـي
|
أنــي
أبيــت
قليــل
النـوم
أرقنـي
|
|
قلــب
تصــارع
فيــه
الهـم
والهمـم
|
|
ألقـى
الليـالي
وقـد
آلـت
غياهبهـا
|
أن
لا
تـــروح
ولا
تغـــدو
كواكبهــا
|
|
بهمـــة
يســـتبيح
الهــم
قاضــبها
|
وعزمــة
لا
ينــام
الليــل
صــاحبها
|
|
إلا
علـــى
ظفـــر
فــي
طيــه
كــرم
|
|
قــالوا
أيرضــى
لــه
عـادي
منصـبه
|
بصـــون
صــارمه
الماضــي
وســلهبه
|
|
فقلـــت
كلا
أمـــري
غيـــر
مشــتبه
|
يصــان
مهــري
لأمــر
لا
أبــوح
بــه
|
|
والـدرع
والرمـح
والصمصـامة
الخـذم
|
|
وســـابقات
جيـــاد
ليــس
يفضــحها
|
مهارهـــا
يــوم
مجراهــا
وقرحهــا
|
|
لنـــا
ذراهــا
وللأعــداء
مــذبحها
|
وكـــل
مــائرة
الضــبعين
مســرحها
|
|
رمــث
الجزيــرة
والخـذراف
والعنـم
|
|
تـاللَه
إن
بنـي
العبـاس
قـد
كفـروا
|
يـا
ويلهـم
نعـم
البـاري
وما
شكروا
|
|
فكـم
عمـود
لفسـطاطا
الهـدى
كسـروا
|
يــا
للرجــال
أمــا
اللَــه
منتصـر
|
|
مــن
الطغــاة
ومــا
للـدين
منتقـم
|
|
تعرقــــوا
آل
حــــرب
ف
وجـــارهم
|
حرصـاً
علـى
الملـك
لا
أخـذاً
بثـارهم
|
|
وأصــبحت
خيفــة
مــن
صــر
نــارهم
|
بنــو
علــي
رعايــا
فــي
ديــارهم
|
|
والأمــر
يملكــه
النســوان
والخـدم
|
|
مفرقيـــــــن
فلا
دار
مجمعـــــــةٍ
|
وخــــائفين
فلا
أمــــن
ولا
دعــــة
|
|
فكيـــف
تعـــذب
لصـــادين
مشــرعةٌ
|
والأرض
إلا
عــــرى
ملاكهــــا
ســـعة
|
|
والمـــال
إلا
علــى
أربــابه
ديــم
|
|
يــا
للحميــة
هـذا
الحـادث
الجلـل
|
أيصـــبح
العــل
للأوغــاد
والنهــل
|
|
وعـــترة
المصــطفى
والســادة
الأول
|
محلئون
فأصــــفى
شــــربهم
وشـــل
|
|
عنــد
الــورود
وأوفـى
وردهـم
لمـم
|
|
فقـــل
لأعـــدائها
اللائي
تحاربهــا
|
علــى
العلـى
وهـو
تـاج
لا
يناسـبها
|
|
ويزدهــي
مــن
حواهـا
وهـم
غاصـبها
|
للمتقيـــن
مــن
الــدنيا
عواقهــا
|
|
وأن
تعجــل
منهــا
الظــالم
الأثــم
|
|
لقـد
فشـا
فـي
بنـي
المختـار
نسكهم
|
كمـا
نشـا
فـي
بنـي
العبـاس
إفكهـم
|
|
فقــال
مــن
كــان
لا
يحـويه
سـلكهم
|
لا
يطغيـــن
بنــو
العبــاس
ملكهــم
|
|
بنــو
علــي
مــواليهم
وإن
رغمــوا
|
|
بنــوا
نثيلــة
لا
واللَــه
مـا
لكـم
|
فخــر
علــى
معشــر
كـانوا
جمـالكم
|
|
لـــو
أنقيتـــم
وجــانبتم
ضــلالكم
|
أتفخـــرون
عليهـــم
لا
أبــا
لكــم
|
|
حـــتى
كــأن
رســول
اللَــه
جــدكم
|
|
كـانوا
بـدوراً
بهـا
الظلمـاء
تنكشف
|
وأبحــراً
بالنــدى
راحاتهــا
تكــف
|
|
فكيــف
تحكــونهم
والحــال
مختلــف
|
ومــا
تــوازن
يومــاً
بينكــم
شـرف
|
|
ولا
تســاوت
بكــم
فــي
مــوطن
قـدم
|
|
لـم
يحـك
سـفاحهم
لـو
جـانب
الخطلا
|
زيــن
الــورى
كلهـم
علمـاً
ولا
عملا
|
|
وليـــس
منصــورهم
كالبــاقرين
علا
|
ولا
الرشــيد
كوسـى
فـي
القيـاس
ولا
|
|
مـأمونكم
كالرضـى
لـو
أنصـف
الحكـم
|
|
أفاضـــل
ربهـــم
اللَـــه
فضـــلهم
|
فاختــارهم
للهــدى
والعلـم
حملهـم
|
|
وبالخلافـــة
دون
النـــاس
يجلهـــم
|
قـام
النـبي
بهـا
يـوم
الغـدير
لهم
|
|
واللضـــه
يشـــهد
والأملاك
والأمـــم
|
|
فكــان
مـا
كـان
مـن
تضـييع
واجهـا
|
بعــد
النــبي
ومـن
تـأخير
طالبهـا
|
|
إرثــاً
وحقــاً
ومـن
تقـديم
غاصـبها
|
حــتى
إذا
أصـبحت
فـي
غيـر
صـاحبها
|
|
بــاتت
تنازعهــا
الـذؤبان
والرخـم
|
|
مــا
أحســنوا
بــولي
اللَــه
ظنهـم
|
فضـــيعوها
وقـــد
كـــانت
مجنهــم
|
|
وشـــاركوا
حرهـــم
فيهــا
وقنهــم
|
وصـــيرت
بينهـــم
شـــورى
كــأنهم
|
|
لا
يعرفـــون
ولاة
الأمــر
أيــن
هــم
|
|
يــا
ليــت
شـعري
لا
يـدرون
موقعهـا
|
أم
لا
يــرون
بعيــن
العقـل
مطلعهـا
|
|
أم
كافــل
الملــة
الغــراء
ضـيعها
|
تــاللَه
مــا
جهـل
الأقـوام
موضـعها
|
|
لكنهــم
ســتروا
وجـه
الـذي
علمـوا
|
|
رياســـة
أظهـــرت
للنــاس
خبثهــم
|
وأهلكـــت
نســـل
أقــوام
وحرثهــم
|
|
فاجتــاحهم
عــادل
لـم
يـرض
مكثهـم
|
ثــم
ادعاهــا
بنـو
العبـاس
إرثهـم
|
|
ومــا
لهــم
قــدم
فيهــا
ولا
قــدم
|
|
إذا
تمــادى
مجـال
الفخـر
وابتـدرت
|
بنــو
علــي
إلا
الغايــات
وافتخـرت
|
|
رأيــت
منهــم
زرافــات
وإن
كــثرت
|
لا
يــذكرون
إذا
مــا
بيعــة
ذكــرت
|
|
ولا
يحكـــم
فــي
أمــر
لهــم
حكــم
|
|
قـالوا
لنـا
الملـك
حقـاً
لا
نجـانبه
|
يومـــاً
وطـــالعه
فينــا
وغــاربه
|
|
ومــا
ترعــرع
فيهــم
مــن
يناسـبه
|
ولا
رآهـــم
أبـــو
بكـــرٍ
وصــاحبه
|
|
أهلاً
لمـا
طلبـوا
منهـا
ومـا
زعمـوا
|
|
قــالوا
الأئمــة
كـانت
غيـر
غاصـبةً
|
خلافــــةً
ثـــم
ثنوهـــا
بكافيـــة
|
|
دعــوى
الــتراث
سـهام
غيـر
صـائبةٍ
|
فهــل
هــم
مــدعوها
غيــر
واجبــةٍ
|
|
أم
هــل
أئمتهـم
فـي
أخـذها
ظلمـوا
|
|
لقــد
نشـرت
علـى
الـدنيا
صـبابتكم
|
بغيـــاً
وروعتــم
فيهــا
عصــابتكم
|
|
وكــم
حملتــم
علــى
بعـد
صـحابتكم
|
أمــا
علــي
فــأدنى
مــن
قرابتكـم
|
|
عنــد
الـولاؤة
أن
لـم
تكفـر
النعـم
|
|
أولـــى
أبـــاكم
وصــنويه
عطيتــه
|
فضـــلاً
وقلـــده
بـــالعفو
منتـــه
|
|
وكــم
حــدا
لــذوي
الأرحـام
رحمتـه
|
أينكــر
الحــبر
عبـد
اللَـه
نعمتـه
|
|
أبــوكم
أم
عبيــد
اللَــه
أم
قثــم
|
|
فكيــف
جــازيتم
عــن
فعلـه
الحسـن
|
بنيـه
خيـر
الـورى
بالقتـل
والمحـن
|
|
أيـا
عبيـد
الهـوى
فـي
السر
والعلن
|
بئس
الجــزاء
جزيتـم
فـي
بنـي
حسـن
|
|
أبـــاهم
العلــم
الهــادي
وأمهــم
|
|
غــادرتم
القـوم
صـرعى
فـي
فنـائهم
|
وآيــة
النــوح
تتلــى
فـي
نسـائهم
|
|
واللَــه
طــالب
وتــر
مــن
ورائهـم
|
لا
بيعـــة
ردعتكـــم
عــن
دمــائهم
|
|
ولا
يميــــن
ولا
قربــــى
ولا
ذمـــم
|
|
تركتـــم
خيـــر
أبنــاء
لخيــر
أب
|
فريســة
المرهفيــن
السـمر
والقضـب
|
|
يـا
أشـأم
النـاس
مـن
عجـم
ومن
عرب
|
هلا
صـــفحتم
عــن
الأســرى
بلا
ســبب
|
|
للصـــافحين
ببـــدر
عــن
أســيركم
|
|
صــيرتم
البغــي
والعـدوان
ديـدنكم
|
ولـــو
تحريتــم
الإحســان
أمكنكــم
|
|
فأبعـد
اللضـه
فـي
الأزمـان
أزمنكـم
|
هلا
كففتــم
عــن
الــديباج
ألسـنكم
|
|
وعــن
بنــات
رســول
اللَــه
شـتمكم
|
|
تصــيح
يــا
غيــرة
الإســلام
زوجتـه
|
والفاطميــــات
تبكيــــه
وجثتـــه
|
|
تحــت
الســياط
فيــا
للَــه
حرمتـه
|
مــا
نزهــت
لرســول
اللَــه
مهجتـه
|
|
عـــن
الســـياط
فهلا
نــزه
الحــرم
|
|
أشكو
إلى
اللَه
أقواماً
ما
قد
اصطلمت
|
ذريـة
المصـطفى
ظلمـاً
ومـا
اجـترمت
|
|
إليــةً
بالهــدى
يــا
عصــبة
ظلمـتٍ
|
مـا
نـال
منهـم
بنـو
حـربٍ
وإن
عظمت
|
|
تلـــك
الجـــرائر
إلا
دون
نيلكـــم
|
|
أراذل
قــــال
ذو
جهـــل
يعظمهـــا
|
لقـــد
ذكرتــم
أمــوراً
لا
أســلمها
|
|
فقلــت
والنفــس
يشــفيها
تكلمهــا
|
يــا
جاهــداً
فـي
مسـاويهم
يكتمهـا
|
|
غــدر
الرشــيد
بيحيـى
كيـف
ينكتـم
|
|
غــداة
نــم
بــه
ذو
إحنــةٍ
عرفــت
|
فـي
النـاس
مـن
عهـد
آبـاء
به
سلفت
|
|
وحيــن
ســاق
يمينـاً
بـالردى
عصـفت
|
ذاق
الزبيــري
غـب
الحنـث
وانكشـفت
|
|
عــن
ابــن
فاطمـة
الأقـوال
والتهـم
|
|
ملكتمـــوا
فجرحتـــم
كــل
جارحــةٍ
|
مـــن
الهـــدى
بســيوف
أي
جارحــة
|
|
يــا
عصــبة
للمعــالي
غيـر
صـالحة
|
كــم
غـدرةٍ
لكـم
فـي
الـدين
فاضـحة
|
|
وكـــم
دمٍ
لرســـول
اللَــه
عنــدكم
|
|
خــالفتموا
أمــره
فـي
الآل
والخلـف
|
وقلتــم
نحــن
أهـل
المجـد
والشـرف
|
|
ونحـــن
آل
نـــبي
بــالعهود
وفــي
|
أأنتــم
آلــه
فيمــا
تــرون
وفــي
|
|
أظفــاركم
مــن
بنيـه
الطـاهرين
دم
|
|
إن
القرابــة
إن
لــم
تحفـظ
الـذمم
|
وجودهــا
عنــد
أربـاب
النهـى
عـدم
|
|
يــا
ممســكين
بحبــل
وهــو
منجـذم
|
هيهـــات
لا
قربــت
قربــى
ولا
رحــم
|
|
يومـــاً
إذا
نصـــت
الأخلاق
والشــيم
|
|
بـل
القريـب
الـذي
لـم
يكفر
النعما
|
والأجنــبي
الـذي
لـم
يحفـظ
الـذمما
|
|
لـذاك
يـا
شـرحبيل
فـي
الـورى
علما
|
كــانت
مــودة
ســلمان
لــه
رحمــا
|
|
ولــم
يكــن
بيـن
نـوحٍ
وابنـه
رحـم
|
|
تلطخـــوا
بــدم
الهــادي
وبضــعته
|
حرصـاً
علـى
الملك
في
الدنيا
ورفعته
|
|
لــذاك
يــا
ويــل
وغبــون
بسـلعته
|
بـاءوا
بقتـل
الرضـا
مـن
بعد
بيعته
|
|
وأبصــروا
بعـض
يـوم
رشـدهم
فعمـوا
|
|
فلا
رعــى
اللضـه
منهـم
أنفسـاً
وردت
|
مـوارد
الغـي
إسـرافاً
ومـا
اقتصـدت
|
|
ولا
ســقى
اللَـه
منهـم
أربعـاً
همـدت
|
يــا
عصـبة
شـقيت
مـن
بعـدها
سـعدت
|
|
ومعشـراً
هلكـوا
مـن
بعـد
مـا
سلموا
|
|
للَــه
كـم
مـن
فـؤاد
للهـدى
جرحـوا
|
وزنــد
شــر
تحامـاه
الـورى
قـدحوا
|
|
قـوم
أصـابوا
لـواء
الملك
وافتضحوا
|
لا
عـن
أبـي
مسـلمٍ
فـي
نصـحه
صـفحوا
|
|
ولا
الهــبيري
نجــى
الحلـف
والقسـم
|
|
ولا
لــواء
الهـدى
فـي
أهلـه
عقـدوا
|
ولا
معــارج
أربــاب
العلــى
صـعدوا
|
|
ولا
وفــوا
لــذوي
الإخلاص
مـا
وعـدوا
|
ولا
الأمــان
لأزد
الموصــل
اعتمــدوا
|
|
فيــه
الوفـاء
ولا
عـن
عمهـم
حلمـوا
|
|
وراكـــب
صـــير
الوجنــاء
مدركــة
|
وخـــدها
لبنـــي
العبــاس
مملكــة
|
|
نــاديته
يــا
وقــاك
اللَـه
مهلكـةً
|
أبلــغ
إليــك
بنـي
العبـاس
مألكـة
|
|
لا
يــدعوا
ملكهــا
ملاكهــا
العجــم
|
|
تبوؤهـــا
فمــا
أبقــوا
لســائركم
|
إلا
منـــابر
تشــكو
جــور
جــائركم
|
|
تفــاخرون
بهــا
يــا
ويـل
فـاخركم
|
أي
المفــاخر
أمســت
فــي
منـابركم
|
|
وغيركـــم
آمـــر
فيهـــا
ومحتكــم
|
|
أتفخــرون
إذا
مــا
نــابت
الخــدم
|
عنكـم
بعقـد
اللـوا
والبـأس
محتـدم
|
|
والعــرب
تهــدر
بالعصـيان
والعجـم
|
وهـــل
يزيــدكم
فــي
مفخــر
علــم
|
|
وفــي
الخلاف
عليكــم
يخفــق
العلـم
|
|
كـم
تـدعون
العلـى
يـا
أيهـا
الهمل
|
ومــا
لكــم
ناقــة
فيهــا
ولا
جمـل
|
|
كيـــف
الفخــار
ولا
علــم
ولا
عمــل
|
خلــوا
الفخــار
لعلاميـن
إن
سـئلوا
|
|
عنــد
الســؤال
وعـاملين
إن
علمـوا
|
|
يــزداد
حلمهــم
إن
نــابت
النــوب
|
منهــم
وللعــود
عــرف
وهـو
يلتهـب
|
|
شــم
الأنــوف
ملــوك
أمرهــم
عجــب
|
لا
يغضــبون
لغيــر
اللَـه
إن
غضـبوا
|
|
ولا
يضــيعون
حكـم
اللضـه
إن
حكمـوا
|
|
عــز
يــرى
منهــم
أبعــد
النظــرا
|
شـمس
الضـحى
ونجـوم
الليـل
والقمرا
|
|
ولا
تــزال
وســل
عـن
ذاك
مـن
خـبرا
|
تنشــى
التلاوة
فــي
أبيـاتهم
سـحرا
|
|
وفـــي
بيــوتكم
الأوتــار
والنغــم
|
|
هــم
الهــداة
إذا
زاغــت
قلــوبكم
|
والمحســــنون
إذا
زادت
ذنــــوبكم
|
|
نصـــيهم
كـــل
فضـــل
لا
نصـــيبكم
|
إذا
تلـــوا
آيـــة
غنــى
خطيبكــم
|
|
قـف
بالـديار
الـتي
لم
يعفها
القدم
|
|
قلتــم
لنـا
إن
تـاج
الملـك
فضـلكم
|
علــى
بنــي
أحمـد
الهـادي
ويجلكـم
|
|
فيـا
عـداة
الهـدى
مـا
كـان
أجهلكم
|
منكــم
عليــة
أم
منهـم
وكـان
لكـم
|
|
شــيخ
المغنيــن
إبراهيــم
أم
لهـم
|
|
وأي
فخــر
لقــوم
مــا
لهــم
وطــر
|
إلا
الســلاف
وضــرب
العــود
والـوتر
|
|
بــل
الفخـار
لقـوم
بالهـدى
ظفـروا
|
مــا
فــي
منــازلهم
للخمـر
معتصـر
|
|
ولا
بيـــــوتهم
للشــــر
معتصــــم
|
|
هـــم
الأكــارم
لا
تخفــى
مكــارمهم
|
ولا
يهيــم
بغيــر
المجــد
هــائمهم
|
|
ولا
نشـــد
علـــى
ســـوء
حيــازمهم
|
ولا
تـــبيت
لهــم
خنــثى
تنــادمهم
|
|
ولا
يـــرى
لهـــم
قــرد
لــه
حشــم
|
|
وهـو
بنـو
المصـطفى
إن
كنـت
تجهلهم
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وأكــرم
النــاس
أعراقــاً
وأفضـلهم
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وإن
تســل
أيــن
مغنــاهم
ومـوئلهم
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فــالركن
والـبيت
والأسـتار
منزلهـم
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وزمــزم
والصــفا
والحجــر
والحـرم
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إن
الكتــاب
الــذي
مـا
زال
مرهفـه
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يجنــي
علــى
كــل
شــيطان
ويتلفـه
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تثنـــي
عليـــه
معــانيه
وأحرفــه
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وليــس
مـن
قسـم
فـي
الـذكر
تعرفـه
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إلا
وهــم
غيــر
شــك
ذلــك
القســم
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هــذا
لثنــاء
ومــا
وفيــت
مجـدهم
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ولــو
كتبــت
بنــور
العيـن
حمـدهم
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وقـــد
تحققــت
إن
الفــوز
عنــدهم
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فلا
أخــــاف
إذا
أمســـيت
عبـــدهم
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فالعبــد
يســلم
إن
سـاداته
سـلموا
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صــلى
الإلــه
علــى
أرواحهـم
وسـقى
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أجــداثهم
مــن
غـوادي
فضـله
غـدقا
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مـا
أومض
البرق
في
الظلماء
وانطبقا
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عليـه
جفـن
الحيـا
المنهـل
واندفقا
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دمــع
الغمـام
فبـات
الرضـو
يبتسـم
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