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أنــت
روحـي
يـا
حبيـبي
والحشـا
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وضــياء
العيــن
منــي
يـا
رشـا
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يـا
مليـك
الحسـن
فافعـل
ما
تشا
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لا
أرى
عمــــا
تـــراه
مـــذهبا
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وقيــامي
فــي
هــواكم
والقعـود
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راعيــا
عهــدك
مـن
عهـد
الصـبا
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إن
شـر
النـاس
مـن
خـان
العهـود
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جـــل
مــن
أولاك
جفنــاً
فــاتراً
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بــل
حســاماً
ليـس
ينبـو
بـاترا
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ومحيـــا
بـــل
صــباحاً
ســافرا
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مــــا
رآه
البـــدر
إلا
غضـــبا
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حســداً
يـا
أبعـد
اللَـه
الحسـود
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وانثنـــى
مــن
غيظــه
محتجبــا
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فــي
جلابيـب
الـدياجي
وهـي
سـود
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مـن
لبـدر
التـم
بـالجفن
الكحيل
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والرضــاب
العـذب
والخـد
الأسـيل
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يــا
عــذولي
فـاطرح
قـالاً
وقيـل
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إن
فـــي
الأحشــاء
منــي
لهبــا
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ليــس
يطفيـه
سـوى
لثـم
الخـدود
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مــا
عليــه
لـو
أبـاح
المشـربا
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مــن
لمــاه
وقليــل
مــن
يجـود
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مـــت
حــران
إلــى
ذاك
اللمــى
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فأنــا
المقتــول
ظلمـاً
بالظمـا
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يـــا
لقــومي
فــأقيموا
متمــاً
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لقتيــل
فــي
الهــوى
مـا
طلبـا
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وهـو
حـران
الحشـى
غيـر
الـورود
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وإذا
أمســـى
بقتلـــي
معجبـــا
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فاحــذروه
فهــو
ســلطان
حقــود
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يـا
لحـى
اللَـه
عـذولي
في
الهوى
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جهــل
الــداء
لعمــري
والــدوا
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فرمـــى
اللَــه
حشــاه
بــالجوى
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ليــرى
كيــف
تصــابى
مــن
صـبا
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طامعـاً
فـي
الـود
فـي
غيـر
ودود
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إنمـــا
يعــرف
تــأثير
الظبــا
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مـن
أباحـات
منـه
ما
تحت
الجلود
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قلـــت
للعـــذال
لمــا
جــردوا
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مـــن
ملامـــي
صــارماً
لا
يغمــد
|
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ويحكــــم
إن
نصــــيري
أحمـــد
|
مــــا
رآه
الجمـــع
إلا
هربـــا
|
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هــرب
الكــدري
مــن
صـقر
صـيود
|
أســـد
ضـــار
إذا
مـــا
وثبــا
|
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لجلاد
كــــان
قنــــاص
الأســـود
|
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شــاد
أركـان
المعـالي
بالحسـام
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والأيــادي
الــبيض
والـدنيا
ظلام
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هكــذا
تفعــل
أبنــاء
الكــرام
|
لا
كمـــن
يتلــو
علينــا
نســبا
|
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طيبــاً
وهــو
عــن
المجـد
رقـود
|
كلمــــا
قـــرض
جـــداً
وأبـــا
|
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ســالفاً
أنشــدته
نعــم
الجـدود
|
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فـــارس
يحكـــي
قيــل
البــدار
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جــده
الكـرار
فـي
يـوم
المغـار
|
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ولــه
ســيف
يحايــك
ذا
الفقـار
|
صـــارم
عضـــب
يقـــد
اليلبــا
|
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فكــأن
الـدرع
مـن
جنـس
الـبرود
|
قلمــــا
تلقــــاه
إلا
مـــذهبا
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بالـدم
المسـفوك
مـن
قـرن
عنـود
|
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وجـــواد
ســـيبه
عــم
الرفــاق
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وأعــاديه
وهــم
أهــل
النفــاق
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وســل
الشــامات
عنــه
والعـراق
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طبــق
الغيــث
المرامـي
والربـى
|
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وســقى
الأغــوار
منهـا
والنجـود
|
أنعــش
العجــم
معــاً
والعربــا
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وأصـــاب
الكــل
فالكــل
شــهود
|
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قســماً
الشــمس
والبـدر
المنيـر
|
لــو
سـرى
مـن
جـوده
شـيءٌ
يسـير
|
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في
الورى
ما
كان
في
الدنيا
فقير
|
هـــو
غيـــث
رد
ريعــي
معشــبا
|
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بالأيــادي
الــبيض
والأيـام
سـود
|
كــم
وكــم
أهــدى
إلينـا
سـحبا
|
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حيـث
لا
يهـدي
لنـا
غيـر
الرعـود
|
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وفصــيح
اللفــظ
يــزري
بالـدرر
|
قــوله
إن
قــال
نظمــاً
أو
نـثر
|
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منطــق
الكــروض
مطلــول
الزهـر
|
وقريــــض
مــــا
تلاه
الأدبــــا
|
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بينهـــم
إلا
وهمـــوا
بالســجود
|
مــا
جــد
أحيــا
نــداه
الأدبـا
|
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بعــد
مـا
كـان
رميمـاً
بـاللحود
|
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وجـــد
الآداب
كــالربع
المحيــل
|
قــل
مــن
أربابهــا
قـال
وقيـل
|
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غيـر
مـا
تشـكوه
مـن
حـر
الغليل
|
فــانثنى
كـالغيث
محلـول
الحبـا
|
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يشــمل
الآكــام
منهــا
والوهـود
|
فاغتـــدى
كـــل
فصــيحٍ
معربــا
|
|
عـن
كنـوز
الشـعر
لا
كنـز
النقود
|
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قســـماً
لـــولا
نــداه
الغــامر
|
فــي
زمــان
قــل
فيــه
الناصـر
|
|
مــا
ســما
للشــعر
منــي
خـاطر
|
بعــد
مــا
أصــبح
صـدري
ملعبـا
|
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لهمـــوم
كلمـــا
تمضــي
تعــود
|
نـــوب
لـــولا
نـــداه
والحبــا
|
|
لــم
أزل
فيهــن
مشـدود
القيـود
|
|
صـــان
وجهــي
خلــد
اللَــه
علاه
|
بنــداه
وعلــى
البــاري
جــزاه
|
|
عــن
بخيــلٍ
جعــل
المــال
إلـه
|
أذهــب
الــدين
وصــان
الــذهبا
|
|
مســلم
لكــن
لــه
شــح
اليهـود
|
يمنـــح
الحــران
برقــاً
خلبــا
|
|
فوعــــود
مردفــــات
بوعــــود
|
|
هـاك
يـا
بحـر
النـدى
والمكرمات
|
وابــن
طـاه
والميـامين
الهـداة
|
|
غــادة
فـي
ثغرهـا
عيـن
الحيـاة
|
زفهـــا
ذو
دمعـــةٍ
لــو
كتبــا
|
|
عمــر
النــاس
حبــاكم
بـالخلود
|
أنـت
جيـد
المجـد
يا
ابن
النجبا
|
|
ولغيــر
الجيـد
لا
تهـدي
العقـود
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