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لــي
فــي
مجــال
الشــعر
شـأ
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وٌ
لا
يطـــــال
إذا
قرضـــــته
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وتمــدني
الفصـحى
بـدر
اللفـظ
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يبهــــــــر
إن
نظمتـــــــه
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إن
عـن
لـي
في
الليل
فُتُّ
الليلَ
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طوعــــــــاً
والـــــــتزمتُه
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تأتيه
أبكار
المعاني
الخاطبات
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كمـــــــــا
اشــــــــتهيته
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لـو
قيـل
ليـل
شعري
وكنت
نسيت
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شـــــــــعري
لأدعيتــــــــه
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مـا
قلته
في
غير
منفعة
القبيل
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ولا
ابتــــــــــــــــــذلته
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مـــا
ســـقته
يومـــاً
علـــى
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ملــــقٍ
لمخلــــوقٍ
رجــــوته
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يتهـافت
الشـعراء
حـول
المـال
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لكنـــــــــي
أبيتـــــــــه
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فالشـعر
يـزرى
غيـر
أنـي
حيـن
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صـــــان
العـــــرض
صــــنته
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قــد
كــان
وقفــاً
فـي
الشـبا
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ب
علــى
الجمــالِ
وقـد
طـويته
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والآن
إن
أذنَ
الإلــــــــــــه
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بقـــــوله
للَـــــه
قلتــــه
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أو
فـــــي
مديــــح
محمــــدٍ
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لـــو
هزنـــي
للمــدح
بيتــه
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لـــو
كـــان
خلقـــي
ســابقاً
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ميلاد
أحمــــــد
لانتظرتـــــه
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إن
جــــاز
أن
اللَــــه
فـــي
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عمــــري
يمـــدُّ
إذا
ســـألته
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حــــتى
إذا
بعــــث
الســـرا
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ج
لهـــذه
الـــدنيا
اتبعتــه
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وركبـــت
فــي
الغــزوات
مــع
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ه
ولــذ
لــي
مــا
قـال
صـوته
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وأنــــا
قريــــر
بالشــــها
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دة
والــــذي
أملـــت
نلتـــه
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يـــــا
ربّ
قــــد
أخرتنــــي
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عنـــــه
ولكنــــي
لحقتــــه
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روحـــــي
تطيــــف
بروحــــهِ
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فيخــــال
لــــي
أن
صـــحبته
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لــــــــم
أرج
إلا
حجـــــــة
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إن
نلتهـــا
يـــا
رب
زرتـــه
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