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أبــدرٌ
ذرَّ
فــي
أفـق
الأعـالي
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فنــوَّر
سـمك
أسـماك
المعـالي
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أم
الخضـراءُ
أبـدت
فـي
رقيـعٍ
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براحــاً
برَّحـت
دُهـم
الليـالي
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أعيـنٌ
قـد
بـدَت
تجلـى
عيونـاً
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إلـى
العصر
الكفيف
من
الوبالِ
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أزاهـر
برقـع
الجربـاءِ
حـاكت
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بــدوراً
زُينـت
بسـنا
الكمـالِ
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فلا
عجـــبٌ
إذا
الأفلاك
ضـــاءت
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نــرى
الأرضـين
تزهـو
كـاللآلي
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وأزدهــت
الريـاض
بزهـو
زهـرٍ
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وأزهـرت
الصـخور
مـع
الرمـالِ
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أفـانين
الجنـات
تميـس
تيهـاً
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بليــنٍ
مخجــلٍ
سـمر
العـوالي
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بلابلهــا
تغــرد
فــي
فنــونٍ
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مـن
البلبـال
تجلـي
كـل
بـالِ
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وصــاح
مــن
العلاءِ
بشـيرُ
سـرٍ
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إلـى
بيـروت
بـالوالي
البجال
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علــى
أن
العلــى
علّـى
عُلاهـا
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وأوهبهــا
رضـى
برضـاه
عـالي
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رضـى
عـالي
الـوزير
خطير
قدرٍ
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وليّـا
جاءهـا
مـولى
المـوالي
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هـو
النـدب
الجسـور
مزيل
خطبٍ
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هـو
الليث
الهصور
لدى
النزالِ
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هـو
الشـهم
الشـريف
تليد
قنسٍ
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هـو
الفخر
الطريف
لذي
الكتالِ
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هـو
المـولى
المشير
أميرُ
أمرٍ
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همـام
سـاد
عـن
همـم
الرجـالِ
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لـه
الحـزم
السـديد
بكـل
رأيٍ
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لـهُ
العزم
الشديد
لدى
القتالِ
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ذكـيٌّ
قـد
حبـا
الأزكـان
نـوراً
|
يفـوق
ذُكـا
الـذكاءِ
بلا
مثـالِ
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جـوادٌ
قـد
سـما
بـالجود
جوداً
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فـأحيى
بالحيـا
فيـض
النـوالِ
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خضـــمٌّ
خضـــرمٌ
يـــمٌّ
عبــابٌ
|
مفيــــضٌ
جـــوهراً
درر
الأوالِ
|
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ومــا
مــن
سـائلٍ
يـأتيهِ
إلّا
|
يـأوب
مدى
المدى
التسآل
سالي
|
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كريـــمٌ
مخلـــفٌ
ســمحٌ
ســخيٌّ
|
بَـــذولٌ
متلِـــفٌ
غمــر
البلالِ
|
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أديــــبٌ
أحــــوزيٌّ
أحـــوذيٌّ
|
أريـــــبٌ
لـــــوزعيٌّ
ذو
جُلالِ
|
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لــــبيبٌ
المعــــيٌّ
يلمعـــيٌّ
|
مهيـــبٌ
أريحـــيٌّ
لا
يُبـــالي
|
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تفـرَّد
فـي
النُهـى
ينهـي
بنهيٍ
|
عــن
الحومـات
يـأمرُ
بـالحلالِ
|
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رشـيدٌ
للهـدى
قـد
جـاء
يهـدي
|
بنــور
الرشـد
أربـاب
الضـلالِ
|
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حكيـــمٌ
حــاكمٌ
علــمٌ
عليــمٌ
|
حليـمٌ
قـد
سـما
سـامي
الخصالِ
|
|
هـو
الحـامي
الحقوق
بنهج
شرعٍ
|
مريـحُ
المرمليـن
مـن
النكـالِ
|
|
عـــدولٌ
قــد
أزالَ
ظلام
ظلــمٍ
|
وجـرَّ
الجـورَ
فـي
بـأس
انعتالِ
|
|
به
الشرع
الشريف
ازاداد
نوراً
|
لأعيــان
الحقــوق
بلا
اسـتمالِ
|
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أزان
منصــَّة
الأحكــام
شــرعاً
|
بعــدلٍ
دافــعٍ
كــلَ
احتيــالِ
|
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وقـد
صـاح
الصـوابُ
أصبتُ
نصراً
|
نــأى
عنـي
الضـلال
ابـن
الألالِ
|
|
نقــابٌ
لــن
يلافيَــهُ
ارتبـاكٌ
|
يــرى
حـلَّ
المشـاكل
كالخيـالِ
|
|
بأحكــــام
تولّاهــــا
ولـــيٌّ
|
مصــيبٌ
للصـواب
هـو
الخمـالي
|
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وإن
جـاش
القلهـذمُ
فـي
زئيـرٍ
|
لمـــواجٍ
بقصـــد
الإغتيـــالِ
|
|
يــروم
تـدفق
الطوفـان
هتنـاً
|
علــى
قمـم
الجبـال
بإنسـجالِ
|
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فيزجــــره
بـــآراءٍ
وحـــزمٍ
|
فيمســــي
كالحضـــيض
بلا
بلالِ
|
|
وإن
زحفــت
جيــوشٌ
مـن
كـروبٍ
|
تهـز
علـى
الحجـى
بيض
النصالِ
|
|
فيلقاهــا
بجوشــن
ذي
رشــادٍ
|
حكيـمٍ
لـن
يُبـاري
فـي
النِضالٍ
|
|
ويــدفع
كــل
غــمٍ
مـن
صـدورٍ
|
ويُصــدِر
كــل
ســرٍ
باحتفــال
|
|
مزيـل
الجَـدبَ
فـي
رَغـسٍ
ورغـدٍ
|
مميــت
الفقـر
محـي
الارتبـالِ
|
|
هـو
الـبرُّ
الكريـم
فخيـم
قدرٍ
|
هـو
القطـب
العظيم
أبو
الأثالِ
|
|
هــو
الهمّــام
يجلـي
كـل
هـمٍّ
|
يـــدكُّ
بهمــةٍ
شــُمَّ
الجبــالِ
|
|
ســـُدوفٌ
لابـــدُ
هـــدبٌ
أبــدٌ
|
بَســورٌ
صــادمٌ
صــعبُ
الجـدالِ
|
|
ســما
ســحبانَ
إيجـازاً
بليـغٌ
|
وحســـاناً
بإفصــاح
المقــالِ
|
|
جريــراً
جــرَّ
فـي
نظـمٍ
ونـثرٍ
|
بمضــمار
البلاغــة
بارتجــالِ
|
|
وسـاد
السـعد
سـعداً
فـي
معانٍ
|
يســود
بيانهــا
نــور
الهلال
|
|
رضـى
فـاق
الرضـي
بالشرح
كافٍ
|
لكافيــةٍ
مـن
التعقيـد
خـالي
|
|
دعــى
ذكــرى
ســليمانٍ
برشـدٍ
|
لــدى
آل
الرشــاد
بانــذهالِ
|
|
حكيــم
أن
تـولّى
الكـون
طـرّاً
|
يزيــن
سياسـةً
بسـنا
الفعـالِ
|
|
وإن
عُــلَّ
التـداعي
بيـن
قـومٍ
|
بتعليـــــلٍ
معـــــلِّ
الإعتلالِ
|
|
يـــداوي
داءَه
بــدواءِ
عــدلٍ
|
وعقــلٍ
مُـدرءِ
الـداءِ
العُضـالِ
|
|
إلـى
عبـد
الحميـد
يحـقُّ
حمـدٌ
|
مـدى
الأيـام
مـع
كـرِّ
الليالي
|
|
مليــكٌ
قـد
سـما
الأملاك
فخـراً
|
إلــى
الرحمــان
ظـلٌّ
فـي
ظلالِ
|
|
ظلالٌ
ظلَّـــل
الأكـــوان
رحمــاً
|
فعــمَّ
شــوا
الشـواهق
والطلالِ
|
|
تفـرَّس
فـي
الرضـى
خلقاً
وَخُلقاً
|
حــوى
حســن
المحامـد
والخلالِ
|
|
فخــوَّله
الــولا
بــولا
حميــدٍ
|
بحـــزم
فراســـةٍ
والاتكـــال
|
|
حبــا
بيـروت
فخـراً
بامتيـازٍ
|
فبـــارت
جُلَّقـــاً
بالانفصــالِ
|
|
وجــدَّد
فــي
عُلاهـا
صـَرح
مجـدٍ
|
جديــداً
فــي
بـديع
الاهتجـالِ
|
|
وذرَّ
بــأفقهِ
بـدر
الرضـى
عـن
|
رضــى
ملــكٍ
وهــوبٍ
كـل
مـالِ
|
|
تنـاديهِ
العلـى
يـا
روح
سؤلي
|
ومحيــي
مهجـتي
مجـدي
سـوالي
|
|
تعشــقتُ
السـجايا
فيـك
عمـري
|
وجـام
العشـق
في
الكُمّال
حالي
|
|
وفــدَّت
بالــدعاءِ
لـهُ
جـؤاراً
|
جهــاراً
كــي
يــدوم
بلا
زوالِ
|
|
لقــد
هنِّئت
يـا
بيـروتُ
دهـراً
|
بفخــرٍ
ليــس
يُعقـبُ
بانزيـالِ
|
|
فســرّي
بــالمُنى
قـرّي
عُيونـاً
|
وقــولي
للملا
حــقَّ
الهنــالي
|
|
وأدّي
الشــكر
مشــفوعاً
بحمـدٍ
|
وفـــدّي
للعلـــي
بالإبتهــالِ
|
|
لنصـر
العاهـل
الكُبّـارِ
دومـاً
|
وحفـظ
علـي
رضـى
برضـاه
والي
|
|
كمـا
قـد
جـاءَك
الصـعبيُّ
يهدي
|
هنـــاء
بالســرور
وبالــدلالِ
|
|
وفـي
التاريـخ
يتلـو
سـُرَّ
حُـبٍّ
|
عَلِيُّــكِ
قـد
علا
عـالي
الأعـالي
|