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عنـــبري
الخــال
بالخــدين
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خـد
فـي
قلـبي
الشـجي
خـدين
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كــم
علــى
صـب
جنـت
وجنتـه
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وســباه
الغمــز
بــالعينين
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وكـأين
مـن
جـراح
فـي
الحشى
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بســهام
الجفــن
والهــدبين
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ويـح
قلـبي
من
تباريح
الجوى
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أيـن
مـن
يرضـى
بهـذا
الأيـن
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زادنـي
وهنا
على
وهني
الهوى
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كيـف
مـا
أقـوى
علـى
وهنيـن
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وشـــجوني
بــدواعي
لوعــتي
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قلبــت
قلـبي
علـى
الجنـبين
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أيهـا
الساقي
أدر
كاس
اللمى
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واسـقني
الـراح
علـى
لـونين
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ورد
خــديك
ونســرين
العـذا
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ر
فعــذري
كــان
مــن
هـذين
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مـر
عصـري
وعصـير
الـراح
لم
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يحـل
فـارحم
فاقـد
العصـرين
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واقـرن
الكـاس
بدر
الثغر
لي
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وقــل
أنظـر
طلعـة
السـعدين
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قـدك
الميـاس
يـزري
بالقنـا
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واعتــدال
السـمهري
القينـي
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إن
تثنـى
بيـن
بانـات
اللوى
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أو
تهــادى
ثــاني
العطفيـن
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قــالت
الأغصـان
مـن
خجلتهـا
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كـف
يـا
ذا
الشان
يكفي
شيني
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أصــبح
القلـب
عليـه
طـائراً
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منــذ
وافــا
غــراب
الـبين
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يا
حمام
الدوح
حم
حول
الحمى
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شــاكياً
مــن
فرقـة
الألفيـن
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أسـمر
القـد
وبيـض
اللحظ
قد
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أثــرا
فــي
مهجــتي
جرحيـن
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نـح
وعـدد
باكيـا
واشك
الأسى
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حـان
مـن
حيـن
التجافي
حيني
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لـم
تكـن
تبكي
كما
عيني
بكت
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ووضــوح
الفــرق
بالــدمعين
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أنـت
تبكـي
لا
بـدمع
والشـجى
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ليـس
فـي
دمـع
لـه
مـن
عيـن
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طـر
وواف
الحـي
وانـزل
بحمى
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صــفوة
الصـديق
ذي
المجـدين
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هــم
أصــول
لفـروع
الأوليـا
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يجتنــي
منـه
جنـي
الروضـين
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هـم
كـرام
مـن
كـرام
ذالهـم
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كـــــرم
الأخلاق
والأصــــلين
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هـم
بنـو
الزهراء
هم
آل
أبي
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بكـــر
الممــدوح
بالنصــين
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سـرهم
سـار
إلـى
مـن
دونهـم
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فســـناهم
مظهـــر
الســرين
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نعمـت
الآبـا
الأولـى
أبناؤهم
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فــاخروا
العميـن
بالخـالين
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يـا
علـى
الشـان
يا
أكرم
من
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أحــرز
المجـد
مـن
النسـلين
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جـدك
الصـاحب
في
الغار
الذي
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خـص
فـي
الـذكر
بثاني
اثنين
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وهــو
صــديق
لمــن
عصــمته
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نزهــت
عــن
شـائبات
الميـن
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يـا
نقيـب
السادة
الأشراف
يا
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مـن
هـو
النجـل
لطـه
الزيـن
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وهـو
بالبـدر
السني
من
وجهه
|
والجـبين
الصـبح
ذو
النورين
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بمعـاني
أشـرقت
كالشـمس
فـي
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عيــن
راء
مالهــا
مـن
غيـن
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نـادت
العليـا
بنـادي
جـوده
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يــا
كريـم
الـوجه
والكفيـن
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يكســب
الــبر
فيكسـوه
سـنا
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لا
يـــواري
ضــوءه
بــالرين
|
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ببــديع
مــن
ذكــاء
وذكــا
|
إذا
تحلــى
حليــة
النـوعين
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كيــف
لا
والحــظ
قـد
سـاعده
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بمعـــالي
مســعد
الــدارين
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ملـك
العصـر
سـعيد
الدهر
ذي
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الكـوكب
السامي
على
النسرين
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إذ
تلـوا
مولـد
خيـر
الأنبيا
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مــن
ســناه
نــور
الكـونين
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وشـذا
العنـبر
والعـود
لقـد
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أرج
الأرجــــاء
بـــالنفحين
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قمــر
قــد
لاح
فــي
منزلــه
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وبـــدت
أنـــواره
للعيـــن
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زاده
فخــراً
علــى
فخـر
علا
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فعليـــه
رونـــق
الفخريــن
|
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صــاح
هنئه
وانشـد
مـد
حـتى
|
عــل
يصــغي
نحوهـا
الأذنيـن
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وادن
منـه
واعتـذر
من
جفوتي
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واقـض
عنـي
بالتـداني
دينـي
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ثــم
قبــل
لـي
يـديه
لـترى
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مــن
نــداه
مجمـع
البحريـن
|
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حازمــاً
ناســب
مجـداً
وعلـى
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وســـواه
حـــائز
الضـــدين
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يـا
لـه
شـهماً
أميـراً
سـيدا
|
ذا
احتكـام
فـي
رضى
الخصمين
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عقـد
العـز
لـواء
والمنى
اخ
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تطبتـــه
فاشــهد
العقــدين
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وبعــالي
الجـد
فـي
تـاريخه
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جمـــع
الرتبـــة
للجـــدين
|
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دام
فــي
حـالي
بهـاء
وسـنا
|
بـالغ
الغيـات
فـي
الحـالين
|
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مـا
انتهـى
حـاد
إلـى
مقصده
|
وهـو
يطـوي
البيـد
بـالخفين
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