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طـالع
الأفـراح
بـالحظ
اتسم
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وفـم
الإقبـال
بالبشر
ابتسم
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والليـالي
بسـعيد
الدهر
قد
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أشـرقت
تسـفر
عن
صبح
الشيم
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هــو
شـمس
تزدهـي
أنوارهـا
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حيـث
يجلو
ضوءها
جنح
الظلم
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فـأدر
يـا
صاح
كاسات
الطلا
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واسـقنيها
بنـت
كـروم
وكرم
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فـي
ريـاض
زهرهـا
يضـحك
من
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أدمـع
الطـل
عـن
خـد
العنم
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راغنــم
الأنـس
وغـن
الـدما
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ليس
يحلو
الشرب
من
غير
نغم
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وإن
الـورق
شدت
تشكو
النوى
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فاسـمع
العجـم
تغني
بالعجم
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وذر
النرجــس
يرنـو
شاخصـاً
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ودع
النمــا
إن
قــال
ونـم
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لا
تخـف
ضيما
وشم
برق
الحمى
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أيضـيم
الـدهر
من
وافي
اضم
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كوكبــاً
مجــد
وعــز
قــراً
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ونــدا
أيـديهما
بحـر
خضـم
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أبصــر
الأكمــه
أنوارهمــا
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والمعـالي
تسمع
الصخر
الأصم
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إن
هــذا
العجيــب
مـا
لـه
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مشـبه
فيمـا
مضـى
بين
الأمم
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كعبــة
طـافت
بـأخرى
وسـعى
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حــرم
فـي
أمنـه
نحـو
حـرم
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زارتــا
طـه
ختـام
الأنبيـا
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قســمة
للحــظ
والحـظ
قسـم
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وبحـج
الميـت
شـكراً
فازتـا
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نعـم
مـا
قد
أبدتاه
من
نعم
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ورجـال
الركـب
والركبان
قد
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آنسـوا
نـاراً
علـى
رأس
علم
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وإلـى
أفـق
المبـادي
عادتا
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ونثـار
الـدر
يغنـي
من
نظم
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زانتـا
مصـراً
فأبـدت
زهوها
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وتبـاهى
الزهو
عجباً
واحتكم
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وغــدت
تختـال
مـن
فرحتهـا
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بقــدوم
سـر
أربـاب
الخـدم
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هكـذا
أهـل
المعـالي
جودهم
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كــل
موجـود
لـديه
كالعـدم
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نالتـا
بالفضل
غايات
المنى
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وكمـال
البـدر
يبدو
حيث
تم
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والمـوالي
والحواشي
انتظرا
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بالتهـاني
ما
به
الفخر
رسم
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وقفـا
بالبـاب
فـي
تـاريخه
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وقفـتي
قـرب
علـى
أسنى
قدم
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