|
يـا
سـائق
الركـب
يجتـاب
الفلا
سربي
|
وعــج
علـى
عـرب
فـي
حيهـا
سـر
بـي
|
|
وانــزل
فثــم
ديـار
مـن
يحـل
بهـا
|
وافـى
كـرام
الـورى
فـي
منـزل
رحـب
|
|
حيــث
القـرى
بجميـل
البشـر
ممـتزج
|
والخصــب
مقــترن
بالمنهــل
العـذب
|
|
هنــاك
خيــر
حمــى
مــن
أم
سـاحته
|
تبــدل
الســهل
فيمـا
شـاء
بالصـعب
|
|
حمــى
هــو
الحـرم
المقصـود
جـانبه
|
ســعياً
وفــوق
ظهـور
الأينـق
النجـب
|
|
مــا
أمــه
خــائف
خطبـا
وبـات
بـه
|
إلا
وأصــبح
فــي
أمــن
مــن
الخطـب
|
|
قــد
لاح
فيــه
مـن
الآفـاق
بـدر
علا
|
أنـار
مـا
كـان
بيـن
الشـرق
والغرب
|
|
بــدر
ضــياء
ســواه
منــه
مكتســب
|
وضـوءه
البـاهر
البـاهي
السني
وهبي
|
|
زهـــت
برونقــه
الأيــام
وابتهجــت
|
ومــن
حلاه
بــدت
تختـال
فـي
العجـب
|
|
علا
علىهامــة
الجــوزاء
فــي
همــم
|
يرمـي
مريـد
اسـتراق
السـمع
بالشهب
|
|
لئن
تصــدت
صـروف
الـدهر
لـي
ودجـت
|
فــإن
كــوكبه
فــي
جنحهــا
حســبي
|
|
لا
عتـب
لـي
فـي
بنـي
عصـري
على
أحد
|
نعــم
يكــون
علــى
أمثــاله
عتـبي
|
|
لا
ينكــر
الجـور
الشـفاف
حيـث
بـدا
|
شـتان
بيـن
الحصـى
واللؤلـؤ
الرطـب
|
|
لا
يسـتوي
مـن
علـوا
شانا
ومن
سفلوا
|
ولــم
يكــن
ليقـاس
التـبر
بـالترب
|
|
إذا
جهلــت
فــتى
فــانظر
صــنائعه
|
فــإن
افعــاله
عــن
طبعــه
تنــبي
|
|
إن
السـجايا
بـدت
في
الخلق
واختلفت
|
لكــي
يميــر
بيــن
الليـث
والكلـب
|
|
يــا
غيـث
غـوث
لـدى
هـامي
مكـارمه
|
سيان
ذو
البعد
في
الجدوى
وذو
القرب
|
|
شــيدت
بيــت
معـال
قـد
حكـى
فلكـا
|
كــانت
مـداراة
مبنـاه
علـى
القطـب
|
|
لمــا
تبــدت
تبــاهيه
بــدور
دجـى
|
تبـدي
جمالـة
زاهـي
نورهـا
الكسـبى
|
|
قـــالت
شـــموس
مبـــانيه
مؤرخــة
|
خيـر
البهـاء
الجمال
الزاهر
الوسبى
|