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ومـــا
روض
آس
ذي
غصـــون
مــوائس
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كســته
يــد
الأنـداء
خضـر
الملابـس
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وبـاتت
سـواري
المـزن
مـن
در
طلها
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تحلـــى
طلـــى
قضــبانه
بنفــائس
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وأصـبح
ثغـر
الزهـر
يضـحك
مـن
بكا
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عيـون
الغـوادي
المعصـرات
العوابس
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ووالــت
بــه
ورق
الحمـائم
نوحهـا
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لوحشــة
ألــف
بــات
غيــر
مـؤانس
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وصــاحت
شــحارير
الطيــور
كأنهـا
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رهابنـــة
صــلت
بســود
الــبرانس
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وراح
غــدير
المـاء
يجـري
مسلسـلاً
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ويشــكو
علـى
الإطلاق
ضـيق
المجـالس
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يمــر
بــه
روح
النســيم
وينثنــي
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فيــروي
شــذا
أنفاســه
للمعــاطس
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وقــد
بــاكر
النـدمان
دوح
أراكـه
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جـراح
حكـت
فـي
الكـاس
جـذوة
قابس
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معتقـــة
بكـــر
عجـــوز
بـــدنها
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مخــدرة
فــي
الحـان
عـذراء
عـانس
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يطـوف
بهـا
سـاق
إذا
مـاس
وانثنـى
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تقــول
غصـون
الـروض
هـذا
مجانسـي
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وإن
قـام
يسـتجلي
الكـؤوس
حسـبتها
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شموسـا
بهـا
تسـعى
بـدور
الحنـادس
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لمـى
فيـه
فيـه
كـم
نفـوس
تنافسـت
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وقــد
قــل
أن
تلقـى
سـوى
متنـافس
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وغنــاهم
شــاد
أغــن
إذا
انتضــى
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ظبـا
الحـظ
أزرى
بالظبـا
الكـوانس
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رطيـب
قـوام
أهيـف
القـد
لـم
تـدع
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ليانـــة
عطفيــه
قياســاً
لقــائس
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فـإن
قسـته
بالبـان
فـالفرق
ظـاهر
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وإن
بــالعوالي
فهــو
ليـس
ببـائس
|
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إذا
صــاح
بالألحــان
يشـدو
فمعبـد
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وإن
طــارح
النـدمان
فـابن
مكـانس
|
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ولــو
حضــر
الواشـي
لحاضـره
بمـا
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يــبين
عــن
الجــزار
وابـن
قلاقـس
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وقــد
آن
إبــان
الربيــع
وشـابهت
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أزاهــره
فـي
الـروض
وشـى
الأطـالس
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وكلـــل
تيجـــان
الربـــا
بلآلــئ
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مــن
القطـر
يجلوهـا
جلاء
العـرائس
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وحيــاهم
الســاقي
بــورد
ونرجــس
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وبالخــد
حيــي
والعيـون
النـواعس
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فطـابوا
نفوسـاً
واطمـأنوا
خـواطراً
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وقـد
أمنـوا
تكـدير
صـفو
المجـالس
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بــأطيب
يومــاً
مــن
ثنـاء
يـديره
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لسـاني
امتـداحاً
فـي
مدير
المدارس
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ألا
وهـو
فـي
الغايـات
أدهـم
عصـره
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مجلـى
رهـان
السـبق
بيـن
الفـوارس
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أميـــر
مشـــير
ســيد
ذو
سياســة
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ســـنى
ركــاب
دونــه
كــل
ســائس
|
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همــام
لــه
فــوق
السـماكين
همـة
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لـديها
طريـق
المرتقـى
غيـر
طـامس
|
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كريــم
إذا
وافــاه
راجــي
مكـارم
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يعـود
وقـد
نـال
المنـى
غيـر
يائس
|
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هــو
الغيـث
إن
سـحت
سـحائب
جـوده
|
هـو
الليـث
إن
رام
اقتناص
الفرائس
|
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هــو
البــدر
إلا
أنــه
فـي
كمـاله
|
تنــزه
عــن
نقــص
وشــين
خســائس
|
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هـو
الـروض
قـد
طـابت
شـذا
نفحاته
|
ودلـت
علـى
طيـب
الجنـى
والمغـارس
|
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هـو
الشـهم
هندوس
الأمور
أخو
العلى
|
وليـس
الجـري
المقـدام
كالمتقـاعس
|
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هـــو
اللــوذعي
الألمعــي
فراســة
|
يلــوح
ســناها
فــي
ظلام
الهـواجس
|
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هو
الهندس
النقريس
ذو
الهم
والحجا
|
هـو
العـالم
النحريـر
أوفـق
نـابس
|
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أدار
دروســا
فـى
المـدارس
رسـمها
|
بـه
عـاد
مـن
بعـد
العفا
غير
دارس
|
|
فــأكرم
بــه
مــن
عـارف
ذي
إدراة
|
خــبير
بــأنواع
الفنــون
ممــارس
|
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فـإن
يلبسوا
بالباطل
الحق
ما
زهوا
|
ولــم
يجــد
شـيأ
عنـده
لبـس
لابـس
|
|
وإن
شــبهة
قـد
شـابت
الأمـر
ردهـا
|
وأوضــحها
لــو
دســها
ذود
ســائس
|
|
لــه
اللَـه
مـا
أذكـاه
مـن
متفـرس
|
وعـــوذه
مـــن
شــر
كــل
وســاوس
|
|
محاســن
وافتهــا
الحظــوظ
بطـالع
|
مســاعده
مــا
إن
لهـا
مـن
منـاحس
|
|
إغاثـــة
ملهـــوف
وتنويــل
آمــل
|
وفرحـــة
محـــزون
ونعمــة
بــائس
|
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وكــم
مكرمــات
حازهـا
وهـو
مفـرد
|
وهــل
بلــغ
المــرؤوس
مبلـغ
رائس
|
|
فحــج
بنــا
يـا
صـاح
كعبـة
مجـده
|
ولــد
بمقــام
جــل
عـن
لمـس
لامـس
|
|
هــو
المقصـد
الأسـنى
بمـاش
وراكـب
|
علــى
ظهـر
مطـواع
العنـان
وشـامس
|
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وحيــث
دخلـت
الحـي
فـاعلم
بأنمـا
|
وردت
علــى
بحــر
عظيــم
القـوامس
|
|
وبـادر
إلـى
الشـكوى
وقل
إن
صاحبي
|
محـا
رسـمه
عصـف
الريـاح
الروامـس
|
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وقـد
ضـاقت
الـدنيا
عليـه
وأظلمـت
|
وكـان
شـهاباً
فـي
الدياجي
الدوامس
|
|
فوســع
عليــه
بالــذي
أنـت
أهلـه
|
وخلصــه
مـن
أشـراك
ضـيق
المنـافس
|
|
عسـاه
بصـرف
الصـرف
أن
يصـرف
الأسى
|
كصـــرف
محـــق
ترهــات
البســابس
|
|
وهـــاك
عقــوداً
مــن
حلاك
كأنهــا
|
جــواهر
تيجــان
الملــوك
بفــارس
|
|
فبلغــه
غايــات
المنــى
بقبولهـا
|
وأتمــم
لـه
الإحسـان
رغمـاً
لـواكس
|