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أحكــام
شــرع
محبــتي
لا
تنسـخ
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الوجــد
يملـي
والصـبابة
تنسـخ
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حكـم
السـهاد
علـى
جفـوني
أنها
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ترعـى
السـهى
دومـاً
وعيني
تنضخ
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يــا
لائمـي
خـل
اختيـار
ملامـتي
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أعلـى
أضطراري
في
الغرام
أو
بخ
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هيهـات
أن
أصـغي
إليـك
وقد
غدا
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بينـي
وبينـك
فـي
المسافة
فرسخ
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أهـل
الهيـام
بأسـرهم
في
أسرهم
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شكروا
لمن
يعصي
العذول
وبخبخوا
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بحــران
بحـر
هـوى
وبحـر
مـداع
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بغيــا
علـيَ
ومـا
هنالـك
بـرزخ
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كـم
مهجـة
بيعـت
بوصـل
ممـا
طل
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والعقـــد
ثمــت
لا
زم
لا
يفســخ
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يـا
صـب
لا
تتعـب
وطـب
لا
بـد
من
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أن
تســتريح
وروع
روعــك
يفـرخ
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الـــدهر
دولاب
يـــدور
وأهلــه
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أطفـــالهم
فـــي
دوره
تتشــيخ
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لـولا
مسـيس
النار
ما
نضج
الغذا
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ليـس
الطبيـخ
بـدون
نـار
يطبـخ
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رح
يــا
خلــي
وخلنـي
إذ
خلـتي
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غيــداء
نجلاء
المحــاجر
بيــذخ
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لـو
غازلتـك
عيـون
غـزلان
الحمى
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لغـدوت
فـي
شـرك
الهـوى
تتصـرخ
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كــم
حيـة
تسـعى
لتلسـع
تنثنـي
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والـرأس
منهـا
بالحجـارة
ترضـخ
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فـارج
التخلـص
لـي
بحـبي
سـيداً
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خضـعت
لـه
شـم
الأنـوف
ودربخـوا
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وأجـأر
وقـل
أنـافي
جـوار
محمد
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يــا
للرجـال
لعـل
رجلـك
ترسـخ
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يـوم
يـرى
مـا
قدمت
أيدي
الورى
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فـــتزل
أقــدام
لهــم
وتســوخ
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يـا
ذا
الشـفاعة
إننـي
مستشـفع
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بـك
يومـا
في
صور
القيامة
ينفخ
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الليــل
يظلـم
والنهـار
بنـوره
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منــه
علـى
كـر
الليـالي
يسـلخ
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وأنـا
الـذي
لا
يرعـوي
عـن
جهله
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ولنــوق
لــذات
الهــوى
أتنـوخ
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ســوَّدت
بيــض
صـحائفي
بإسـاءتي
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نفســي
وكيـف
نقـاء
مـا
يتوسـخ
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فاسـمح
وخذ
بيدي
وقل
لقد
انمحى
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مــا
أنـت
مـن
دنـس
بـه
متلطـخ
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وعلـى
الحمـى
أذكـى
سـلام
طيبـه
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بـــأريجه
أرجاؤنـــا
تتضـــمخ
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