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كــل
الإنــاث
وقــد
مضـت
أسـماءُ
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مـــا
هـــنَّ
إلا
بعــدها
أســماءُ
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لـو
قبـل
تفضـيل
الرجـال
تخلَّقـت
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لاســتثنيت
وأتــى
بهــا
الأنبـاء
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ألـف
الـتراب
ترائبـاً
أنف
الردى
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أترابَهـــا
مـــن
أنهــن
فــداء
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لـو
كـان
يزهيـه
فـداً
عـن
حسنها
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فليفــدِها
بــدر
الــدجى
وذكـاء
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تهـوي
الثريـا
في
الثرى
لو
أنها
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قــرط
لهــا
ووشــاحها
الجـوزاء
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ولــو
الهلال
ســوارها
وحجالهــا
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القــوس
والإكليــل
بعــد
غطــاء
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وبنـات
نعـشٍ
فـي
الحـداد
سـوافر
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مــذ
جـاء
هـن
بناعيهـا
العـوّاء
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هـب
الصـبا
بعـد
الصـبى
بنسيمها
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وغــدت
عقيمــاً
بعــد
ذاك
رخـاء
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أسـماء
كـانت
فـي
النفـوس
نفيسة
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وهــي
الســرور
وللعيــون
ضـياء
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الحســن
يعشــق
ذاتهـا
وصـفاتها
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والغصــن
يطـرق
إذ
هـي
الهيفـاء
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نـــارٌ
ونُــور
خــدها
وجبينهــا
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والثغــر
نَــورٌ
واللمــا
صـهباء
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لفـــظ
ولحــظ
طــرة
أو
جيــدها
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روح
وريحــــان
ظبـــاً
وظبـــاء
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وذاوائبٌ
منهـــا
القلــوب
ذوائب
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نشــأت
بهــا
الأهــوال
والأهـواء
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صـــفرٌ
تســرُّ
النــاظرين
بجثــة
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سـال
النصـار
بهـا
وقـام
المـاء
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لـم
أدر
دمعـي
فـي
تسلسـله
بهـا
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أن
الجنـــون
أصــوله
الصــفراء
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ذهــب
تطــرز
فــوق
رونــق
فضـة
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مــــاء
عليــــه
للأصــــيل
طلاء
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وبحـــق
يــاقوتٍ
ثنايــا
لؤلــؤٍ
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فلـــــج
تبســــمها
لــــه
لألاء
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لطفـــت
هيولاهــا
ورقــت
صــورة
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هـــل
والــداها
رونــق
وصــفاء
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فــي
حســن
طــاوسٍ
وخفــة
بلبـلٍ
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قمريــة
النغمــات
بــل
عنقــاء
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لـــولا
مقبّلهـــا
لســالت
رقــةً
|
فــالبرد
للــبرَد
المـذاب
وقـاء
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فـي
صـورة
تقضـي
بـأن
الحـور
من
|
جنـــس
هيولاهـــا
لهــا
إنشــاء
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حوريـــة
منهـــن
إن
فـــرت
فلا
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نســبٌ
لهــن
بهــا
وليــس
إخـاء
|
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فــي
وجنتيهــا
للشــبيبة
رونـق
|
وبوجههــا
ملــء
العيــون
بهـاء
|
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هــي
بــرة
بــل
قــرة
بـل
غـرة
|
بـــل
زهـــرة
بــل
درة
عصــماء
|
|
بــل
وردة
قــامت
تفتـح
فـازدوت
|
بــالقبر
فهــو
الروضـة
الغنـاء
|
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قطفــت
برغمــي
لات
حيـن
قطافهـا
|
مــن
بعــدها
إن
البهــاء
هبـاء
|
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وخلا
مـن
الإنـس
الوجـود
بمـا
خلت
|
حــتى
جحــدت
مــن
المحــال
خلاء
|
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أنــثى
بهــا
حسـنت
صـفات
مـذكّرٍ
|
ذاتٌ
لهــا
فــوق
النســاء
سـناء
|
|
خلــق
شــريف
فــي
لطيـف
خلقهـا
|
بصـــفات
حســن
مالهــا
إحصــاء
|
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مـا
اسـتكملت
عاماً
فحاكت
ما
ترى
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تقليــد
كهــل
دونهــا
النبهـاء
|
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وتكلمــت
لتمــام
حـول
بـل
مشـت
|
مــن
قبلــه
وتعقلــت
مـا
شـاؤا
|
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وتضـــرعت
للَـــه
عنــد
أذانــه
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وحكـــت
صــلاتي
حبــذا
الإيمــاء
|
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لمــا
أتـت
عامـاً
ونصـفاً
جاءهـا
|
منــه
أبـو
يحيـى
لهـا
الخطبـاء
|
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غنــى
حَمــام
حِمامهــا
إذ
نقطـت
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بـــدراهم
الجــدري
بئس
الــداء
|
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كالطـل
فـوق
الزهر
أو
حبب
الطلا
|
أو
فضـــة
نــثرت
بهــا
حصــباء
|
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داء
كســى
الجسـم
المنعـم
ثـوبه
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مثــل
الفرنــد
علا
عليــه
صـداء
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شـالت
نعامـة
عمرهـا
وزقى
الصدا
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ورقــى
غــرابُ
الـبين
والورقـاء
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مـن
بعد
ما
ابتهج
الزمان
بذاتها
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وتـــأرجت
بنســـيمها
الأرجـــاء
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كإقاحـــة
ملئت
نـــدىً
وبديعــةٍ
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فــي
حســن
لفــظ
صـاغه
الأدبـاء
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ودَّعتُهــا
ووَدَعتُهـا
الكفـن
الـذي
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فيــه
النـدى
والمجـد
والعليـاء
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كفنــاً
يســر
النــاظرين
صـينعه
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ممـــا
وشــته
لعرســها
صــنعاء
|
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رضــوان
أرســله
ليــأتيه
بهــا
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لمـــا
اســـتَفزَّت
حــوره
الخُيَلاء
|
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زفَّـت
لنعـم
الصـهر
لمـا
لـم
يكن
|
فــي
هــذه
الـدنيا
لهـا
أكفـاء
|
|
يحظــى
بهـا
كفـن
ويحـرم
نـاظري
|
فهمـــا
وقـــبر
ضــمها
خصــماء
|
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ولئن
أسـلى
النفـس
عنهـا
بالمنى
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فلربمــــا
يشـــفى
بـــداءٍ
داء
|
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الأرض
يجـــذبني
إليهــا
نصــحها
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وأغـــش
بالآمـــال
وهــي
ســماء
|
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يــا
صــعدة
قـد
صـعدت
زفراتنـا
|
بشـرى
الصـعيد
لـه
السـعيد
هناء
|
|
أبنيـتي
الـدنيا
لو
انكشف
الغطا
|
عــن
حالهــا
لـم
تفـرح
الأحيـاء
|
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أبنيــتي
ســبب
الممـات
وجودنـا
|
وكــذا
وجــودك
للفنــاء
فنــاء
|
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عهــدي
بـه
مـوت
البنـات
كرامـة
|
مــا
بــال
موتــك
دونـه
الأرزاء
|
|
فأنـا
اليـتيم
ولسـت
أنـت
يتيمة
|
إذ
أنــت
جــوهرة
لهــا
إخفــاء
|
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دفنــت
فحســود
الغـرام
رغامهـا
|
وتــود
لــو
دفنـت
بهـا
الأحشـاء
|
|
فلئن
ثوى
الجسد
المهذب
في
الثرى
|
فــالجفن
فيــه
للخيــال
نــواء
|
|
الــدهر
بعــدك
كلــه
لــي
شـدة
|
والـــدهر
أعهــدُ
شــدةٌ
ورخــاء
|
|
لا
تعـذلي
فـي
جهـل
عـذري
عـاذلاً
|
مــن
حيــث
طـال
بوصـفك
الإطـراء
|
|
نــدري
الشــموس
ولا
نلازم
حسـنها
|
منهـا
ونجهـل
مـا
تـرى
الحربـاء
|
|
إن
يعـذلوني
فـي
هـواك
فمـا
لهم
|
حــرق
الفــؤاد
عليـك
والبرحـاء
|
|
أســماءكم
مـن
بعـد
موتـك
أرخـت
|
أفعـــال
مــوت
أفحمــت
أســماء
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